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बेबाक बोलः 3 साल बाद- विकल्प का विजेता

16 मई को उस ऐतिहासिक दिन के तीन साल पूरे हो जाएंगे जब भारतीय सत्ता के शिखर से नरेंद्र मोदी का नाम गूंजा था।
16 मई को उस ऐतिहासिक दिन के तीन साल पूरे हो जाएंगे जब भारतीय सत्ता के शिखर से नरेंद्र मोदी का नाम गूंजा था।

अण्णा आंदोलन से कांग्रेस के खिलाफ विकल्प का जो गान उभरा था वह पिछले तीन सालों में मोदी के महा-आख्यान के रूप में परिवर्तित हो गया। राष्टीय स्तर पर कांंग्रेस के खिलाफ उठी बयार से जो ‘अबकी बार मोदी सरकार’ निकली, पिछले तीन सालों में उसकी रणनीति यही रही कि विकल्प और विपक्ष ही खारिज हो जाए। जहां कहीं भी विकल्प के उग आने की उम्मीद हो उस जमीन को ही बंजर कर दिया जाए। वाम और आम को हाशिए पर धकेल कांग्रेस को एकमात्र विपक्ष साबित कर दिया। अब जहां कांग्रेस है वहां विकल्प भाजपा है और जहां भाजपा है वहां कोई विपक्ष नहीं, विकल्प नहीं। तो विकल्प मंथन से निकली इस विकल्प-मर्दन तक की स्थिति पर बेबाक बोल।

16 मई को उस ऐतिहासिक दिन के तीन साल पूरे हो जाएंगे जब भारतीय सत्ता के शिखर से नरेंद्र मोदी का नाम गूंजा था। ‘इंदिरा इज इंडिया’ वाली कांग्रेस को विपक्ष का तमगा हासिल करने वाली संख्या भी नहीं देकर मोदी-मंत्र वाली भाजपा की शुरुआत हुई थी। नवउदारवाद की झंडाबरदार कांग्रेस सरकार इसके थपेड़ों से जनता को बचा नहीं पा रही थी। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से जूझ रही जनता को बहलाने के लिए जब कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं बचा तो फिर कांग्रेस के ही विकल्प का नारा गूंजा। अण्णा आंदोलन के साथ कांग्रेस को लेकर जो गुस्सा फूटा उसकी फसल दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने काटी और खुद को विकल्प का चेहरा घोषित किया। वहीं राष्टीय स्तर पर जनता ने जिसे विकल्प का विजेता घोषित किया, वे थे गुजरात मॉडल वाले नरेंद्र दामोदर दास मोदी।

कांग्रेस की नाकामी से पूरे देश में विकल्प की मांग का ढोल बज रहा था। और, इस निर्वात वाली हालत को भरने के लिए बाजार को भी एक नायकत्व वाली छवि की तलाश थी। एक ऐसा महानायक जो बेरोजगारी और नाउम्मीदी की जमीन पर बैठी जनता की आंखों में सपने डाल सके। क्षेत्रीय क्षत्रपों से परेशान बाजार को एक ऐसी छवि चाहिए थी जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपनी छाप छोड़े। सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत अलग-अलग पहचान के साथ अपने-अपने तरीके से प्रदर्शन कर रही जनता को एक सामूहिक पहचान के साथ जोड़े। और पिछले तीन सालों में बाजार की इस मांग की आपूर्ति करने में नरेंद्र मोदी पूरी तरह सफल रहे। विकल्प की मांग की पैदाइश नरेंद्र मोदी बाकी विकल्पों को खत्म कर भारतीय राजनीति को एकध्रुवीय बनाने की ओर तेजी से आगे बढ़े।

