December 10, 2016

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राजनीतिः जेल सुधार का इंतजार

दलित, आदिवासी और मुसलिम कैदियों का अनुपात कुल जनसंख्या में उनके अनुपात से कहीं ज्यादा है। पचपन फीसद विचाराधीन कैदी इन्हीं समुदायों से हैं। जेलों की हालत आम प्रशासनिक सलूक से भिन्न नहीं है। तमाम सरकारी महकमे इन्हीं समुदायों के साथ सबसे ज्यादा निष्ठुरता से पेश आते हैं। न्यायिक सुधार के बगैर जेलों की दशा नहीं सुधर सकती।

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत दुनिया का एक ऐसा मुल्क है जहां जेलों में कैदी ठूंस-ठूंस कर रखे गए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने साबित कर दिया है कि यदि इस गंभीर मसले को निपटाने में केंद्र, राज्य सरकारों और न्यायपालिका ने रुचि नहीं दिखाई तो आने वाले दिनों में भारतीय जेलों में पांव रखने की भी जगह नहीं रहेगी। ब्यूरो के मुताबिक, भारत में कैदियों की संख्या 4,11,992 है, जिनमें विचाराधीन कैदियों की संख्या 2,78,508 है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जेलों में बंद 67.6 फीसद लोगों के मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। दूसरी गौरतलब बात यह है कि भारतीय जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि देखें तो ऐसा स्पष्ट दिखता है कि दलित, आदिवासी और मुसलिम कैदियों का अनुपात कुल जनसंख्या में उनके अनुपात से कहीं ज्यादा है। ब्यूरो ने माना है कि पचपन फीसद विचाराधीन कैदी इन्हीं समुदायों से ताल्लुक रखते हैं। इस तरह जेलों की हालत आम प्रशासनिक सलूक से भिन्न नहीं है। तमाम सरकारी महकमे इन्हीं समुदायों के साथ सबसे ज्यादा बेरुखी से पेश आते हैं। यह अलग बात है कि इनके हितों की रक्षा के लिए कई विशेष प्रावधान किए गए हैं। दूसरी तरफ, रसूख वाले और दबंग कैदियों का हाल यह रहता है कि जेल में बंद होते हुए भी वे ऐशो-आराम की सारी सुविधाएं हासिल कर लेते हैं, कई तो अपनी आपराधिक गतिविधियां भी वहां से संचालित करते रहते हैं। समझा जा सकता है कि यह सब जेल प्रशासन की मिलीभगत और भ्रष्टाचार के बगैर संभव नहीं होता होगा।

 
यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चाहते हैं कि इन सब मामलों का निपटारा जल्द से जल्द हो। लेकिन कोलेजियम की सिफारिशों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में पद खाली रहते हैं, तो इसके लिए कोई और नहीं, सरकार ही जिम्मेवार है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर तो जजों की कम संख्या को लेकर कई बार न्यायपालिका की तस्वीर भारत सरकार के सामने में रख चुके हैं। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों व जिला अदालतों में जजों की कमी बरकरार है। विचाराधीन कैदियों की बढ़ती गई तादाद का जजों की संख्या कम होने से सीधा संबंध है। जजों के कम होने से लंबित मामलों की तादाद बढ़ती जाती है, और फलस्वरूप जेलों में विचाराधीन कैदियों की भीड़ भी। इसलिए न्यायिक सुधार के बगैर भारतीय जेलों की दशा नहीं सुधर सकती। व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह असल में एक मानवीय मसला है। विचाराधीन कैदियों में ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो बेगुनाह हों। फिर, उनमें ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने ऊपर लगे अभियोग की संभावित सजा से ज्यादा समय जेल में गुजार चुके होते हैं और मामले का निपटारा न होने के कारण जेल में सड़ते रहते हैं।
आजादी के बाद जेल सुधार की दिशा में कई समितियां बनाई गर्इं। इनमें मुख्य रूप से वर्ष 1983 में मुल्ला समिति, 1986 में कपूर समिति, 1987 में बनी अय्यर समिति थी। लेकिन इन सारी समितियों के सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तंग कोठरी में कैदियों के रहने की व्यवस्था, दवा की कमी, शैक्षणिक सुविधाओं के अभाव से निजात दिलाने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक तौर पर कई तरह की सेवाएं प्रदान करने की बात इन सिफारिशों में कही गई थी। इसके अतिरिक्त सजा-काल को स्वरोजगार की तैयारी से जोड़ने का सुझाव भी दिया गया था। मगर आज भी जेल सुधार की दिशा में कोई ठोस पहल शुरू न होना दर्शाता है कि हमारी राज्य-व्यवस्था में फिलहाल इसकी इच्छाशक्ति नहीं है।
इसके पहले के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी भयावह दिखती है। वर्ष 2010 से वर्ष 2014 के बीच तीस फीसद विचाराधीन कैदी तीन साल से अधिक समय से जेल में बंद रहे। वर्ष 2014 में हर दस में से सात विचाराधीन कैदी थे। जबकि हर दस में से दो को बिना दोषी ठहराए दो वर्ष से अधिक समय जेल में बंद रखा गया। जम्मू कश्मीर में 57 फीसद, गोवा में 52 फीसद, गुजरात में 48 फीसद विचाराधीन कैदी पाए गए। सबसे ज्यादा 18345 मामले उत्तर प्रदेश में देखे गए।
विचाराधीन कैदियों को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है। यह प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत भी है। लेकिन सच्चाई यह है कि जेल के अंदर उन्हें हिरासत के दौरान मनोवैज्ञानिक और शारीरिक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। बहुत सारे विचाराधीन कैदियों को कोई कानूनी सहायता नहीं मिल पाती। असल में जेल में रहते हुए उनके पास संसाधनों का अभाव रहता है। इतना ही नहीं, वकील से बात करने का मौका भी नहीं मिलता। ताजा आंकड़ों के मुताबिक जेलों में कैद पचहत्तर फीसद कैदी या तो अनपढ़ हैं या फिर अधिक से अधिक दसवीं कक्षा तक पढ़े हुए हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 सभी नागरिकों को गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार का भरोसा दिलाता है। इसी अनुच्छेद का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1980 में विचाराधीन मामलों की त्वरित सुनवाई के आदेश दिए थे। अधिकांश विचाराधीन कैदी गरीब और वंचित सामाजिक समूहों से आते हैं, जो काफी कम पढ़े लिखे होते हैं। इसलिए उनकी आवाज दबा दी जाती है। वर्ष 2005 में लागू दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436-ए में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि कोई कैदी, उसके ऊपर लगाए गए अभियोग की अधिकतम संभावित सजा की आधी अवधि फैसले के इंतजार में जेल में गुजार चुका हो तो अदालत उसे निजी मुचलके या बिना किसी जमानत के ही रिहा कर सकती है।

