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बल्लभगढ़ दंगा: अटाली के आईने में

हम हरियाणा भवन के सामने हैं। एक ‘वाटर कैनन’ सामने खड़ी है। दिल्ली पुलिस के जवान लाठियों के साथ तैनात। महिला-पुलिस भी। मई की बेरहम धूप है जो जलती चादर की तरह हमें लपेटे हुए है। सामने किसी पुराने कार्यक्रम के फ्लेक्स-बैनर की दरी बना दी गई है। उस पर पचीस-तीस औरतें-मर्द सिकुड़ कर एक दूसरे से सटे हुए बैठे हैं। एक छोटा बच्चा गोद में। दिल्ली के पुराने पहचाने चेहरे। शबनम हाशमी देख रही हैं कि पानी का इंतजाम ठीक है कि नहीं।
Author June 4, 2015 17:51 pm
बल्लभगढ़ के अटाली में सुरक्षाकर्मियों के बीच गांव लौटते अल्पसंख्यक समुदाय के लोग। (फोटो: ताशी तोबग्याल)

हम हरियाणा भवन के सामने हैं। एक ‘वाटर कैनन’ सामने खड़ी है। दिल्ली पुलिस के जवान लाठियों के साथ तैनात। महिला-पुलिस भी। मई की बेरहम धूप है जो जलती चादर की तरह हमें लपेटे हुए है। सामने किसी पुराने कार्यक्रम के फ्लेक्स-बैनर की दरी बना दी गई है। उस पर पचीस-तीस औरतें-मर्द सिकुड़ कर एक दूसरे से सटे हुए बैठे हैं। एक छोटा बच्चा गोद में। दिल्ली के पुराने पहचाने चेहरे। शबनम हाशमी देख रही हैं कि पानी का इंतजाम ठीक है कि नहीं।

विरोध-धरने का वक्त बारह बजे का था। अभी दिल्ली के लोग नहीं पहुंचे। आमिर ज्ञापन की प्रतियां निकाल रहे हैं, प्रेसवालों को दी जानी हैं। उसके पहले हरियाणा भवन के भीतर ‘रेजिडेंट-कमिश्नर’ को। अंगरेजी में हैं। शबनम दरी पर बैठे लोगों में कुछ को तरजुमा करके बता रही हैं कि इसमें क्या लिखा है, उनकी ओर से और क्या मांगें की गई हैं।

पिछली बार हम किस भवन के सामने थे? शायद उत्तर प्रदेश भवन के? या छत्तीसगढ़ भवन? या ओड़िशा भवन? या डागावास में दलितों को ट्रैक्टर से कुचल कर मार डालने के खिलाफ राजस्थान भवन के सामने? यही जमात हर जगह क्यों होती है? इन्हें जिंदगी में और कुछ कामकाज नहीं?

इस बार ये मुसलमान बल्लभगढ़ से आए हैं, ठीक कहें तो अटाली गांव से। हैं या थे? अभी कहना मुमकिन नहीं। अभी तो ये गांव में नहीं हैं। भाग कर बगल के थाने में इन्होंने आसरा लिया है। कुल जमा तीन सौ लोग हैं, मर्द-औरतें, बच्चे। नहीं, सारी औरतें बुर्के में नहीं हैं और न सारे मर्दों के सिर वह टोपी है, जिसे अगर आज इस देश का प्रधानमंत्री पहन ले तो मीडिया उस पर कुर्बान होने को तैयार बैठा है।

बिना बुर्के और टोपी के भी ये मुसलमान हैं। उसकी एक पहचान यह है कि इनमें से कई की देह पर मार के निशान हैं। आप चमड़ी पर नील देख सकते हैं। कहने भर की देर है, वे चोट दिखाने को तैयार हैं। कैमरों के सामने झिझक नहीं। कैमरे पूरी देह टटोलते हैं, कहां-कहां दाग हैं? इस बार किसी पर गोली का जख्म नहीं है। लेकिन कुछ के पट्टियां बंधी हैं। खून और दवा मिल कर एक अजीब रंग बन गया है। यह रंग क्या गोपी गजवानी के चित्रों में देखा है? जोर डालने पर याद नहीं आता।

‘अटाली मुजफ्फरनगर से अलग है। अलग भी और एक मायने में बेहतर भी।’ यहां से सब जिंदा निकल आए हैं, इसलिए? किसी औरत का बलात्कार नहीं हुआ, इसलिए? ‘नहीं। समझने की कोशिश कीजिए। अटाली में लोग मान तो रहे हैं कि मुसलमानों पर हमले में गांव के लोग भी शामिल थे। मुजफ्फरनगर में कौन यह मानने को तैयार था? फिर, यहां के हिंदू गांववाले हमले के अगले रोज से ही भागे मुसलमानों को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।’

फिर मुसलमान क्यों नहीं लौट रहे? जब गांव के जिम्मेदार, बुजुर्गवार उन्हें मना रहे हैं तो वे क्यों नहीं समझ रहे? क्यों वे उनकी इस गारंटी पर भरोसा नहीं कर रहे कि आगे हिंसा नहीं होगी! क्या इसलिए कि उन्होंने हमलावरों में अपने पड़ोसियों को देखा और पहचाना है, उन बच्चों को जिन्हें बड़े होते देखा, जिनकी शादियों में शरीक हुए, अपने ऊपर हमला करते देखा है, तलवार, कुल्हाड़ी और लाठियों के साथ। उनकी गालियां सुनी हैं। हिंसा से विकृत उनके चेहरे उन्हें याद हैं। और उन्होंने एफआइआर में उनके नाम दिए हैं। और क्या उनके लौटने की शर्त यह है कि वे ये नाम वापस ले लें?

