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गरीबों के राशन की गठरी में भ्रष्टाचार और लापरवाही का छेद

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 को दिल्ली में लागू करने के लिए जिम्मेदार खाद्य, आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों के विभाग के मुताबिक जुलाई में आबंटित गेहूं और चावल का 99.99 फीसद हिस्सा लाभार्थियों को बांटा जा चुका है।
Author नई दिल्ली | July 28, 2016 01:17 am

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 को दिल्ली में लागू करने के लिए जिम्मेदार खाद्य, आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों के विभाग के मुताबिक जुलाई में आबंटित गेहूं और चावल का 99.99 फीसद हिस्सा लाभार्थियों को बांटा जा चुका है। लेकिन क्या यह राशन वाकई गरीबी रेखा से नीचे और अंत्योदय वर्ग के राशन कार्ड धारियों के घर पहुंचा है। अगर ऐसा होता तो घरों में काम कर आजीविका चलाने वाली पचास साल की रमा (बदला हुआ नाम) के घर भी सरकार की तरफ से दिया जाने वाले सस्ते दर का गेहूं, चावल और चीनी मौजूद होता और उसकी जिंदगी थोड़ी आसान होती।

रिकॉर्ड के अनुसार, रमा के हिस्से का राशन दुकान पर आया लेकिन यह सके घर नहीं पहुंच सका। और चिंता की बात तो यह है कि रमा अकेली नहीं है जिसके हिस्से का निवाला कहीं और जा रहा है। दिल्ली के त्रिलोकपुरी में रहने वालीं रमा के परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है जो फैक्ट्री में मजदूरी करता है। खुद रमा पिछले पंद्रह-बीस सालों से घरों में रसोई और साफ-सफाई का काम कर घर चला रही हैं। रमा ने बताया कि बहुत मशक्कत के बाद दो साल पहले राशन कार्ड बनवाया ताकि सस्ता अनाज मिल सके, लेकिन पिछले एक साल (अगस्त 2015) से वह राशन नहीं ले पा रही हैं। बकौल रमा, ‘कभी दुकान बंद मिलता है, तो कभी दुकानदार कहता है कि राशन खत्म हो गया, लंबी कतारें होती हैं, आए दिन हंगामा होता है दुकान पर’।

लेकिन दिल्ली सरकार की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से संबंधित वेबसाइट पर दर्ज ब्योरे के मुताबिक, रमा के नाम पर जुलाई के लिए 22 जून को 24 किग्रा गेहूं और 17 जून को 6 किग्रा चावल (6 सदस्यों के लिए) भेजा गया जो मैसर्स माखनलाल धर्मवीर (शॉप सं 25) पर पहुंच चुका है। रमा ने बताया कि उन्हें आज तक चावल और चीनी तो मिला ही नहीं जबकि वेबसाइट पर दिए गए रिकॉर्ड के मुताबिक रमा के नाम 6 किग्रा चावल हमेशा आता रहा है। रमा ने यह भी बताया कि उसे मिलने वाला गेहूं कितना खराब होता था।

एक और इस तरह की बानगी है नई सीमापुरी में रहनेवाली धनेश्वरी की जिन्हें जनवरी 2016 तक का राशन दिया गया। उसके बाद दुकानदार ने राशन देना यह कह कर बंद कर दिया कि राशन नहीं आ रहा है। धनेश्वरी का राशन कार्ड एफपीएस (फेयर प्राइस शॉप) 5923 से जुड़ा है। जब धनेश्वरी ने एक गैर सरकारी संगठन की सहायता से विभाग का वेबसाइट चेक किया तो पता चला कि विभाग द्वारा उनके राशन कार्ड के लिए अप्रैल 2016 और मई 2016 का राशन (चावल, चीनी और गेहूं) दुकान को भेजा गया है। धनेश्वरी ने जिला शिकायत निवारण अधिकारी को पत्र लिख दुकान की फुड सिक्योरिटी अधिकारी और इंस्पेक्टर के मिलीभगत से राशन की चोरी की बात कही है और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

