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बंगलुरु का सीधा सबक

उन दिनों पुलिस के पास आज जैसी टेक्नोलॉजी नहीं थी। बंगलुरु में मौके पर वीडियो कैमरा होना काम आया।
एक निजी टीवी चैनल द्वारा बेंगलुरु में नए साल की रात को हुए महिला उत्पीड़न के वीडियो का स्क्रीनशॉट।

वीडियो कैमरे अपराध की रोकथाम नहीं करते, उन्हें रिकॉर्ड करते हैं। नववर्ष आगमन पर बंगलुरु में वीडियो में कैद व्यापक यौनहिंसा का सामान्य जन के लिए यह एक सीधा सबक है। कानून-व्यवस्था की एजेंसियों को पता होना ही चाहिए कि इन कैमरों का फायदा अपराध के हॉटस्पॉट चिह्नित करने और वहां की निगरानी कारगर करने में हो सकता है, यानी केवल सीमित अर्थों में रोकथाम के लिए।  इस बीच सोशल मीडिया पर वायरल हुआ बंगलुरु का एक वीडियो, जिसमें दो बौराए युवक एक रिहायशी मोहल्ले में अपनी राह जाती, सामान्य वेशभूषा की युवती पर अनायास पागल कुत्तों की तरह टूट पड़ते हैं और दो-तीन मिनट अपनी यौनिक भड़ास निकालते दिखते हैं, किसी को भी क्रोध और नफरत से पागल कर देगा। यहां तक कि उन युवकों को कुछ दिन बाद कानून की हिरासत में भी बेफिक्र अंदाज में देखना, आश्वस्त नहीं करता। हालांकि असली बुरी खबर यह है कि इस प्रकरण ने समाज को कहीं अधिक लाचारी और दहशत से भर दिया है। स्त्रियां अच्छी तरह जानती हैं कि हमारे समाज की ऐसी रक्षात्मक मन:स्थिति उनके सशक्तीकरण की राह में कितना बड़ा रोड़ा है।

यदि वे कठोर सच्चाई का सामना करना चाहें तो नीति निर्धारकों के लिए भी बंगलुरु की उद्वेलित करने वाली रिकॉर्डिंग में एक बेहद महत्त्वपूर्ण और दो-टूक सबक छिपा है- जेंडर समानता पर आधारित स्त्री-सुरक्षा के माहौल में ही पुलिस सुरक्षा की कवायद सार्थक होगी। इसके बिना दुनिया का कोई भी संविधान, कैसा भी विधिशास्त्र, व्यवहार में स्त्री सुरक्षा की विश्वसनीय गारंटी नहीं बन सकता। भारत ही नहीं, दुनिया भर में बेहद लंबी डगर है यह! हॉलीवुड की आॅस्कर विजेता अभिनेत्री नैटली पोर्टमैन ने हाल में अपने स्वयं के उदाहरण से दावा किया कि वहां की फिल्मों में पुरुष के मुकाबले महिला कलाकार को एक तिहाई मेहनताना ही मिलता है। बॉलीवुड की ताजातरीन रिकॉर्डतोड़ फिल्म ‘दंगल’ में पहलवान की भूमिका करने वाली कश्मीरी अभिनेत्री जायरा वसीम को मिली सार्वजनिक धमकी की बाढ़ कट्टरपंथी इस्लामवादियों की कोरी जेंडर भभकी नहीं, देश के संविधान को खुली चुनौती भी है। आश्चर्य नहीं कि भारतीय विधिशास्त्र में इन शैतानी कृत्यों के लिए कठोरतम दंड की व्यवस्था नहीं है।

ठीक है, हमें कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। लेकिन कानून, समाज के हाथ से इस कदर बाहर भी नहीं निकल जाना चाहिए कि उसका मतलब का ही न रह जाए। जंगली प्राणियों से बचने के उपायों और पगलाए कुत्तों को काबू करने में फर्क होना ही चाहिए। क्या कानून की मंशा भी इसी अनुरूप नहीं पढ़ी जानी चाहिए? गंभीर सामाजिक अपराध करने वाले को कोई भी, सिर्फ पुलिसकर्मी नहीं, कानूनन पकड़ सकता है। बंगलुरु के वहशी अपराधियों को काबू करते समय जितनी जरूरत हो उसके मुताबिक बल प्रयोग की इजाजत भी कानून देता है। इन्हें हाथ-पैर सलामत रखते हुए काबू करना तो समाज की प्राथमिकता नहीं हो सकता। यह तो कानून की शुचिता के नाम पर समाज को और भयभीत बनाना ही हुआ। बंगलुरु जैसे लचर प्रदर्शन के दम पर स्त्री-सुरक्षा को लेकर सामान्य जन को आश्वस्त करने की आप सोच भी कैसे सकते हैं भला? बरबस अपने पेशेवर जीवन से एक प्रकरण याद आ गया। मई 1992 में मैं रोहतक का एसपी लगा था। शायद चौथे ही दिन, एक नौजवान लड़की को, जो अपने मोहल्ले में ही रात्रि भोजन के बाद मां के साथ चहलकदमी के लिए निकली थी, मारुति वैन में चार लड़कों ने खींच लिया। घर-मोहल्ले वाले बदहवास मेरे पास रेस्ट हाउस पहुंचे, मैं भी खाना छोड़ कर सीधा पास में पुलिस कंट्रोल रूम दौड़ा। मिनटों में हमने दर्जनों पुलिस दस्तों से हर दिशा को खंगालना शुरू कर दिया था। जिले भर की पुलिस नाकों और खोज दस्तों में बदल गई। अंतत: हमने उन्हें पकड़ लिया। वे अपने राजनीतिक संबंधों की दुहाई देते रहे, पर किसी के हाथ-पैर सलामत नहीं बच सके। लड़की, मां-बाप, मोहल्ले वाले ही नहीं, सारा शहर उस रात आश्वस्त हुआ। अगले दिन रोहतक बार के सैकड़ों वकील मुझे मिलने आए, यह बताने को कि कोई उन दरिंदों की पैरवी नहीं करेगा और न पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़ा करने की उनके पैरोकारों की दलील आगे बढ़ाएगा। अपराधियों ने अपने मुकदमे में सजा की मात्रा पर हुई बहस में यह तर्क भी देना जरूरी समझा था कि घटना की रात ही उन्हें भरपूर सजा मिल गई थी।