ऐसी बात भी नहीं है कि केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर नहीं आकृष्ट कराया गया। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी ने 1,382 जेलों की अव्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट को वर्ष 2013 में एक पत्र लिखा। उसके बाद जिलों में विचाराधीन कैदी समीक्षा समिति की स्थापना की गई और वर्ष 2015 से 31 जनवरी 2016 के बीच कम से कम छह हजार विचाराधीन कैदियों को रिहा भी किया गया। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि जितने कैदी रिहा किए गए वे भारतीय जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की कुल संख्या के महज दो फीसद थे। वर्ष 2013 में भी जेलों में हुए सर्वेक्षण के दौरान यह पाया गया कि जेल रिकार्ड में भारी विसंगतियां हैं। साथ ही, सूचना प्रणाली का प्रबंधन भी सही नहीं है।
इसके अतिरिक्त प्रभावी कानूनी सहायता की कमी, महिला पुलिस के अभाव, मार्गरक्षक पुलिस और वीडियो कॉन्फ्रेंस की भारी कमी के चलते भी कैदियों की संख्या में इजाफा होता है। भारत में जेलों की क्षमता से 112 फीसद ज्यादा कैदी वहां ठुंसे हुए हैं। कुल कैदियों में इक्कीस फीसद मुसलिम हैं। मुसलिम कैदियों की सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश की जेलों में है। उसके बाद बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। खुद केंद्रीय गृह मंत्रालय मानता है कि चार हजार से ज्यादा विचाराधीन कैदी छह साल से ज्यादा समय से जेल जीवन की यातनाएं भुगत रहे हैं। जेलों में बंद महिलाओं की स्थिति और भी ज्यादा बदतर है। कुल कैदियों में 5.6 फीसद महिलाएं हैं।

जेलों की स्थिति यह है कि जितनी जगह में सौ कैदियों को रखा जाना चाहिए उतनी जगह में सवा सौ कैदी रखे गए हैं। विधि आयोग ने अपनी 78वीं रिपोर्ट में वर्ष 1997 के हवाले से कहा है कि भारतीय जेलों में पचपन फीसद विचारधीन कैदी थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने भी कुछ समय पहले जारी अपने आंकड़ों में विचाराधीन कैदियों का यही अनुपात बताया है। जाहिर है कि इतने लंबे समय बाद भी स्थिति में कोई सुधार हुआ। यही नहीं, कई गैर-सरकारी सर्वेक्षणों का दावा है कि वर्तमान में विचाराधीन कैदियों का अनुपात सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा है, यह पचहत्तर फीसद तक हो सकता है। विचाराधीन कैदियों की त्रासद स्थिति किसी से छिपी नहीं है। न्यायपालिका और सरकार ने भी माना है कि कई विचाराधीन कैदी बेहद गरीब होते हैं जिन्हें मामूली अपराधों के आरोप में भी लंबी अवधि के लिए कैद कर दिया गया है।

विधि मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो मालूम पड़ता है कि उत्तर प्रदेश में 595, महाराष्ट्र में 306,गुजरात में 794 और बिहार में 792 न्यायाधिकारियों के पद आज भी रिक्त हैं। देश के चौबीस उच्च न्यायालयों में जजों के साढ़े चार सौ से ज्यादा पद खाली हैं। जजों की मौजूदा संख्या आवश्यकता से पैंसठ फीसद से भी कम है। निचली अदालतों में ढेर सारे पद खाली हैं। हालात यही रहे तो भारतीय अदालतों में तीन करोड़ से ऊपर लंबित मामलों का निपटारा कब तक हो पाएगा, कहा नहीं जा सकता। सरकार को विशेष रूप से इस मुद्दे पर गंभीर होना होगा। वरना विचाराधीन कैदियों की संख्या लगातार बढ़ती ही जाएगी। भारत सरकार को विधि आयोग के उस फार्मूले पर भी गौर करना चाहिए जिसमें आयोग ने सुझाव दिया है कि हर दस लाख की आबादी पर जजों की संख्या पचास कर दी जाए। जानबूझ कर जजों की नियुक्तियों को लटकाना निहायत अनुचित है। यों हर सरकार कहती यही रही है कि वह न्यायिक सुधार की राह में वित्तीय बाधा नहीं आने देगी। लेकिन हकीकत यही है कि आज तक किसी भी सरकार ने न्यायिक सुधार के तकाजे को गंभीरता से नहीं लिया।

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First Published on November 12, 2016 2:27 am

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