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राज्य, कानून और नौकरशाही

हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आइएएस अधिकारी अशोक खेमका का उनकी नौकरी के तेईस सालों में छियालीस बार तबादला हो चुका है। यह तथ्य बेहद चौंकाने वाला और अनेक गूढ़ार्थों से भरा हुआ है।
Author May 4, 2015 17:57 pm

हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आइएएस अधिकारी अशोक खेमका का उनकी नौकरी के तेईस सालों में छियालीस बार तबादला हो चुका है। यह तथ्य बेहद चौंकाने वाला और अनेक गूढ़ार्थों से भरा हुआ है।

सवाल है, आखिर ऐसा कैसे होता है? इस सवाल का सिर्फ इतना-सा उत्तर कि भारतीय राजनीति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि उसमें खेमका जैसे ईमानदार अधिकारी के बने रहने का कोई स्थान नहीं बचा है, पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगता। अगर यही बात होती तो नौकरशाहों की इतनी बड़ी फौज में भारत में कम से कम दो-चार सौ लोग तो निश्चित तौर पर ऐसे होते जिनका चालीस-पचास बार तबादला हो चुका होता। इस बारे में हमारे पास पूरे तथ्य नहीं हैं, लेकिन पहले ऐसे मामले कम ही सुनने को मिले हैं।

इस बीच जो थोड़े से तथ्य आए हैं उनमें कर्नाटक कैडर के एमएन विजय कुमार, तमिलनाडु कैडर के यू सागायम, आंध्र प्रदेश कैडर के पूनम मालाकोंडिहा और राजस्थान कैडर की मुग्धा सिन्हा के क्रमश: सत्ताईस, बीस, छब्बीस और तेरह बार तबादले हो चुके हैं।

बहरहाल, हमारी जिज्ञासा इस प्रकार से बार-बार होने वाले तबादलों की वजह को लेकर है। दरअसल, आज दुनिया जिस गति से बदल रही है, उसका किसी को भी सही अनुमान नहीं है। हमारा देश भी बदलाव की इस आंधी से अछूता नहीं है। आर्थिक दुनिया नई तकनीक के जरिए गुणात्मक रूप से नए ढांचे में ढल रही है। पूंजीवादी प्रतियोगिता के दिन लद चुके हैं और अब घोषित रूप से पूंजीवादी इजारेदारी को साधा जा रहा है।

उत्पादन और वितरण के किसी भी क्षेत्र में एक के अलावा किसी दूसरे के लिए ठीक वैसे ही कोई जगह नहीं हो सकती, जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। पिछले दिनों टैक्सी चालक वैश्विक कंपनी उबर और कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में हो रहे अकल्पनीय प्रयोगों के संदर्भ में हमने देखा था कि अमेरिका का नया उद्यमी अब यह डंके की चोट पर कहता है कि किसी भी समस्या का एक ही श्रेष्ठ समाधान हो सकता है।

एक से अधिक समाधानों को मानना पराजयवाद है। अर्थात नव-उदारवाद के इस दौर में पूंजीवाद की दिशा प्रतिद्वंद्विता की दिशा नहीं, पूरी शक्ति के साथ इजारेदारी कायम करने की दिशा है। इसी बात को हम आज के शासक वर्ग का राजनीतिक विश्वास भी मान सकते हैं।

जाहिर है कि जिस समाज के अब तक के नियम-कानून घोषित तौर पर इजारेदारी को रोकने के लिए बने हों, वे कानून निश्चित तौर पर इस नई, अर्थ-जगत की सर्वव्यापी सच्चाई और शासक वर्ग के राजनीतिक विश्वासों के अनुरूप नहीं हैं, वे इसके हितों से सीधे टकराएंगे।

समाज और कानूनों का रिश्ता हमेशा कुछ ऐसा ही द्वंद्वात्मक होता है कि कभी कानून सामाजिक यथार्थ के वर्तमान स्वरूप से काफी आगे के सोच पर टिके होते हैं, और इसीलिए सिर्फ कानून की पोथियों की शोभा बढ़ाते हैं, आदमी के जीवन में कहीं नजर नहीं आते। और कभी किसी एक दिशा में समाज और प्रभुत्वशाली शासक वर्ग का सोच इतना आगे बढ़ चुका होता है कि मौजूदा कानून की उनसे कोई संगति नहीं होती और वे उसके आगे और बढ़ने के रास्ते की बाधा दिखाई देने लगते हैं।

