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विज्ञापनों में स्त्रीदेह

तमाम कंपनियां घर में इस्तेमाल होने वाली सामान्य वस्तुओं से लेकर विशेष किस्म के उत्पाद तक स्त्री विज्ञापनों के जरिए प्रचारित करती हैं।
Author November 27, 2015 23:20 pm

तमाम कंपनियां घर में इस्तेमाल होने वाली सामान्य वस्तुओं से लेकर विशेष किस्म के उत्पाद तक स्त्री विज्ञापनों के जरिए प्रचारित करती हैं। घर के सामान की खरीदारी में अक्सर महिलाएं ही अहम भूमिकाएं निभाती हैं, इसलिए विपणन की कोई भी रणनीति इन्हें नजरअंदाज नहीं करती। सैकड़ों डिब्बाबंद व्यावसायिक उत्पाद, मसाले, साबुन, शैंपू, बर्तन, फिनाइल, डिओ, तेल, विभिन्न तरह के लोशन, क्रीम आदि पुरुषों के रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों के विज्ञापनों में सुंदर और आकर्षक स्त्री दिखाई देती है। पुरुषों के बनियान और जांघिए तक में स्त्री को प्रदर्शित किया जाता है। दुर्गंधनाशकों के विज्ञापनों में तो अधनंगी स्त्रियां पुरुषों के साथ एक खास किस्म की कामुक मुद्रा में प्रस्तुत की जाती हैं। इसका एकमात्र मकसद है, स्त्रियों के कामोत्तेजक हाव-भाव और सम्मोहक अंदाज के जरिए पुरुष दर्शकों को आकर्षित करना। एक निश्चित ब्रांड के प्रचार के लिए विशेष तौर पर निर्मित विज्ञापन के द्वारा दर्शकों के आकर्षण और वासना को बढ़ाना, जिससे वे उसे शीघ्र ही खरीद लें। मोटापा कम करने या ‘स्लिम-फिट’ होने के विज्ञापन भी स्त्री-केंद्रित होते हैं। फिर चाहे विज्ञापन मशीनों द्वारा वजन कम करने का हो या रस और फल-सेवन के उपाय ही सुझाने वाला क्यों न हो, हमेशा स्त्री-शरीर ही निशाने पर रहता है। इसमें एक तरफ ज्यादा वजन वाली अधनंगी (बिकिनी पहनी) स्त्री पेश की जाती है तो दूसरी तरफ स्लिम-अधनंगी स्त्री। एक तरफ ज्यादा वजन वाली स्त्री के भोजन का चार्ट दिखाया जाता है तो दूसरी तरफ कम वजन वाली स्त्री के भोजन का। तदुपरांत दोनों की तुलना द्वारा यह बताया जाता है कि कम वजन वाली स्त्री, मशीन का प्रयोग करने से कितनी आकर्षक, कामुक और सुंदर हो गई है, वहीं अधिक वजन वाली स्त्री अनाकर्षक, अ-कामुक और अति साधारण लग रही है। आजकल फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट्स में भी इस तरह के विज्ञापनों का खूब सकुर्लेशन हो रहा है। यहां प्रश्न यह उठता है कि अधिकांश विज्ञापन, स्त्री-शरीर केंद्रित ही क्यों होते हैं ? क्या स्त्री शारीर व्यापर का आवश्यक अंग है? क्या इससे विज्ञापन कंपनी को फायदे होते हैं? यह सब किस मानसिकता की उपज है? स्त्रियों के प्रति इस विकृत, अनैतिक और वस्तु समझने वाले प्रयासों और भोगवादी मानसिकता को बढ़ावा क्यों और किनके इशारों पर मिल रहा है? ध्यान देने की बात है कि ये विज्ञापन, विज्ञापित सुंदर स्त्री के रूढ़िवादी, सामंती संस्कार वाले रूप को ही तवज्जो देते हैं। स्त्री का गरिमापूर्ण आधुनिक रूप और स्वतंत्र अस्तित्व, विज्ञापनों में सिरे से गायब है। स्त्री के शरीर को केंद्र में रखकर स्त्री को तन्वंगी होने के लिए भड़काना कायदे से उसे भोग का शिकार बनाने के लिए प्रेरित करना है। स्त्री के जेहन में यह बात बैठाई जाती है कि अगर वह छरहरी होगी तो वह मर्दों को आकर्षित कर पाएगी। इस तरह के विज्ञापनों की स्त्री को अपमानित करने और वस्तु में रूपांतरित करने में बड़ी भूमिका है। मध्यवर्ग की कुछ स्त्रियां इन विज्ञापनों से प्रभावित भी होती हैं। वे या तो मशीन का उपयोग करने लगती हैं या फिर डाइटिंग के नुस्खे अपनाती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विज्ञापन केवल स्त्री-शरीर ही नहीं बल्कि स्त्री-सोच और विचार पर भी हमला बोलता है। वह तयशुदा विचारों को लोगों के दिमाग में थोपता है और इसमें खासकर, स्त्रियां निशाने पर होती हैं।
बुद्धि और मेधा पर जोर देने वाले भ्रामक विज्ञापनों तक में स्त्रियों की भूमिका केवल मां तक सीमित होती है। मसलन टीवी पर आने वाले विभिन्न स्वास्थ्यपेय जैसे कॅम्प्लान, हॉरलिक्स से लेकर पीडिया-क्योर आदि तक के विज्ञापनों में लड़कों को ही स्वास्थ्यपेय पीकर लंबाई बढ़ाते और मेधा का विकास करते दिखाया जाता है। लड़कियों को केंद्र में रखकर कभी इस तरह के विज्ञापन नहीं बनाए जाते। इन स्वास्थ्य-पेयों के प्रयोग से मेधा में कोई इजाफा होता है या नहीं, लेकिन वह पुरुष की अनुगामिनी जरूर होने लगती है। विज्ञापनों में वह धड़ल्ले से विभिन्न वस्तुओं को खरीदती और प्रयोग करती नजर आती है। वह एक अवलंबन मात्र है। उसकी निर्णायक और विचारशील भूमिका यहां नहीं के बराबर है। वह पुरुष के फैसले पर अमल करती दिखाई जाती है जो उसका पारंपरिक सामंती रूप है। लेकिन उसके आधुनिक रूप को सामने नहीं लाया जाता जिसमें वह खुद फैसले लेती हो और उसे भी पुरुषों के समान अधिकार उपलब्ध हों। एक मोबाइल कंपनी के ‘फिमेल बॉस’ विज्ञापन को सोशल मीडिया पर काफी गुस्से और आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसमें दिखाया गया था कि एक महिला बॉस दो पुरुष सहयोगियों को कोई काम पूरा करने का आदेश देती है। इनमें से एक इसका विरोध करता है। लेकिन महिला उसके विरोध को दबा देती है। देर शाम को सिर्फ एक आदमी को ओवरटाइम करते हुए दिखाया जाता है और तभी उसकी पत्नी फोन करती है। दरअसल, पत्नी ही उसकी बॉस होती है। इस विज्ञापन में दिखाया जाता है कि एक महिला बॉस के रूप में कठोर हो सकती है, वहीं वह एक पत्नी के रूप में पति के साथ शाम गुजारना चाहती है। जब पति घर लौटकर आता है तो उसे स्वादिष्ट खाना बना हुआ मिलता है।