उन दिनों पुलिस के पास आज जैसी टेक्नोलॉजी नहीं थी। बंगलुरु में मौके पर वीडियो कैमरा होना काम आया। पर सोचिए, भला किसके? राज्य और पुलिस के ही। अपराधियों की बाद में पहचान करने और उन्हें पकड़ने में हो सकता है यह रिकार्डिंग बाद में अपराधियों को सजा दिलाने में भी मददगार सिद्ध हो। लेकिन वहशीपन को रोक पाने या उस क्षेत्र को सुरक्षित कर पाने में? पीड़ित की मदद कर पाने या अपराधियों पर दबाव बना पाने में? जाहिर है, नहीं। इसके लिए हजारों वीडियो कैमरों पर 24/7 के हिसाब से निगरानी चाहिए, और उनसे जुड़े सैकड़ों तत्पर मोबाइल दस्ते भी, जो मिनटों में किसी भी घटनास्थल पर रोकथाम के लिए तुरंत भेजे जा सकें। इस दिशा में कौन सोचेगा? अन्यथा स्त्री-सुरक्षा के नाम पर चप्पे-चप्पे पर वीडियो कैमरा लगाने का वादा चुनावी नारों का उद््देश्य ही सार्थक करता रहेगा। मुझे याद आता है, बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अफसरों के एक समूह को संबोधित करते हुए ‘अभय दान’ को पुलिस का विशिष्ट लक्षण चिह्नित किया था। उनका तर्क था कि जनता को राज्यसत्ता से जो भी हासिल हो सकता है, उसमें अभय का तत्त्व पुलिस के सिवा और कोई संस्था मुहैया नहीं कर सकती। दरअसल, प्राय: देरी और दौलत की जकड़ पर निर्भर न्याय-व्यवस्था की मौजूदा स्थिति में जनता के लिए भी अच्छी और बुरी पुलिस का फर्क इसी समीकरण का कायल हो गया लगता है। लिहाजा, बंगलुरु के पिशाचों को, बेशक कानून की गिरफ्त में, अपने पांवों पर आराम से खड़ा देखना उसे आश्वस्त-कर नहीं लग पाता।

भारतीय समाज को कानून के हाथों स्त्री-सुरक्षा की ऐसी तकनीकी बानगी हरगिज स्वीकार्य नहीं है। नहीं, मैं प्रदर्शनात्मक दंड व्यवस्था का कतई पक्षधर नहीं हूं। अच्छी तरह जानता हूं कि थर्ड डिग्री एक पेशेवर मरीचिका है और सार्वजनिक रूप से कोड़े मारना या हाथ-पैर काटना व्यर्थ की कवायदें। दुनिया भर का अनुभव इन्हें अपराध निवारण की असफल पद्धति सिद्ध करने वाला ही रहा है। हां, मैं प्रदर्शनात्मक रोकथाम की बात कर रहा हूं, बल्कि वर्तमान न्याय पारिस्थितिकी में उसकी बाकायदा वकालत कर रहा हूं। दरअसल, मैं कानून-सम्मत बल प्रयोग के पारदर्शी प्रदर्शन को स्वीकारने भर की अपील कर रहा हूं, उसकी अनिवार्यता और उसकी अति को भी! पुलिस की अपनी कार्य-प्रणाली में बंगलुरु जैसे नववर्ष बंदोबस्त की व्यापक वीडियो रिकॉर्डिंग करना नत्थी होता है। यदि बंगलुरु पुलिस, पारदर्शी बल प्रयोग को लेकर प्रतिबद्ध पुलिस रही होती तो तत्काल उसकी ओर से उस दौरान हुई अराजकता से निपटने के संबंधित वीडियो जारी किए गए होते। आम जन के लिए भी बेहद आश्वस्तकर होता यह जानना कि उसकी पुलिस कितनी मुस्तैद रही थी। याद रखिए, बंगलुरु जैसे प्रकरण में पुलिस की निष्क्रियता भी जवाबदेह होनी चाहिए, सिर्फ अराजकता को कोसने से पाश्चात्य संस्कृति के भूतों से स्त्री को नियंत्रित करने वालों को ही मजबूती मिलेगी। क्या आज स्त्री को अंगों और कपड़ों की बहस में उलझा कर उसकी सुरक्षा को लेकर संतुष्ट हुआ जा सकता है? क्या मीडिया उबाल और व्यापक जन-आक्रोश के प्रदर्शन के बावजूद निर्भया प्रकरण तक को एक बरसी अनुष्ठान मात्र नहीं बना दिया गया है?

 

 

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