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बैंकों की बिगड़ती सेहत

सरकारी बैंकों को खतरे से उबारने के लिए सरकार ने एक बार फिर अपना खजाना खोल दिया है। अगले चार वर्षों में वह इन बैंकों को सत्तर हजार करोड़ रुपए देगी। इस वर्ष इन बैंकों को पच्चीस हजार करोड़ रुपए की मदद मिलेगी।
Author August 20, 2015 08:45 am
चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही में घरेलू बैंकों के फंसे हुए कर्जों में छियासी फीसद तक बढ़ोतरी हुई है। कंपनियों की बिगड़ती वित्तीय स्थिति के कारण बैंकों की आर्थिक सेहत में यह गिरावट दर्ज की जा रही है। फंसे कर्ज में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में दर्ज की जा रही है, जबकि कंपनियों के कर्ज पुनर्गठन के मामले रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं।

सरकारी बैंकों को खतरे से उबारने के लिए सरकार ने एक बार फिर अपना खजाना खोल दिया है। अगले चार वर्षों में वह इन बैंकों को सत्तर हजार करोड़ रुपए देगी। इस वर्ष इन बैंकों को पच्चीस हजार करोड़ रुपए की मदद मिलेगी। पिछले पांच वर्षों में सरकार बैंकों को चौंसठ हजार करोड़ रुपए पहले ही दे चुकी है। गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) यानी फंसे हुए कर्जों में बढ़ोतरी और लगातार घटते मुनाफे के कारण सरकारी बैंक खतरे में चल रहे हैं। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 2015-16 का आम बजट पेश करते हुए कहा था कि सरकारी बैंकों को दो लाख चालीस हजार करोड़ रुपए की जरूरत है।

सवाल है कि इन बैंकों की ऐसी दशा कैसे हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं। हमारे बैंक खुद कर्ज के जाल में फंसे हुए हैं, फिर उनके फंसे हुए कर्जों में छियासी फीसद वृद्धि हुई है। कभी वित्तीय बाजार को अपनी अंगुली पर नचाने वाले बैंक आज पूंजी के लिए बीमा और म्युचुअल फंड कंपनियों से कर्ज के मोहताज हैं। यह एक नए तरह का (लिक्विडिटी डेफिसिट) संकट है। इस संकट से बैंकों को बाहर निकालने के लिए रिजर्व बैंक को फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा।

बैंकों को संकट से उबारने के लिए सरकार ने सात स्तरीय इंद्रधनुष रणनीति बनाई है। इसके अंतर्गत बैंकों की पंूजी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ उनके कामकाज पर निगरानी के लिए बैंक बोर्ड ब्यूरो के गठन का भी प्रस्ताव है। अपै्रल 2016 से बैंक बोर्ड ब्यूरो अपना कामकाज शुरू करेगा। इसका उद्देश्य सरकारी बैंकों को सक्षम और उन्हें निजी बैंकों के बराबर या उनसे बेहतर बनाना है।

कृषि और लद्यु तथा मध्यम उद्योग के क्षेत्र में अच्छा काम करने वाले कुछ बैंक स्थानीय क्षेत्र के अच्छे खिलाड़ी बन सकते हैं। सरकारी बैंकों में ‘एंप्लाई स्टॉफ आॅप्शन’ देने पर विचार हो सकता है। वित्तीय सेवाओं के सचिव हंसमुख अधिया के अनुसार सरकारी बैंकों का एकीकरण वक्त की जरूरत है और अगर प्रस्तावित बैंक बोर्ड ब्यूरो इन बैंकों को अपने स्तर से कदम उठाने को राजी नहीं कर सका, तो सरकार को दखल देना पड़ सकता है। इसका मतलब है कि कुछ सरकारी बैंकों का विलय भी किया जा सकता है।

‘फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट’ के अनुसार बैंकों की तरफ से दिए गए कर्जों और एनपीए का अनुपात खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आने वाली कुछ तिमाहियों में एनपीए की स्थिति और बिगड़ सकती है। इस वजह से बैंकों को अपने मुनाफे से ज्यादा राशि का प्रावधान फंसे कर्जों के नुकसान की भरपाई के लिए करना पड़ सकता है। यों सभी बैंकों के एनपीए का स्तर ठीक नहीं है, लेकिन सरकारी बैंकों की स्थिति ज्यादा खराब हुई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार बीते वित्तवर्ष के दौरान सभी सरकारी बैंकों का सकल एनपीए दो लाख पचपन हजार एक सौ अस्सी करोड़ रुपए था। यह कुल अग्रिम का 5.20 फीसद है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर कर्जों के एनपीए में तब्दील होने की संभावना है।