केंद्र में तीन साल पूरे कर चुके नरेंद्र मोदी केंद्र में अपनी राजनीति की शुरुआत करते हैं ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के नारे से। ‘बुर्के’ में छुपने वाली कांग्रेस, ‘शहजादा’, ‘संकर नस्ल’ जैसे जुमलों से कांग्रेस पर एक खास दिशा में बेरहम हमले किए। साठ दशकों तक देश की दशा और दिशा के लिए जिम्मेदार पार्टी पर जनता का गुस्सा स्वाभाविक था। नरेंद्र मोदी ने विपक्ष में खड़े होकर पक्ष को ललकारा और चुनावी नतीजों में उसे एक कमजोर विपक्ष बनाकर छोड़ा।
पिछले तीन सालों में अगर दिल्ली और बिहार को छोड़ दें तो मोदी की अगुआई में हर जगह विपक्ष खारिज हुआ। दिल्ली और बिहार इसलिए भी बचा रहा कि लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद विपक्ष ने धु्र्रवीकरण के गणित को समझ लिया था और मोदी के खिलाफ उनका ही दांव चल दिया था। बिहार में भाजपा की हार विपक्ष की एका के कारण हुई थी। और, पिछले तीन सालों में मोदी लगातार इसी विपक्ष को खत्म करते गए।
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव हो या दिल्ली का निकाय चुनाव। इनकी खासियत यह रही कि ये नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े गए और इनमें विपक्ष कांग्रेस को ही माना गया। दिल्ली में भाजपा के नेता अपना प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को और कांग्रेस के नेता अपना प्रतिद्वंद्वी सिर्फ भाजपा को घोषित कर रहे थे तो इसमें विकल्प की मौत की भी उद्घोषणा थी। आम आदमी पार्टी अब विकल्प नहीं और विपक्ष नहीं। जहां कांग्रेस है, वहां विकल्प भाजपा और जहां भाजपा है वहां कोई विकल्प नहीं। और, यही है गुजरात का मोदी मॉडल जहां कोई विपक्ष नहीं था और मोदी के अलावा कोई चेहरा नहीं था।
यह विपक्षहीन चेहरा ही मोदी सरकार के पिछले तीन साल का हासिल है। विपक्षहीन गुजरात मॉडल अब अखिल भारतीय मॉडल बन चुका है। एक वह समय था जब इंदिरा के अलावा कोई चेहरा नहीं था और एक यह समय है जब मोदी के अलावा कोई चेहरा नहीं है। भाजपा में भी नहीं। चाहे नोटबंदी का फैसला हो या केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना – हर किसी के आदि और अंत में सिर्फ प्रधानमंत्री का चेहरा है। चाहे लक्षित सैन्य हमला हो या फिर निकाय चुनाव – सब कुछ मोदी को समर्पित। रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री किसी चेहरे को इतना मजबूत नहीं रखा गया जो अपनी आजाद पहचान के साथ आगे आ सके।

विकल्प-विकल्प का नारा लगा रहे हिंदुस्तानी समाज के सामने मोदी ने एकमात्र कांग्रेस को ही विपक्ष मानने की रणनीति अपनाई। और, अगले दो साल में उनके सामने अहम राज्य हैं ओड़ीशा, बंगाल, बिहार, दिल्ली, केरल और त्रिपुरा। बिहार में महागठबंधन के समीकरण बदलते ही नजारा बदल सकता है। लालू यादव को अलग-थलग करने की कोशिश कर नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ वाली छवि पर काफी दबाव डाला जा चुका है। नोटबंदी और शराबबंदी की कदमताल कर ‘बिहार में अगली बार विपक्षविहीन सरकार’ बन जाए तो कोई अचरज की बात नहीं है। वैसे भी आम बोलचाल में यूपी-बिहार को सहचर शब्द की तरह लिया जाता है। मोदी अपनी नाकामियों से सबक सीखते हैं और तुरंत रास्ता बदलने में कोई परहेज नहीं करते हैं। बिहार से सबक लेकर यूपी उनके साथ है और सांस्कृतिक रूप से साथ आने वाले यूपी-बिहार को राजनीतिक रूप से साथ लाना 2019 का लक्ष्य है।