‘छोरों को दिमाग गर्म हो गया था, क्या करें!’ क्या करें, यही तो सवाल है। वे अपने छोरों को कैसे छोड़ दें? उन्हें जेल जाते कैसे देखें? उनके भी बाल-बच्चे हैं। गलती उनसे हुई, पर क्या उसकी सजा होना जरूरी ही है? इससे क्या मिल जाएगा मुसलमानों को? ठीक है, उनके घर-बार जल गए हैं। नुकसान हुआ है तो मुआवजा उसका मिल ही जाएगा! कोई मरा तो नहीं! कोई और गलत काम तो नहीं हुआ!

एक औरत खड़ी होती है। असमंजस में वह माइक की ओर देखती है और जिसने उसे माइक थमाया है, उसकी ओर। ‘हां! हां! बोलिए। आपके साथ जो हुआ है, वही बताइए।’ वह बोलती है, धीरे-धीरे उसका गुस्सा तेज होता जाता है। फिर एक और उम्रदराज औरत खड़ी होती है। फिर तीसरी। मुसलमान औरतों को मुख्यधारा में आना चाहिए। वे परदे के पीछे दबी रहती हैं, तो फिर यह कौन बोल रही है?

कौन बता रही है कि लगभग दो हजार की भीड़ थी जिसने हमला कर दिया, गैस के सिलेंडरों से विस्फोट करके छतें उड़ा दीं, घरों को तबाह किया, आग लगा दी। बच्चों का, सबका दम धुएं में घुटने लगा। टॉयलेट में बच्चों के साथ छिपी रही। बड़े घर थे, तीन-तीन गाड़ियां खड़ी थीं, एक जायलो भी थी, सबको फूंक डाला। कमरों में एसी लगे थे, इन्वर्टर थे, सब जला डाला। और अचानक सिसकी फूटती है। लेकिन वे खुद को संभालती हैं। कुछ और कहना चाहती हैं। पुलिस वक्त पर नहीं आई, जो थी भी, उसे हटा लिया गया। किसी तरह की कोई राहत नहीं है, वे और उनके बाल-बच्चे इस गर्मी में थाने में पड़े हुए हैं। खाना-पीना सब बिरादरी वाले कर रहे हैं।

‘सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति में सरकार को राहत शिविर का इंतजाम करना होता है, अंतरिम राहत की व्यवस्था करनी होती है’, शबनम संवैधानिक भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं। मुसलमानों को इसकी आशंका है कि उनके नुकसान की ठीक भरपाई न होगी। सरकार ने अभी ही अंदाज पेश कर दिया है जो तकरीबन डेढ़ करोड़ का है। मुसलमान इससे सहमत नहीं हैं। लेकिन मुआवजा तो एक अलग मसला है। वे गांव क्यों नहीं लौटना चाहते? वे हमलावरों गिरफ्तारी चाहते हैं। और अपनी मस्जिद बनाना चाहते हैं। और यही मुश्किल है।

‘वे लौट आएं जी, लेकिन मस्जिद तो वहां नहीं बनेगी। हमने उन्हें कब्रिस्तान के नाम पर जमीन दी थी। अब वे वहां मस्जिद चाहते हैं, कल को पूरा गांव ही मांगने लगेंगे।’ एक हिंदू गांववाला ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संवाददाता को साफ-साफ कहता है। अदालत कुछ भी कहे, मस्जिद यहां नहीं बनेगी।

अदालत ने साफ-साफ कहा है कि जमीन कानूनी तौर पर मुसलमानों की है, मस्जिद की है, मस्जिद वहां बनने में कोई उज्र नहीं उसे। पहले हिंदुओं ने दलील दी कि वहां कोई मस्जिद नहीं थी, फिर सबूत पेश हुआ कि टिन की छत के नीचे मस्जिद का काम होता था। अदालत अपनी जगह है, गांव का समाज भी तो कोई चीज है! आखिर मुसलमानों को हमने बसाया है तो वे वैसे रहें, जैसा हम कहते हैं। पंचायत पर पंचायत चल रही है। कल की पंचायत भी बेनतीजा रही। मस्जिद वहां छोड़ कहीं बना लो, पैसे चाहे हमसे ले लो। एक दूसरा मत आता है, अगर मस्जिद होगी भी तो मुअज्जिन नहीं होना चाहिए, अजान का शोर नहीं चाहिए गांव को।

धरने पर बैठी बुजुर्ग महिला कहती हैं, पहले हम उसी जमीन पर टिन के नीचे नमाज पढ़ते थे, अब थोड़ा पैसा हुआ है तो हमारे बच्चे अच्छी मस्जिद बनाना चाहते हैं। हमारी मस्जिद तो बनेगी, क्यों नहीं बनेगी!

