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चुनाव का तांता क्यों

अब वर्ष 2016 में पांच (असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पुदुच्चेरी), वर्ष 2017 में फिर पांच (गोवा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर) और वर्ष 2018 में सात (गुजरात, नगालैंड, कर्नाटक, मेघालय, हिमाचल, त्रिपुरा, मिजोरम) विधानसभाओं के चुनाव होने हैं।
मधेपुरा के एक विधानसभा क्षेत्र में वोटिंग के लिए अपनी बारी का इंतजार करते मतदाता। (पीटीआई फाइल फोटो)

पिछले साल केंद्र में मोदी सरकार आई, उसके बाद से महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं। अब वर्ष 2016 में पांच (असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पुदुच्चेरी), वर्ष 2017 में फिर पांच (गोवा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर) और वर्ष 2018 में सात (गुजरात, नगालैंड, कर्नाटक, मेघालय, हिमाचल, त्रिपुरा, मिजोरम) विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। इसके बाद 2019 में मौजूदा लोकसभा के अलावा ग्यारह विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा और 2020 में तीन विधानसभाओं का। इस हिसाब से चुनावों का तांता लगा रहेगा। देश के किसी भी कोने में चुनाव होने से दिल्ली की गद्दी पर बैठे दल या गठबंधन के पैरों में बेड़ियां पड़ जाती हैं। सतत चुनावी अग्निपरीक्षा से गुजरने का असर सरकार की नीतियों और घोषणाओं पर भी पड़ता है। हमारे यहां हर पांच साल के भीतर आम चुनाव के अलावा इकतीस विधानसभाओं के चुनाव होते हैं, जिन्हें कराने का जिम्मा चुनाव आयोग का है। अभी हर विधानसभा का कार्यकाल अलग-अलग है, इसीलिए बार-बार चुनाव होते हैं।

तीन साल पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर लिखी एक टिप्पणी में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने की वकालत की थी। विधि आयोग ने भी चुनाव सुधार संबंधी अपनी रिपोर्ट (170वीं) में कुछ ऐसा ही मत प्रकट किया था। संसद के शीतकालीन सत्र में पेश कार्मिक लोक शिकायत और विधि एवं न्याय मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट ने भी अनावश्यक खर्च बचाने तथा सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ड्यूटी से मुक्ति दिलाने के लिए केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ कराने के सुझाव पर अपनी मोहर लगा दी है। समिति के अनुसार इस कदम से देश में स्थिरता आएगी।

जल्दी-जल्दी चुनाव से सरकारी कर्मचारियों पर काम का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षकों को चुनावी ड्यूटी पर लगाया जाता है, जिसका असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ना लाजमी है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद ईएम सुदर्शन नाचप्पन की अध्यक्षता वाली उक्त संसदीय समिति ने अगले वर्ष सोलह विधानसभाओं तथा 2019 में लोकसभा के साथ-साथ शेष बची पंद्रह विधानसभाओं के चुनाव कराने का सुझाव दिया है। इसके अलावा किसी भी सूरत में लोकसभा और विधानसभाओं को तय अवधि से पहले भंग न करने की सिफारिश की है। राष्ट्रीय दलों ने समिति के सुझाव को ‘नेक’ विचार तो बताया है, मगर इस पर अमल के बारे में वे खुलकर कुछ कहने को राजी नहीं हैं।

पिछले करीब पांच दशक से हर साल होने वाले चुनावों के कारण हमारे लोकतंत्र की गाड़ी हिचकोले खा रही है। आजादी के बाद चार बार लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हुए, लेकिन फिर स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आया। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस कमजोर पड़ गई। जनता से कटकर उसके अधिकतर नेता विलासिता भरा जीवन जीने के आदी हो गए। कांग्रेस किसी तरह 1967 का आम चुनाव तो जीत गई लेकिन विधानसभा चुनावों में उसे करारा झटका लगा। गैर-कांग्रेस दलों ने पैर पसार लिए। मद्रास (अभी तमिलनाडु) में सीएन अन्नादुरै डीएमके सरकार के मुख्यमंत्री बने। ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब, केरल आदि राज्यों में भी विरोधी दल मजबूती से उभरे। केंद्र के साथ-साथ राज्यों में एकछत्र राज का कांग्रेसी दौर समाप्त हो गया।

इसके साथ ही मध्यावधि चुनाव का सिलसिला शुरू हो गया। निर्धारित अवधि से एक साल पहले इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा चुनाव करा दिए। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर वे चुनाव जीत गर्इं, मगर 1975 में आपातकाल लागू कर कांग्रेस को हाशिये पर ले आर्इं। 1977 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बनी, जो ढाई साल के भीतर गिर गई। 1980 से लेकर 1999 तक उन्नीस साल के भीतर सात बार लोकसभा चुनाव हुए। इंदिरा गांधी 1980 में फिर सत्ता में आ गर्इं। उनकी हत्या के बाद, सहानुभूति लहर के कारण 1984 के चुनाव में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला। 1989 के बाद केंद्र में गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू हुआ। दिल्ली में राजनीतिक उथल-पुथल से भरे इस दौर में राज्य सरकार बलि का बकरा बनती रही। केंद्र में जो भी पार्टी सत्ता में आई उसने कानून-व्यवस्था या अस्थिरता का बहाना बना कर विरोधी दल की सरकार को बेदखल कर दिया। पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही लोकसभा और विधानसभा भंग कर चुनाव कराना अपवाद नहीं, मानो परंपरा बन गई।