पिछले हफ्ते आधा दर्जन सरकारी बैंकों ने अपै्रल से जून, 2015 की तिमाही के वित्तीय नतीजों का एलान किया। देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक पीएनबी का शुद्ध लाभ उनचास फीसद घट कर सात सौ इक्कीस करोड़ रुपए रह गया है। बैंक का कहना है कि फंसे कर्जे (एनपीए) की राशि का समायोजन करने के लिए उसे राजस्व के एक हिस्से का इस्तेमाल करना पड़ता है। इस तिमाही में पीएनबी का सकल एनपीए 25,397 करोड़ रुपए रहा। पिछले वर्ष की तिमाही में यह राशि 19,603 करोड़ रुपए थी।
यही हाल बैंक ऑफ इंडिया का रहा है।

पिछली तिमाही में इसका मुनाफा चौरासी फीसद घट कर 129.72 करोड़ रुपए रह गया। इसी तरह सिंडिकेट बैंक का शुद्ध लाभ बत्तीस फीसद कम होकर तीन सौ दो करोड़ रुपए रहा। यूनियन बैंक आॅफ इंडिया का मुनाफा भी बाईस फीसद घट कर पांच सौ उन्नीस करोड़ रुपए हो गया। इनके खराब प्रदर्शन के लिए फंसे कर्जे की समस्या जिम्मेदार है। इन सभी बैंकों का एनपीए स्तर पिछली तिमाही में बढ़ा है।

मजबूत बैंकिग व्यवस्था किसी भी अर्थव्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है, क्योंकि आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं साख पर टिकी होती हैं। भारत का बैंकिग उद्योग जमाकर्ताओं के भरोसे की कथा सुनाते थकता नहीं था, लेकिन 2011-12 में बैंकों की जमा वृद्धि दर दस साल के सबसे निचले स्तर (17.7 से 13.7 फीसद) पर आ गई। जमाकर्ताओं के इस बदले व्यवहार से भारतीय बैंकिंग में जोखिम के पैमाने ही बदल गए हैं। बैंकों ने अपनी दैनिक पूंजी जरूरतों के लिए मार्च 2012 के दौरान पूरे वित्तीय तंत्र से जो उधार लिया, उसमें बीमा कंपनियों का हिस्सा सत्ताईस और म्युचुअल फंडों का सैंतीस फीसद था। इनमें भी म्युचुअल फंड से लिए गए उधार छोटी अवधि के हैं। यानी अचानक पैसा निकालने से बैंक लड़खड़ा सकते हैं।

भारत का वित्तीय तंत्र (बैंक, बीमा म्युचुअल फंड, शेयर बाजार) आपस में गहराई से जुड़ चुका है। यह अच्छा बदलाव है, लेकिन जब बैंकों में रोजमर्रा की पूंजी की कमी हो, तब संबद्धता जोखिम भरी हो जाती है। फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट मानती है कि भारत में सबसे ज्यादा संबद्ध बैंक अगर किसी मुश्किल में फंसते हैं, तो पूरा तंत्र लड़खड़ा जाएगा और अगर बैंकों को कर्ज देने वाली बीमा और म्युचुअल फंड कंपनियां टूटीं तो भी पूरे तंत्र में दरारें आएंगी।

चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही में घरेलू बैंकों के फंसे हुए कर्जों में छियासी फीसद तक बढ़ोत्तरी हुई है। कंपनियों की बिगड़ती वित्तीय स्थिति के कारण बैंकों की आर्थिक सेहत में यह गिरावट दर्ज की जा रही है। फंसे कर्ज में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में दर्ज की जा रही है, जब कंपनियों के कर्ज पुनर्गठन के मामले रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। चालू वर्ष की पहली दो तिमाहियों में अब तक चौहत्तर कंपनियों का कर्ज पुनर्गठित किया जा चुका है। इसके तहत कुल चालीस हजार करोड़ रुपए के कर्ज का पुनर्गठन हुआ है।