पिछले तीन सालों में मोदी सरकार को एकमात्र हार भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर खानी पड़ी है। यह एक ऐसा मुद्दा था जिस पर आंदोलनों का असर पड़ा था। और, अब तो यह हार भी इतिहास बन चुकी है। फिलहाल तो मोदी सरकार के पक्ष में जाता एक विकल्पहीन और आंदोलनहीन समाज बन चुका है। नोटबंदी हो या रेल का आसमान छूता किराया। हाल ही में दिल्ली मेट्रो में किराया 66 फीसद तक बढ़ा दिया गया। दलित उभार के नाम पर सिर्फ आरक्षण के मुद्दे को उठा दिया गया। लेकिन इन मुद्दों को लेकर विपक्ष कोई बड़ा जनांदोलन नहीं खड़ा कर पाया, सरकार को अपने जनविरोधी फैसले पर सोचने के लिए मजबूर नहीं किया। सहारनपुर में जब विपक्ष को सरकार को घेरना था तो मायावती अपनी ही राजनीति को और कमजोर करने में जुट गर्इं।

मुलसमान तो ‘चुप’ हो ही गए हैं लेकिन अन्य दलित और कमजोर तबके के पक्ष में खड़े होने के बजाए अखिलेश यादव सरहद के शहीदों में ‘गुजराती’ ढूंढ़ने में व्यस्त हो गए। चुनाव के समय गुजराती गधों और शेरों पर जुमलेबाजी तो मीडिया में दृश्यता बढ़ाने के लिए अच्छी थी। लेकिन जब आपका प्रदेश सांप्रदायिक-जातिवादी धु्रवीकरण में जल रहा हो, उस समय शहीदों में ‘गुजराती’ खोजना उनकी राजनीति की सीमा बता रहा है। अरविंद केजरीवाल को अगर ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ पर संदेह था तो निगम चुनावों का बहिष्कार कर अपने समर्थकों के साथ सड़क पर उतरते, आंदोलन करते, उस जनता को जंतर मंतर पर इकट्ठा करते जिनका वोट ‘आप’ की जगह भाजपा को चला गया। लेकिन अब ‘आप’ भी सड़क पर उतरने का जोखिम नहीं उठाना चाहती, आंदोलन नहीं चाहती। एक नमूना मशीन से विधानसभा में जो किया उसका हासिल तो ‘आप’ ही जानती है। ‘आप’ नेताओं का संदेह ‘जन-संदेह’ तभी बनता जब वह इसके खिलाफ आंदोलन खड़ा करती। फिलहाल तो संघर्ष इसी के लिए है कि ‘आप’ के अंदर से कितनी भाजपा निकलती है। पिछले चुनावों तक तो सत्ता के चुंबक ने कांग्रेस में चिपके सारे भाजपाइयों को अपनी तरफ खींच लिया है।

नरेंद्र मोदी के तीन साल ने मायावती से लेकर अरविंद केजरीवाल तक को विकल्प के चेहरे से खारिज कर दिया है। तीसरे साल की पहली सीढ़ी राष्ट्रपति और उपराष्टÑपति चुनाव के साथ शुरू होगी और मोदी की नीतियों को एक शीर्ष अभिभावक भी मिल जाएंगे। फिलहाल तो आंदोलनरहित सड़कों का सूनापन हम सबको दिखाई दे रहा है, राज्यसभा के समीकरण बदलने दीजिए यह सूनापन संसद में भी दिखाई देगा। संसद और सड़क का यह सूनापन हमें लोहिया की याद दिला सकता है, लेकिन यह भी संदेश देगा कि एक खास प्रचारतंत्र से आए किसी वैकल्पिक माध्यम को मुक्ति का संदेश नहीं मान लिया जाए। तीन साल में नरेंद्र मोदी का विकल्प सिर्फ नरेंद्र मोदी रह गए हैं। दिल्ली, बिहार, ओड़ीशा, बंगाल, केरल और त्रिपुरा 2019 का लक्ष्य है। विकल्प के गान से उपजे नरेंद्र मोदी के महा-आख्यान ने जो विकल्पहीनता की स्थिति पैदा कर दी है वह अगले दो साल में विपक्ष के साथ जनतंत्र के लिए भी चुनौती है।

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