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बड़बड़ बंद, फिर शुरू

पाकिस्तान है। यह भारत की पश्चिमी सीमा पर है (और 1971 तक यह पूर्वी सीमा पर भी था)। इसका वजूद हमारी मर्जी पर निर्भर नहीं है न भारत इस बात का दम भर सकता है कि यह एक दिन मिट जाएगा।
Author December 12, 2015 22:46 pm

पाकिस्तान है। यह भारत की पश्चिमी सीमा पर है (और 1971 तक यह पूर्वी सीमा पर भी था)। इसका वजूद हमारी मर्जी पर निर्भर नहीं है न भारत इस बात का दम भर सकता है कि यह एक दिन मिट जाएगा। जिस दिन दोनों देश स्वाधीन हुए, उसी दिन कुछ समस्याएं भी उन्हें सौगात में मिलीं, जो विभाजन की देन थीं। इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण मेरी जानकारी में नहीं है कि दो देश एक भूभाग के बंटवारे से जनमे हों और उसके बाद शांति से रह रहे हों।

सीखना और भूलना
इतिहास हमें यह भी सबक देता है कि ऐसे देशों को यह सीखने की जरूरत है कि कैसे एक दूसरे के साथ मिल कर रहा जाए, और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का एकमात्र रास्ता आपसी संवाद का है। अगर इसका मतलब है एक दूसरे से रोजाना या हर हफ्ते या हर महीने बातचीत की जाए, तो वैसा क्यों न हो। यह सबक हमने सीखा और भुला दिया और 1947 से इसे फिर-फिर सीखना पड़ा। भारत की हर सरकार ने- और कहना न होगा कि पाकिस्तान की भी हर सरकार ने- इस मामले में दोषपूर्ण आचरण किया।

वर्ष 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद का समय एक खासा मुश्किल दौर था। यह लगभग वैसी ही स्थिति थी जैसी 1965, 1971 और 1999 की लड़ाइयों के बाद के दिनों में थी। एक मायने में यह कहीं अधिक विकट स्थिति थी, क्योंकि इस बार लड़ाई सरहदों से बहुत आगे भारत के दिल तक पहुंच गई। भारत में लोगों का मिजाज पाकिस्तान के प्रति कटु और सख्त विरोध का था: कोई बातचीत नहीं, कोई लेन-देन नहीं, क्रिकेट मैच नहीं, किसी किस्म की आपसदारी नहीं। सरकार लोगों के गुस्से को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी; फिर भी सुलह-सफाई से अड़चनें दूर करने और पाकिस्तान से संवाद कायम करने के सिवा और कोई चारा नहीं था।

यूपीए सरकार ने अपने दोनों कार्यकाल में वैसा ही किया, और उसके मिश्रित नतीजे आए। वर्ष 2013 में नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय फलक पर आ गए। उन्होंने बड़ी चतुराई से खुद को लालकृष्ण आडवाणी के विकल्प के रूप में पेश किया, जिनके बारे में यह धारणा बलवती होती जा रही थी कि वे चुनाव नहीं जिता सकते। मोदी अपने को कांग्रेस के भी विकल्प के तौर पर पेश करने में सफल रहे। भाजपा के भीतर मोदी बनाम आडवाणी की स्थिति थी, तो पूरे देश में मोदी बनाम कांग्रेस की।
मोदी को उस वक्त अतिरंजना से भरी एक नई भाषा की जरूरत थी, जिसमें जन-आक्रोश झलकता हो। यहीं पर मोदी ने देश के बाकी नेताओं पर बढ़त बना ली।

मोदी के तब के बोल
पाकिस्तान के संदर्भ में मुझे उनके कुछ वक्तव्य याद करने दें, जो उन्होंने 2012 में और मई 2014 के चुनावों के दौरान दिए थे।
बारह दिसंबर 2012 को मोदी ने कहा, ‘भारत सरकार परदे के पीछे पाकिस्तान के साथ खिचड़ी पकाने में लगी है और जनता को अंधेरे में रख रही है।’ तिरुचिरापल्ली (तमिलनाडु) में 26 सितंबर 2013 को मोदी ने कहा ‘पाकिस्तानी फौज भारतीय सैनिकों के सिर काट सकती है, फिर भी दिल्ली (केंद्र की) सरकार प्रोटोकॉल के नाम पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ चिकन बिरयानी खा रही है।’
जब चुनाव परिणाम आने में कुछ दिन बाकी थे, बेहद आत्मविश्वास से भरे मोदी ने समग्र वार्ता के सिलसिले में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा, ‘क्या बंदूकें चलने और बम धमाकों के बीच कोई बातचीत संभव है? इसलिए, औचित्यपूर्ण वार्ता की खातिर जरूरी है कि पहले बंदूकों का गरजना और धमाके होना बंद हों।’