कहानी जानी-पहचानी है। मुसलमान अपनी शर्त पर रहना चाहते हैं। अपने धार्मिक अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते हैं। हिंदुओं को लगता है कि वैसे तो वे जी रहे हैं। मजहब उनके जीने के लिए अनिवार्य तो नहीं, उसके बिना भी तो वे जी सकते हैं; बिना मस्जिद के, बिना अजान के, बिना सामूहिक नमाज के।

जिसे हम सांप्रदायिक हिंसा कहते हैं उसका ढर्रा-सा बन गया है। हर जगह कोई एक स्थानीय कारण निकल आता है। मुजफ्फरनगर के मामले में लड़की से छेड़छाड़, त्रिलोकपुरी में माता की चौकी पर शराब पीकर उसे अपवित्र करना, बवाना में ताजिया से हिंसा की आशंका, अटाली में ‘अवैध’ मस्जिद निर्माण।

प्रश्न सिर्फ यह है, जिसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता कि अगर कारण या उकसावा स्थानीय होता है तो हमले में क्यों और कैसे हजारों लोग इकट्ठा हो जाते हैं? हिंसक समूह क्यों सिर्फ स्थानीय नहीं रहता? या, यह भी कि स्थानीय शिकायत का निबटारा करने बाहर के लोग क्यों आ जाते हैं और कैसे आने दिए जाते हैं?

हिंसा के बाद का ढर्रा भी पहचाना-सा है। हर बार कहा जाता है कि मुसलमान लौट सकते हैं, बशर्ते वे अपनी शिकायत वापस ले लें, किसी का नाम न दें, क्योंकि पहले तो गांव का कोई हमले में था ही नहीं और अगर हुआ भी तो क्या इसके लिए उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी जाए! फिर मुआवजे को लेकर भी फब्तियां कसी जाती हैं। मुसलमानों को अड़ियल, झगड़ालू और लालची घोषित कर दिया जाता है जो समझौते की पेशकश ठुकरा देते हैं, लेन-देन नहीं चाहते और बहुमत की भावना की इज्जत नहीं करते।

अटाली में कोई मारा नहीं गया है। कुछ घर ही फूंके गए हैं। यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं कि इसका राजनीतिकरण कर दिया जाए! लेकिन यह भी सच है कि इस सरकार की पहली वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर किया गया गया यह ‘राष्ट्रीय’ यज्ञ सिर्फ स्थानीय नहीं है। कोशिश की जा रही है कि इसे स्थानीय तक सीमित कर दिया जाए। राज्य सरकार ने इसका नोटिस लेना जरूरी नहीं समझा है, केंद्र की तो बात ही छोड़ दें, हालांकि यह इलाका एनसीआर में आता है जिसके प्रशासन पर अपने विशेष अधिकार को लेकर एक दूसरे मामले में केंद्र उच्चतम न्यायालय तक चला गया है। प्रधानमंत्री ने फिर शून्य में कहा है कि हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। तात्पर्य यह है कि जो कुछ हुआ है, उसे हिंसा कहना ही गलत है, वह तो झड़प भर है।

दो बज चुका है। कोई पानी की थैलियों की बोरियां रख गया है। पुलिस की एक दूसरी गाड़ी भी आ पहुंची है। ‘अगर इतनी पुलिस अटाली ऐन मौके पर पहुंच जाती तो आज यहां किसी को तरद््दुद न करनी पड़ती’, कोई तंज कसता है। लोग बिखर रहे हैं। अटाली वालों को शबनम शुक्रिया कहती हैं। ‘अरे, शुक्रिया कैसा बहन, आपने यह आवाज यहां उठाई।’ ‘आप बल्लभगढ़ आएं, आधी रात को भी। आपका घर है वहां बहन, कोई कह रहा है।’, घर! इतने भरोसे से यह कौन कह रहा है? जिसके घर का अभी ठिकाना नहीं!

लोग विदा हो रहे हैं, बैनर उतारे जा रहे हैं, ‘अल्पसंख्यकों पर हमले बंद करो’। संभाल कर, अभी और काम आएंगे, कोई कहता है।

हम आगे बढ़ जाते हैं। फोन की घंटी बज उठती है, ‘कल हमारा एक मित्र पत्रकार अटाली गया था, बड़ी रीवीलिंग बात मालूम हुई है। हमले की अगुआई औरतें कर रही थीं।’ शाहनवाज बताते हैं। ‘जानी हुई बात है। धरने पर कई लोगों ने बताया।’ हम जवाब देते हैं।

भूख लग आई है। दो घंटे बाद ‘अंधेरे में’ के कवि पर अशोक वाजपेयी का व्याख्यान है। समय पर पहुंचना जरूरी है।

अपूर्वानंद

 

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