अंगरेजों ने कठोर औपनिवेशिक शासन के लिए नौकरशाही का जो एक बहु-स्तरीय ढांचा तैयार किया, आजाद भारत में उसी को मिश्रित और अभावों से भरी अर्थव्यवस्था में राज्य के कठोर नियंत्रण के काम में लगाया गया। नारा दिया गया समाजवाद का, लेकिन नौकरशाही के जरिए शासक वर्गों के राजनीतिक विश्वासों के अनुरूप पूंजीवाद को संरक्षण देकर पनपाया गया, कोटा-परमिट राज के राजनीतिक भ्रष्टाचार में भी उसका भरपूर इस्तेमाल हुआ। लेकिन देखते ही देखते, पूंजीवाद के परवर्ती चरण में यही नौकरशाही इंस्पेक्टर राज का कारण दिखाई देने लगी, और स्वतंत्र व्यापार के हिमायतियों को नाना परेशानियों का सबब नजर आने लगी।

हालत यह हो गई कि कानूनों को बदल कर नौकरशाही के इस इंस्पेक्टर राज को खत्म करना 1991 के बाद की उदारवादी आर्थिक नीतियों का एक प्रमुख लक्ष्य बन गया। मजे की बात यह है कि शासकों के राजनीतिक विश्वास और निजी हितों और राज्य के कानून और संविधान के बीच के इन साफ अंतर्विरोधों के बावजूद बिना किसी बड़ी क्रांति के राज्य का यह ऊपरी, संविधान और कानून का ढांचा रातोंरात नहीं बदल सकता। शासक वर्गों और उनके राजनीतिक दलों के तमाम राजनीतिक विश्वासों के विपरीत आज तक अर्थव्यवस्था के सभी खेलों में कानूनन रेफरी के रूप में सरकार की भूमिका किसी न किसी रूप में बरकरार है।

सिद्धांतत: नव-उदारवाद के इधर के नए दौर में, शासक वर्गों का राजनीतिक नेतृत्व सरकार की रेफरी वाली भूमिका को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दोनों यह मानती हैं कि आर्थिक मामलों से सरकार को दूर ही रहना चाहिए। लेकिन मुश्किल की बात यह है कि शासक पार्टियां नीतिगत रूप से जिस बात को मानती हैं, हमारा कानून उस पर अमल की पूरी छूट नहीं देता।

इसीलिए नेताओं के भ्रष्टाचार की वजह से हो, या शासक पार्टियों के नीतिगत मत की वजह से, कानून और सरकार के बीच एक लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है। सरकार जिन वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है, उनके हित में उसका कर्तव्य यह है कि वह अपने विधायी कदमों के जरिए इस प्रकार के द्वंद्व को खत्म करे, और वह इसमें लगी भी रहती है।

फिर भी, अभी जिस तेजी के साथ अर्थव्यवस्था के सारे नियम बदल रहे हैं, बड़ी-बड़ी पूंजी का सर्वग्रासी खेल जिस वेग के साथ सामने आ रहा है, उसके साथ उसी गति से पूंजी के हित में कानूनों को बदलने में सरकारें अक्षम हैं। इसीलिए सरकार और कानून के बीच टकराहट आज का एक आम राजनीतिक दृश्य है। हाल में कोयला खानों के आबंटन के मामले में मनमोहन सिंह के गलत आचरण का जो मामला सामने आया है, वह सरकार की नीतियों और कानून के बीच, राज्य और राजनीतिक संविधान के बीच टकराहट का एक क्लासिक उदाहरण है।

दरअसल, जो यह मानते हैं कि कानून और संविधान हमेशा नागरिक समाज की जरूरतों की उपज होता है वे नागरिक समाज की ठोस सच्चाई को दरकिनार करते हुए उसे एक प्रकार का अमूर्त रूप दे देते हैं। यह खुद में एक आधुनिक परिघटना है। राज्य की अमूर्तता और राजनीतिक संविधान की यथार्थता सिर्फ आधुनिक युग में संभव हुई है, क्योंकि इसी युग में आदमी का निजी जीवन भी विभिन्न अधिकारों की मान्यताओं के चलते काफी हद तक स्वतंत्र और अमूर्त भी हुआ है। इस प्रकार आधुनिक राज्य के अमूर्तन को हम एक आधुनिक उत्पाद भी कह सकते हैं।