इस विज्ञापन को इस आधार पर दोहरी मानसिकता वाला बताया गया था, एक तरफ तो महिला को उसका बॉस बताया जाता है और दूसरी तरफ उससे उम्मीद की जाती है कि वह सिर्फ घर जाए और पति के लिए खाना बनाए। बजाज नेचरफ्रेश संपूर्ण चक्की आटा और फॉर्चून राइस ब्रेन हेल्थ आॅयल विज्ञापनों में परिवार में कामकाजी महिलाओं के लिए परिवार के सहयोग का महत्त्व बताया गया है। पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता से संचालित, स्त्री के पारंपरिक रूप को तवज्जो देने वाले ये विज्ञापन उसे रूढ़िवादी सामंती मानसिकता और सामंती विचारों से जोड़ने लगते हैं। उसे मुक्त सोच और मुक्त कार्य की आजादी से वंचित कर देते हैं। ये विज्ञापन स्त्री के दूसरे दर्जे की दकियानूसी छवि को कायम रखने में मददगार होते हैं। इसका मतलब यह हो जाता है कि स्त्रियां अपनी इच्छा, बुद्धिमत्ता और विवेक को महत्त्व न देकर पुरुषों की इच्छानुसार अपने को ढालने की जी-तोड़ कोशिश में लगी रहती हंै। इन विज्ञापनों के अनुसार वह मात्र अपने आपको को आकर्षक और कामुक छवि देने के लिए अपार मेहनत करती रहती हंै। इस तरह धीरे-धीरे स्त्री अपनी स्वायत्त इच्छाओं के साथ-साथ अपना स्वायत्त व्यक्तित्व खो देती है और हर क्षण पुरुषों की इच्छानुसार परिचालित होती रहती है। आखिरकार स्त्री ‘व्यक्ति’ के बजाय पुरुषों के लिए एक मनोरंजक ‘वस्तु’ या ‘भोग्या’ बनकर रह जाती है।
विज्ञापन स्त्रियों के उन्हीं रूपों को प्रधानता देता है जो शरीर के प्रदर्शन से संबंध रखता है। उसकी बुद्धि और मेधा के विकास से नहीं, उसकी पढ़ाई से नहीं, उसकी सर्जनात्मकता से नहीं, उसकी अस्मिता से नहीं। यह मानसिक गुलामी की निशानी है। यह विज्ञापनों का स्त्री-विरोधी या पुरुष वर्चस्ववादी रवैया है, जो स्त्री की निजी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर हमला करता है। यह स्त्री को अपमानित करने का सुनियोजित षडयंत्र है। साथ ही यह पूंजीवाद के घृणित सोच का भी पैरोकार है, जिसमें उपभोक्तावादी संस्कृति, मनुष्य को उपभोग का गुलाम बनाती है। उसके स्व-विवेक को नष्ट करती है। यह एक ऐसा मनोविज्ञान है जो साजिशन स्त्रियों के मन में गुलामी की मानसिकता को पुष्ट करने का यत्न करता है। आज इस बात की सख्त जरूरत है कि स्त्रियां अपने विरुद्ध रचे गए इस बहुविध षडयंत्र को समझें, इसे लेकर सचेत हों और अपनी सोच को एक गरिमायुक्त और विवेकपूर्ण शक्ल दें। ०

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