बार-बार मतदान की वजह से चुनावी खर्च बेतहाशा बढ़ चुका है। पिछले वर्ष भारत सरकार ने चुनावों पर 381.33 करोड़ रुपए खर्चे थे, जबकि इस साल 1555.40 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। एक साल में यह खर्चा चार गुना से ज्यादा बढ़ गया है। अपने प्रचार पर राजनीतिक दल अरबों-खरबों रुपए अलग फूंकते हैं, जिसका बोझ भी अंतत: जनता पर पड़ता है। आज यह बात तो सारे बड़े नेता भी मानते हैं कि देश की मौजूदा चुनाव व्यवस्था काले धन पर टिकी है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसार भारत में हर वर्ष छह सौ खरब का काला धन पैदा होता है जिसका दस फीसद हिस्सा विदेशों में जमा किया जाता है और बाकी देश में रहता है। इस काली कमाई का मोटा भाग राजनीतिक दलों को चंदे के तौर पर मिलता है।

हर पार्टी में जिन नेताओं के पास पैसा होता है, सत्ता का नियंत्रण भी उनके पास रहता है। वे ही टिकट बांटते और चुनाव लड़ाते हैं। ये नेता सबसे पहले अपने परिवार के सदस्यों को ही राजनीति में जमाने का प्रयास करते हैं। सोलहवीं लोकसभा के सांसदों की पृष्ठभूमि खंगालने पर पैसे और परिवार-मोह में जकड़ी पार्टियों की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इस बार संसद के निचले सदन के 543 में से कम से कम 130 सांसद ऐसे हैं जिनका रिश्ता किसी न किसी राजनीतिक परिवार से है। मतलब यह है कि मौजूदा लोकसभा के लगभग एक चौथाई सदस्य सियासी कुनबापरस्ती के झंडाबरदार हैं। यों भी कहा जा सकता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश राजशाही की पिट चुकी परंपरा पर लौट रहा है। यह संकेत इसलिए और भी चिंताजनक है कि अधिकतर पार्टियां और नेता परिवार-मोह में जकड़े हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फाइनेंस और पालिसी (एनआईपीएफपी) ने सरकार को काले धन पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जो लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी संसद के पटल पर रखी नहीं गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार बड़ी पार्टियों को मिलने वाले धन का तीन चौथाई स्रोत अज्ञात है। 2009-10 और 2010-11 के बीच कांग्रेस को 774.66 करोड़ रुपए मिले जिसमें से 88.11 फीसद का स्रोत अज्ञात था। इस दौरान भाजपा को चंदे के रूप में 426.01 करोड़ रुपए मिले, जिसमें से 77.24 प्रतिशत पैसा अनाम स्रोतों से आया। जबकि बहुजन समाज पार्टी को 172.67 करोड़ रुपए मिले जो शत-प्रतिशत अज्ञात हाथों ने दिया। वास्तव में राजनीतिक दल जन-प्रतिनिधित्व कानून की उस धारा का लाभ उठाते हैं जिसके अनुसार बीस हजार रुपए से कम के चंदे का स्रोत बताना जरूरी नहीं है। इसी कानूनी कमजोरी के कारण चुनावों में काला पैसा जम कर लगता है।

फिलहाल चुनावी चंदे के हम्माम में लगभग सारे दल नंगे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को विदेशी कंपनियों से पैसा लेने का दोषी पाया था। आंकड़े गवाह हैं कि कांग्रेस और भाजपा का लगभग सत्तासी फीसद चंदा कारपोरेट घरानों की देन है। कमोबेश यही स्थिति अन्य सभी दलों की है और इसीलिए वे चुनाव-व्यवस्था में सुधार के प्रति गंभीर नहीं हैं।

वैसे तो गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू होने और कड़ा दल-बदल विरोधी कानून बन जाने और बीआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किसी राज्य में विधानसभा को भंग करना आसान नहीं है, फिर भी केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू करने की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। यदि विधानसभा का कार्यकाल कानूनन पांच साल तय होने के बाद किसी राज्य में चुनाव के छह माह के भीतर ही केंद्र सरकार वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दे, तब शेष साढ़े चार साल वहां उसी का राज रहेगा। यह स्थिति किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं कही जा सकती और न ही ऐसे हालात को पूरी तरह नकारा जा सकता है।

एक महत्त्वपूर्ण तथ्य और है, जिस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। आज देश के आठ राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। इन सूबों से 165 सांसद चुने जाते हैं। इसी प्रकार नौ राज्यों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं जबकि वहां लोकसभा की सीटें 79 हैं। इस प्रकार देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों की इकतीस में से केवल सत्रह सूबों में सरकार हैं, जहां से कुल 244 सांसद चुने जाते हैं। बाकी बचे चौदह राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकार हैं, पर वहां से आने वाले सांसदों की तादाद कहीं अधिक (299) है। भले ही अब क्षेत्रीय दल दिल्ली में सत्ता-सुख भोग चुके हों, पर दोनों बड़े राष्ट्रीय दलों के प्रति उनके मन में आशंका का भाव बरकरार है। सालों-साल चलने वाले चुनाव कार्यक्रम को तरतीब में लाने के लिए उनका विश्वास जीतना जरूरी है। इसीलिए जब तक कायदे से क्षेत्रीय दलों की मंजूरी नहीं मिल जाती, तब तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का सपना साकार नहीं हो सकता।

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