इस दौरान कुल पैंतीस बैंकों ने अपने कुल फंसे हुए कर्ज (एनपीए) में बढ़ोतरी की जानकारी दी है। कुल पैंतीस बैंकों के एनपीए बीती छमाही में अट्ठाईस फीसद बढ़े हैं, इससे इनके खराब गुणवत्ता वाले कर्ज बढ़ कर 1.47 लाख करोड़ रुपए के हो गए। इस अध्ययन में विदेशी बैंकों और गैरसूचीबद्ध घरेलू बैंकों को शामिल नहीं किया गया। इन सभी पैंतीस बैंकों के सकल एनपीए पिछले साल की समान छमाही में देश के पूरे बैंकिंग तंत्र के सकल एनपीए से ज्यादा रहे हैं।

अगर बिजली क्षेत्र की दशा सुधारने के लिए शीघ्र प्रभावशाली कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव सरकारी बैंकों पर ही पड़ेगा। यूपीए सरकार के दबाव में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सरकारी बैंकों ने बिजली कंपनियों को दिल खोल कर कर्ज दिया है, लेकिन अब इनसे कर्ज वसूलना मुश्किल हो गया है। इस समय देश की विभिन्न बिजली परियोजनाओं में बैंकों के लगभग तीन लाख करोड़ रुपए फंसे हुए हैं। पिछले दिनों सरकारी बैंकों ने वित्त मंत्रालय को संदेश भेज कर स्थिति की गंभीरता बताने की कोशिश की। बैंकों ने कहा है कि बिजली क्षेत्र की स्थिति नहीं सुधरी तो उनके लिए आगे ज्यादा कर्ज देना मुश्किल होगा।

30 सितंबर, 2011 तक के आंकड़े बताते हैं कि बिजली कंपनियों पर बैंकों के कुल 2,97,762.53 करोड़ रुपए बकाया हैं। बैंकों के इस रुख से सरकार भी पशोपेश में है, क्योंकि अप्रैल 2012 से शुरू बारहवीं योजना के दौरान देश में एक लाख मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकेगा, जब बिजली परियोजनाओं को बैकों से कर्ज मिलेगा, पर आंकड़ों के अनुसार वित्तवर्ष 2010-11 के दौरान सिर्फ तीन बैंकों को बिजली परियोजनाओं से समय पर कर्ज की वापसी हुई है। बैंक आॅफ बड़ौदा, देना बैंक और यूको बैंक को छोड़ कर अन्य सभी बैंकों के लिए बिजली परियोजनाओं से कर्ज वसूलना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ऐसे में कई बैंकों के फंसे कर्जे (एनपीए) में भारी वृद्धि का खतरा उत्पन्न हो गया है। रिजर्व बैंक ने भी पिछले हफ्ते वार्षिक स्थायित्व रिपोर्ट में इस खतरे को लेकर चेतावनी दी थी।

आज वित्तमंत्री अरुण जेटली के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू बैंकों को मजबूत बनाने की है। विदेश व्यापार के मामले में हमारा घाटा लगातार बढ़ रहा है। इसलिए हमारे सामने जोखिम अधिक है। अगर हमारी बैंकिंग व्यवस्था लड़खड़ाई, तो अर्थव्यवस्था को लड़खड़ाते देर नहीं लगेगी। अमेरिका में बैंकिंग व्यवस्था के लड़खड़ाने से उसे भीषण मंदी के दौर से गुजरना पड़ा, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा। भारत में भी 1947 से लेकर 1955 तक हर साल चालीस बैंक दिवालिया हुए और 1967 तक सिर्फ इक्यानबे बैंक बचे रहे। भारत सरकार ने इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके इन्हें सरकारी बैंक में बदल दिया। 1991 से 2001 के बीच बाईस निजी बैंकों को लाइसेंस बांटे गए, पर इनमें से सिर्फ चार बैंक मजबूती से टिक पाए।

वित्तमंत्री ने पिछले महीने बैंकों के साथ बैठक के बाद उम्मीद जताई थी कि एनपीए की समस्या धीरे-धीरे खत्म होगी। लेकिन बैंकों के आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या और बिगड़ती जा रही है। रेटिंग एजेंसी मूडीज की रिपोर्ट में बताया गया है कि इन बैंकों की समस्या अगले वित्तवर्ष में भी जारी रहेगी।

निरंकार सिंह

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