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अमेठी में तो कोई नहीं बचा पाया राहुल गांधी की इज्‍जत, पर अमेरिका से पढ़ कर लौटी अदिति ने रायबरेली में रख ली सोनिया गांधी की लाज

भाजपा की आंधी में जहां एक से एक बड़े-बड़े महारथी चुनाव हार गए वहीं अमेरिका से पढ़ाई कर लौटी पहली बार चुनाव लड़ रही अदिति सिंह ने जीत का परचम लहराया।

11 मार्च को जब यूपी विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आए तो बहुत से लोगों का ध्यान एक विधानसभी सीट पर जरूर गया। वो विधानसभा सीट थी रायबरेली सदर। इस सीट से अदिति सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर सबको चौंका दिया। दरअसल भाजपा की आंधी में जहां एक से एक बड़े-बड़े महारथी चुनाव हार गए वहीं अमेरिका से पढ़ाई कर लौटी पहली बार चुनाव लड़ रही अदिति सिंह ने जीत का परचम लहराया। अदिति सिंह खासे रसूख वाले दबंग विधायक अखिलेश सिंह की बेटी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का तो ये भी मानना है कि अदिति सिंह की जीत ने सोनिया गांधी की लाज बचा ली क्योंकि रायबरेली क्षेत्र हमेशा से गांधी परिवार के लिए अहम रहा है।

गांधी परिवार ने अपने गढ़ रायबरेली में सियासी तौर पर बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन उन्हें एक मलाल हमेशा रहा कि वो कभी बाहुबली विधायक अखिलेश सिंह को नहीं हरा पाए। रायबरेली में नेताजी के नाम से मशहूर अखिलेश सिंह के जलवे के आगे गांधी परिवार का जलवा हमेशा फीका रहा। अखिलेश सिंह कभी कांग्रेस पार्टी के ही विधायक थे, लेकिन सैय्यद मोदी हत्याकांड में नाम उछलने के बाद कांग्रेस ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। 3 बार कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचने वाले अखिलेश सिंह बाद में निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत भी गए। उसके बाद उन्होंने पीस पार्टी के टिकट पर चड़कर भी फतह हासिल किया।

राय बरेली में अखिलेश सिंह का जो जलवा है उससे हर कोई वाकिफ है। इसिलिए तो जब अखिलेश सिंह ने अपनी जगह अपनी बेटी को चुनाव लड़ाने का मन बनाया तो एक बार फिर से कांग्रेस उन पर डोरे डालने लगी। खुद प्रियंका गांधी ने अपने खास संज. सिंह को इस बात की जिम्मेदारी सौंपी कि वो अखिलेश सिंह से बात करें और उनकी बेटी को कांग्रेस का टिकट ऑफर करें। संजय लिंह ने भी अपने सारे दाव पेंच आजमाते हुए अदिति सिंह को कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के लिए राजी कर लिया।

ये अखिलेश सिंह का ही दबदबा है कि उनकी बेटी अदिति को कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद की मौजूदगा में पार्टी में शामिल कराया गया। अदिति सिंह को इतनी तवज्जो देखर पार्टी में शामिल करने के पीछे कांग्रेस की साफ मंशा ये थी कि चाहे कुछ भी हो जाए अखिलेश सिंह अपनी बेटी को चुनाव हारने नहीं देंगे। कांग्रेस ये भी जानती थी कि अखिलेश सिंह की बादशाहत के आगे चुनाव में उनके विरोधी बगले झांकते नजर आते हैं।

11 मार्च को जब चुनाव के नतीजे आए तो अदिति सिंह को लेकर कांग्रेस की अपनी सोच सही साबित हुई। जहां पूरे प्रदेश को मोदी लहर ने भगवा रंग में रंग दिया वहां सोनिया के गढ़ में अदिति सिंह ने ना सिर्फ कांग्रेस की लाज बचाई बल्कि भाजपा के प्रत्याशी को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। अदिति सिंह ने अपने निकटतम प्रत्याशी बसपा के मोहम्मद शहबाज खान को 90 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर अपने पिता के साम्राज्य को भी आगे बढ़ाया।

अदिति सिंह भले ही अमेरिका में पली बढ़ी हों लेकिन राजनीति में उनका अंदाज अपने पिता की ही तरह नजर आता है। इस बात की तकसीद उनका एक बयान से होती है। दरअसल चुनाव जीतने के बाद जब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि आपकी पार्टी सिर्फ 7 सीटें जीत पाई है और आपके विरोधी 300 से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रहे हैं, ऐसे में आप अपना काम कैसे करा पाएंगी? पत्रकार के इस सवाल के जवाब में अदिति सिंह ने अपने पिता का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ लोग होते हैं जिनके काम कोई भी सरकार नहीं रोक सकती।

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