निजी क्षेत्र की स्वाधीन परिधि के विस्तार के साथ राजनीतिक संविधान के कार्यक्षेत्र का विस्तार होता है। मसलन, राजशाही के जमाने में, जहां वाणिज्य और भू-संपत्ति का क्षेत्र स्वतंत्र नहीं था, वहां राजनीतिक संविधान का कोई अस्तित्व नहीं था। आधुनिक काल में संपत्ति के निजी अधिकार की मान्यता ने राजनीतिक संविधान के क्षेत्र को ठोस और ज्यादा विस्तृत आधार प्रदान किया। सोचने पर लगता है कि जैसे आज समाजवादी राजनीतिक संविधान के विकास के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि व्यक्ति के निजी क्षेत्र को संकुचित करके वह कैसे स्वतंत्र राजनीतिक संविधान के यथार्थ को संभव बनाएगा।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी को यह कहने में जरा भी हिचक नहीं होती है कि संविधान उनके लिए आज का धर्म है। प्राचीन काल में राजनीतिक संविधान धर्म का ही क्षेत्र हुआ करता था- आदमी के यथार्थ पार्थिव अस्तित्व के विरुद्ध सामान्य नैतिकताओं का स्वर्ग। लेकिन आज यह साफ है कि यही स्वर्ग जब मनुष्यों के वर्गीय हितों की ठोस जमीन से टकराता है तब वह उतना पूजनीय नहीं रह जाता है, जितना कि वह अपने सामान्य अमूर्त रूप में होता है।

कहने के लिए तो कह दिया जाता है कि बिना परिवार के प्राकृतिक आधार और नागरिक समाज के कृत्रिम आधार के किसी भी राजनीतिक राज्य का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता है। ये दोनों एक-दूसरे के बने रहने की शर्त है। लेकिन एक-दूसरे के अस्तित्व की शर्त का अर्थ यह नहीं है कि इस शर्त और शर्त के परिणाम को एक मान लिया जाए, कारण को ही कार्य मान लें, निर्धारक को निर्धारित, उत्पादन के उपादानों को उत्पाद। इन दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क होता है।

नागरिक समाज संचालित होता है परस्पर-विरोधी वर्गों और उनके हितों की टकराहटों से। इससे आंख मूंद कर समाज और कानून के संबंधों के बारे में किसी भी सही नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

कानून इन हितों के अधीन होते हैं, उन पर आश्रित। इसीलिए परिवार या नागरिक समाज को राज्य के विकास का तार्किक कारण बताना एक कोरी प्रवंचना है। वर्गीय हितों के अलावा ऐसा दूसरा कोई सूत्र नहीं है जिससे यह पता चल सके कि कैसे नागरिकों की भावनाएं, परिवार और सामाजिक संस्थाओं की भावनाएं स्वत: राजनीतिक विश्वास का रूप ले लेती हैं। राजनीतिक संविधान में वे कैसे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं!

जब समाज, सरकार और कानून संबंधी विमर्श के इस पूरे परिप्रेक्ष्य में हम औसतन हर छह महीने पर अकारण खेमका के तबादले की घटना को देखते हैं तो इस अजीबोगरीब रहस्य पर से थोड़ा परदा उठता हुआ दिखाई देता है।

राजनीतिकों का भ्रष्टाचार और धींगामुश्ती तो इसका प्रमुख कारण है ही, इसके अलावा सामाजिक विकास के साथ कानून की असंगति भी निश्चित तौर पर इसमें एक भूमिका अदा कर रही है, जिसकी वजह से कानून की बातों के अक्षरश: पालन पर बल देने वाले खेमका की तरह के ईमानदार अधिकारी को कहीं भी और जरा भी चैन नहीं है। उनका छियालीस बार तबादला हुआ, लेकिन कभी भी उन पर अयोग्यता या कानून-विरोधी आचरण का कोई आरोप नहीं लगाया गया। कानून के इस कथित शासन में स्वतंत्र रूप से कानून का पालन ही खेमका का सबसे बड़ा गुनाह साबित हो रहा है।

राज्य के सिद्धांत के केंद्र में मनुष्य होता है, लेकिन स्वतंत्र मनुष्य नहीं, परतंत्र मनुष्य। इस अर्थ में हम मौजूदा जनतंत्र को परतंत्रता का जनतंत्र कह सकते हैं। खेमका के दुश्मनों में अन्य चीजों के अलावा उसका निजी स्वतंत्रता-बोध भी शामिल है। अशोक खेमका नेता-मंत्री के भ्रष्टाचार के जितने शिकार हैं, उतने ही भाजपा और कांग्रेस की वर्गीय नीतियों के भी हंै, हमारे देश का वर्तमान कानून जिन पर अमल की पूरी तरह इजाजत नहीं देता।

अरुण माहेश्वरी

 

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