उनके बयानों ने प्रशंसा भी बटोरी और चिंता भी पैदा की। वे बयान उन समूहों को रास आए जिन्हें खुश करने की कोशिश भाजपा जी-जान से कर रही थी। पर वे बयान कूटनीतिज्ञों और सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच चिंता का सबब भी बने। क्या मोदी इतना ऊंचा पैमाना तय कर रहे थे कि उनके कार्यकाल में पाकिस्तान से बातचीत असंभव हो जाए? अलबत्ता मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री सहित सभी सार्क नेताओं को बुला कर हरेक को हैरत में डाल दिया। यह गजब का दांव था जिसने दुनिया को यकीन दिलाया कि चुनावी दिनों का गर्जन-तर्जन पीछे छूट चुका है।

कोई रणनीति है?
पीछे मुड़ कर देखें, सारे आकलन गलत निकले। न तो तेवर-भरे बयानों और न ही शपथ ग्रहण समारोह के दांव के पीछे कोई सुचिंतित रणनीति थी। यह सब अधिकांशत: फौरी आवेग में हुआ। नई सरकार के पास पाकिस्तान की बाबत रणनीति की कमी बाद के महीनों में साबित हो गई। बातचीत का आरंभ होना और रुक जाना, उसमें नए मोड़ और नई पेचीदगी आना, यही तो हुआ पिछले अठारह महीनों में। न्योते और फिर बैठक रद्द होना, हाथ मिलाना और आंखें तरेरना, इस सब ने दुनिया को हैरत में डाल दिया, जैसे कि भारत में ऊंची समझ वाले पर्यवेक्षक हैरान थे। पिछले अठारह महीनों का लब्बोलुआब यह है कि सरकार के पास पाकिस्तान की बाबत कोई नीति नहीं है।
यह भी जाहिर हुआ कि नीति-निर्माण का काम विदेश मंत्रालय से लेकर पूरी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय में समाहित कर दिया गया। विदेशमंत्री के जिम्मे संकट में फंसे लोगों को निकालने का काम भर रह गया। अनुभवी राजनयिकों का सबसे अहम काम जलसों का इंतजाम करना हो गया।

पिछले दिनों सरकार ने एक बार फिर चौंकाया। बीएसएफ की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल के मुकाबले घुसपैठ में पच्चीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद, भारत और पाकिस्तान ने बातचीत का निर्णय किया है। गुपचुप वार्ता अब वर्जित नहीं है। परदे के पीछे के संपर्क सूत्र अब संदेहास्पद नहीं माने जाते। सुषमा स्वराज ने अग्रिम पंक्ति के बीच के खिलाड़ी की भूमिका अख्तियार कर ली है। लगभग चमत्कारिक ढंग से, एक समय तज दी गई ‘समग्र वार्ता’ का ‘व्यापक द्विपक्षीय वार्ता’ के रूप में रूपांतरण कर दिया गया है। आतंकवाद से मुकाबले और कश्मीर से लेकर सियाचिन, सर क्रीक, आर्थिक सहयोग और जनता के स्तर पर आदान-प्रदान बढ़ाने तक, हर मुद््दा बातचीत के एजेंडे में है।

अगर यह सब एक गंभीर रणनीति का हिस्सा है, तो हमें इस बदलाव का स्वागत करना चाहिए। चुनौतियां आएंगी और रास्ता ऊबड़-खाबड़ होगा, पर सफर जारी रखने के सिवा कोई चारा नहीं। किसी को भी यह उम्मीद नहीं है कि सभी मसले चमत्कारिक ढंग से हल हो जाएंगे, पर कोई भी टकराव या युद्ध नहीं चाहता।

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