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राजनीतिः रेलवे क्रॉसिंग और हादसों का सफर

ट्रेन के मुसाफिर हों या रेलवे क्रॉसिंग से गुजरने वाले पैदल राहगीर और वाहन, लोगों की सुरक्षा रेलवे की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। घोषणाओं पर जाएं तो रेलवे इस तकाजे से अनजान नहीं है। हर साल रेल बजट में सुरक्षा के मद में आबंटन बढ़ाने की घोषणा की जाती है। पर आज भी बहुत सारी रेलवे क्रॉसिंग चौकीदार-रहित हैं।
Author July 27, 2016 02:08 am

भारत में चौकीदार-रहित रेलवे क्रॉसिंग इतने बड़े रेलतंत्र में किसी अभिशाप की तरह चिपक गई है, जो समय-समय पर अपना कहर बरपाती है। उत्तर प्रदेश के भदोही में एक भीषण हादसे में दस स्कूली बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि बारह बच्चे घायल हो गए हैं। हादसा एक मानव-रहित क्रॉसिंग पर स्कूली वैन के ट्रेन से टकराने के कारण हुआ। इस घटना ने करीब डेढ़ साल पहले उत्तर प्रदेश के ही मऊ जिले में मानव-रहित रेलवे क्रॉसिंग पर घटी त्रासद घटना का दर्द ताजा कर दिया। उस घटना ने भी दर्जन भर से ज्यादा बच्चों की जिंदगी लील ली थी। तेलंगाना के मसाईपेट में भी पिछले वर्ष जुलाई में घटी इसी तरह की एक घटना में उन्नीस बच्चों की मौत हो गई थी।

रेलवे भी इस कड़वे सत्य को जानता है, लेकिन अब तक कोई ऐसी पुख्ता व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है जो ऐसे हादसों को रोक सके। हां, जुबानी और लिखित जमाखर्च करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। भदोही की ताजा घटना में जान गंवाने वाले बच्चों के पीड़ित परिवारों के जख्मों पर इस समय हर कोई मरहम लगाते हुए दुर्घटना पर शोक प्रकट कर रहा है। लेकिन इससे उन मां-बाप का दर्द कतई कम नहीं होगा जिन्होंने अपने बच्चे खोए हैं। आखिर क्या वजह है कि सब कुछ गंवाने या यों कहें कि घटना के बाद ही प्रशासन की कुंभकर्णी नींद खुलती है।
भारत में चौकीदार-रहित रेलवे फाटकों पर होने वाली दुर्घटनाओं के आंकड़े बेहद भयावहहैं। वर्ष 2012 के आंकड़ों को देखें तो सरकारी कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि हर साल पंद्रह हजार से अधिक जानें लापरवाही की भेंट चढ़ जाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में रेलवे फाटकों पर सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों का मखौल उड़ाया जाता है। इसके लिए आम लोगों के साथ-साथ रेलवे के अधिकारी भी जिम्मेवार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कमेटी द्वारा पहले दिए गए उन सुझावों को भी रेलवे ने नहीं माना, जो रेलवे फाटकों और पुल को पार करने के सुरक्षात्मक तरीकों को लेकर थे। भारत में आज से छह वर्ष पहले यानी 2010 में 15,993 मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग थीं।

वर्ष 2010-11 के रेल बजट में इन सभी को समाप्त कर देने का प्रस्ताव रखा गया था और इनकी जगह ओवरब्रिज, सबवे जैसे विकल्प तैयार करने की बात कही गई थी। पर यह सब कागजों तक सीमित रहा। वर्ष 2007-08 में रेलवे ने सुरक्षा मानकों के लिए 534 करोड़ की फंडिंग रिजर्व रखी थी जो 2008-09 में बढ़ कर 566 करोड़ हो गई। वर्ष 2009-10 में इस फंड में भरपूर इजाफा किया गया और रिजर्व फंड 901 करोड़ का कर दिया गया। सुरक्षा के लिए प्रस्तावित धन में तो बढ़ोतरी हुई, पर दुर्घटनाओं में कमी नहीं हुई। वर्ष 2011 में रेलवे ट्रैकों पर 14,973 मौतें हुई थीं, जबकि 2012 में यह आंकड़ा बढ़ कर 16,336 हो गया। वहीं 2013 में इस संख्या में और बढ़ोतरी हुई और रेलवे ट्रैकों पर मरने वालों की संख्या 19,997 तक पहुंच गई। इस तरह के आंकड़े बताते हैं कि रेलवे तंत्र की खामी किस तरह आम आदमियों की जिंदगी पर भारी पड़ती रही है।

मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग पर हादसे रोकने के लिए रेलवे ऐसे फाटकों से ढाई सौ मीटर की दूरी पर रिपिट विसलिंग रेलवे क्रासिंग बोर्ड लगा रहा है। इससे ट्रेन चालक को ढाई सौ मीटर आगे फाटक होने का पता चल सकेगा और वह हॉर्न बजाता हुआ फाटक पार करेगा। सामान्य तौर पर स्टेशन और फाटकों से छह सौ मीटर की दूरी पर एक संकेतक लगाया जाता है। अब फाटकों से ढाई सौ मीटर पहले ही रिपीट विसलिंग लेवल क्रॉसिंग बोर्ड लगाए जा रहे हैं। इस स्थान से लगातार सायरन बजा कर आसपास के लोगों को ट्रेन निकलने तक क्रॉसिंग पार करने के लिए सावधान किया जाएगा। ये संकेतक रात के अंधेरे या धुंध में भी गाड़ी चालकों को स्पष्ट नजर आएंगे। अच्छा है कि रेल मंत्रालय क्रॉसिंग पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए प्रयासरत है, पर क्या बेहतर न होता कि पूरे देश में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग को ही हटाया जाता, ताकि दुर्घटनाओं की आशंका न्यूनतम होती।

उत्तर प्रदेश के कांशीराम नगर जिले में बस और रेलगाड़ी के बीच हुई भयंकर भिड़ंत में अड़तीस लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस दिल दहला देने वाले हादसे में पचास से ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए। इन सारी बातों से बेखबर रेल प्रशासन मरने वालों और घायलों को मुआवजा देकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। मगर मानवरहित क्रॉसिंग पर उसका ध्यान नहीं जाता। अब सोचने वाली बात यह है कि अगर रेल प्रशासन समय रहते मानवरहित क्रॉसिंग पर अपना ध्यान केंद्रित कर लेता तो शायद उत्तर प्रदेश के जिलों में रेलवे ट्रैक पर होने वाली दुर्घटनाओं में इतने ज्यादा लोग न मारे जाते।

क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों में लगातार इजाफा हुआ है। 4 फरवरी 2005 को नागपुर में शादी समारोह से लौट रहे ट्रैक्टर को तेज रफ्तार रेलगाड़ी ने टक्कर मार दी थी। इस हादसे में बावन लोगों की मौत हो गई थी। खास बात है कि यह हादसा मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर हुआ था। 1 दिसंबर 2006 को बिहार के भागलपुर जिले में डेढ़ सौ वर्ष पुराने एक पुल का हिस्सा गिर गया, जिससे पुल के ऊपर से जा रही रेलगाड़ी हादसे का शिकार हो गई। इस हादसे में पैंतीस से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि बीस से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। 16 अप्रैल 2006 को तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में थिरुमतपुर के पास मानवरहित क्रॉसिंग पर हुए हादसे में बारह लोगों की मौत हो गई थी। 23 फरवरी 2009, ओड़िशा के धांगीरा इलाके में एक वैन और रेलगाड़ी की टक्कर होने से चौदह लोगों की मौत हो गई। सभी एक विवाह समारोह से लौट रहे थे और मानवरहित क्रॉसिंग पर वैन अचानक खराब होकर बंद हो गई थी।