लिखित में दो कि कोई शिकायत नहीं
अब देखते हैं कि गरीब जनता जो किसी की मदद से या अपनी जागरूकता के कारण सरकार के पास शिकायतें भेजती हैं उन पर भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने का दावा करने वाली केजरीवाल सरकार का क्या रवैया है। ब्र्रह्मपुरी, दिल्ली के पम्मी स्टोर (6778) के खिलाफ दो उपभोक्ताओं ने पिछले साल दिल्ली सरकार के पीजीएमएस (पब्लिक ग्रिवांसेस मॉनिटरिंग सिस्टम) में शिकायत दर्ज की कि दुकान अक्सर बंद रहता है, कभी खुलता है तो दुकानदार कहता है कि राशन खत्म हो गया या फिर राशन कम तौलता है, साथ ही दुकानदार का व्यवहार खराब है। पीजीएमएस के मुताबित, इन दोनों मामलों का निपटारा कर दिया गया है। जब जनसत्ता संवाददाता ने इन दोनों शिकायतकर्ताओं से संपर्क किया तो पता चला कि चूंकि उन्होंने शिकायत की थी इसलिए उन्हें तो अब राशन मिल जाता है लेकिन दुकान के खुलने के समय और दूसरों को राशन मिलने में कोई सहुलियत नहीं आई है, दुकान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। दोनों शिकायतकर्ताओं ने बताया कि उन्हें लिखित में देने को मजबूर किया गया कि अब उन्हें कोई शिकायत नहीं है। उनके मुताबिक, राशन की दुकान किसी निगम पार्षद के रिश्तेदार की है, कार्ड कैंसल करने की धमकी भी मिली।

गरीबी का अहसास कराती लंबी कतार
दुकान के न खुलने की शिकायत तो लगभग हर दूसरे कार्डधारी की है। एक कार्डधारी गौरव के अनुसार, राशन की दुकान पर लंबी कतारें हमें हमारी गरीबी का एहसास दिलाती लगती हैं। जबकि, नियमानुसार दुकान को महीने में 25 दिन खुलना चाहिए। गैरसरकारी संगठन पारदर्शिता से जुड़े राजीव कुमार ने कहा, ‘पिछले 1.5 साल के केजरीवाल सरकार के दौरान जन वितरण प्रणाली की हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया है, राशन की चोरी, दुकानों का नहीं खुलना आम शिकायते हैं, न बायोमेट्रिक सिस्टम लागू किया गया है, न दुकानों को प्रतियोगी बनाया गया है’। राजीव के अनुसार दुकानदार की मंशा ही होती है कि या तो इतना खराब राशन दो या इतनी दिक्कतें पैदा करो कि लोग राशन लेने न आए।

दुकानदारों ने बताया अपना दर्द
दुकानदारों का अलग रोना है। नई सीमापुरी के एक फेयर प्राइस शॉप के मालिक रमेश शर्मा ने कहा, ‘सरकार ने अब कमिशन 35 पैसे प्रति किलो से बढ़ाकर 70 पैसे कर दिया है, तब भी महीने का 7-8 हजार रुपया ही आ पाता है, ऐसे में सिर्फ इस काम से गुजारा कैसे चले’। रमेश का कहना है कि सरकार को चाहिए कि कमिशन कम से कम 2 रुपए रखे, दुकानों की संख्या कम हो और दुकानों पर दूसरी चीजें बेचने की इजाजत हो। एक अन्य दुकानदार ने कहा कि केजरीवाल सरकार के दौर में भी कोई राहत नहीं, फूड इंस्पेक्टर और स्थानीय विधायकों के चेलों को रिश्वत देनी ही पड़ती है। अभी 600 कार्डधारी पर एक दुकान खोलने का प्रावधान है।

लड़खड़ा रही जनवितरण प्रणाली
यह तो राशन न मिलने और दुकान समय पर न खुलने की समस्या है। फर्जी कार्ड बनवाना, गलत कैशमेमो जारी करना, राशन बाजार में बेचना, शिकायत निवारण तंत्र के प्रचार-प्रसार में कमी ऐसी कई समस्याएं हैं जिससे दिल्ली की जनवितरण प्रणाली लड़खड़ा रही है। सरकार ने अपने बजट भाषण में कहा था कि जल्द ही पूरी दिल्ली में लोगों को किसी भी फेयर प्राइस शॉप से राशन खरीदने (पोर्टेबिलिटी) की सुविधा होगी और बायोमेट्रिक व्यवस्था भी लागू होगी, लेकिन अभी इसे हकीकत में अमलीजामा पहनाना बाकी है। सवाल यह है कि पंजाब में ड्रग्स की समस्या या गुजरात में दलितों के दमन की समस्या का समाधान पेश करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल राज्य के सीमांत लोगों के राशन की बोरी में दिख रहे बड़े-बड़े छेदों पर पैबंद क्यों नहीं लगा पा रहे।

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