14 नवंबर 2009 को जयपुर से दिल्ली जा रही मांडूरी एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने से सात लोगों की मौत हो गई थी। 21 अक्टूबर 2009 को उत्तर प्रदेश के बंजाना में गोवा एक्सप्रेस और मेवाड़ एक्सप्रेस के बीच टक्कर हो जाने से उसमें सवार कम से कम बाईस लोगों की मौत हो गई। 9 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में उटारीपुरा के निकट एक मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर एक ट्रैक्टर-ट्रॉली और रेलगाड़ी के बीच टक्कर हो जाने से कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई। 19 जुलाई 2010 को पश्चिम बंगाल के सैथिया में वनांचल एक्सप्रेस और उत्तरबंग एक्सप्रेस के बीच टक्कर हो जाने से कम से कम छप्पन लोगों की मौत हो गई। 3 जून 2010, तमिलनाडु में एक मिनी बस और रेलगाड़ी के बीच टक्कर हो जाने से पांच लोगों की मौत हो गई। 20 सितंबर 2010, एक रेलगाड़ी और एक मालगाड़ी के बीच टक्कर हो जाने से कम से कम इक्कीस लोगों की मौत हो गई और तिरपन घायल हो गए। यह हादसा मध्यप्रदेश के भदरवाह रेलवे स्टेशन पर हुआ था। 22 मई 2010, बिहार के मधुबनी जिले में एक मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग पर हुए रेल हादसे में कम से कम सोलह लोगों की मौत हो गई।

ये सारी घटनाएं कोई संयोग नहीं हैं। इनका रेलवे की प्राथमिकताओं से गहरा नाता है। चाहे ट्रेन के मुसाफिर हों या रेलवे क्रॉसिंग से गुजरने वाले पैदल राहगीर और वाहन, लोगों की सुरक्षा रेलवे की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। घोषणाओं पर जाएं, तो रेलवे इस तकाजे से अनजान नहीं है। अमूमन हर साल रेल बजट में सुरक्षा के मद में आवंटन बढ़ाने की घोषणा की जाती है। साल-दर-साल यह राशि बढ़ती भी रही है। पर आज भी बहुत सारी रेलवे क्रॉसिंग चौकीदार-रहित हैं। रेलवे के बहुत-से पुल भी पुराने और कमजोर हो चुके हैं और उन्हें खतरे से खाली नहीं माना जाता। लेकिन उनकी मरम्मत और पुनर्निर्माण का काम अपेक्षित गति से नहीं हो रहा है।

दूसरी ओर, रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ती गई है। अनेक रेलगाड़ियों के फेरे भी बढ़े हैं, कइयों का गंतव्य स्थल भी बढ़ाया गया है, यानी उनके द्वारा तय की जाने वाली दूरी भी बढ़ाई गई है। कई मामलों में इस सब के लिए जरूरी पर्याप्त बुनियादी ढांचे की शर्त का भी पूरी तरह पालन नहीं किया जाता। रेल पटरियों का जरूरी विस्तार अटका रहता है, जबकि अतिरिक्त या नई रेलगाड़ियां शुरू कर दी जाती हैं। इससे पटरियों पर बोझ बढ़ता जाता है। यों वक्त के साथ ट्रेनों की संख्या और उनके द्वारा तय की जाने वाली दूरी में बढ़ोतरी जरूरी है, पर रेलवे की सबसे पहली प्राथमिकता सुरक्षा ही होनी चाहिए।

भदोही की घटना के बाद रेलवे प्रशासन को सबक लेना चाहए। साथ ही मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग को लेकर रेल विभाग को ठोस नीति अपनाने की जरूर है, इसके साथ ही सभी मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग को बंद कर उनका विकल्प तलाशने की जरूरत है। लेकिन भदोही केहादसे ने त्रासदी के एक सामाजिक पहलू की ओर भी ध्यान खींचा है। गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल पर बात करना, ईयरफोन से गाने सुनना एक आम फितरत होती जा रही है। पर यह आदत कितनी त्रासद साबित हो सकती है, भदोही का हादसा एक उदाहरण है। लिहाजा, इस हादसे में रेलवे के अलावा समाज के लिए भी एक सबक है।

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