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बयानबाजी एक कला

भारतीय राजनीति में अगर किसी एक विधा का आज बोलबाला है तो वह है बयानबाजी। चाहे किसी भी प्रकार का आयोजन हो, रोज शाम को हर समाचार चैनल पर प्राइम टाइम में एक एंकर तीन-चार तथाकथित बुद्धिजीवियों के संग बौद्धिक जुगाली करता नजर आ ही जाता है।
Author January 3, 2016 02:58 am

भारतीय राजनीति में अगर किसी एक विधा का आज बोलबाला है तो वह है बयानबाजी। चाहे किसी भी प्रकार का आयोजन हो, रोज शाम को हर समाचार चैनल पर प्राइम टाइम में एक एंकर तीन-चार तथाकथित बुद्धिजीवियों के संग बौद्धिक जुगाली करता नजर आ ही जाता है। समाचार चैनलों के पास हमेशा की तरह चौबीस घंटे परोसने के लिए समाचारों का अभाव रहता है। नेताओं द्वारा दिए जा रहे ये बयान समाचार चैनलों की संजीवनी हैं। अगर नेता चुप हो गए तो इनकी दुकानें बंद होना तय है।
जिस प्रकार पतंग उड़ाना एक कौशल है, उसी प्रकार बयान देना भी एक कला है। देश में फलीभूत हो रही बयानबाजी और पतंगबाजी में अनेक ऐसे आयाम हैं जो समान नजर आते हैं, जिस प्रकार पतंगबाजी में पतंग उड़ाने से अधिक महत्त्व दूसरों की पतंग काटने का है, उसी तर्ज पर राजनीति में बयानबाजी का महत्त्व विरोधियों की नीतियों, बातों को काटने का होता है। अच्छा पतंगबाज अगर राजनीति में हाथ आजमाए तो उसके कुशल राजनीतिज्ञ बनने के अवसर उजले हो सकते हैं।

पतंगबाजी में पतंग उड़ाने के लिए पतंग और धागे का आपसी संतुलन जिस प्रकार से अहम है, उसी प्रकार नेता के राजनीतिक जीवन में विवादित बयानों का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। नेता को अपनी राजनीतिक पतंग को हवा में उड़ाने और स्थिर रखने के लिए बयानों की डोर का संतुलन बैठाने की कला में पारंगत होना राजनीति की अघोषित और अनिवार्य शर्त है। पतंग को आकाश में ले जाने के लिए जिस प्रकार कन्नी देने वाले और चरखी पकड़ने वाले सहयोगी अवयव जरूरी हैं, उसी तर्ज पर राजनीति में नेता को ऊंचाइयां प्राप्त करने में ऊलजलूल बयानों और समर्थकों की पग-पग पर आवश्यकता होती है। समस्त नेता इसी जुगत में रहते हैं कि कैसे उनका बयान अन्य किसी के बयान से अधिक विवादास्पद बने। अब जबकि बयानबाजी का यह कालजयी कारवां द्रुत गति से अग्रसर है तब आने वाले वर्षों में नेता बनने की अर्हताओं और मापदंडों में बयान देने की कला एक महत्त्वपूर्ण उपकरण सिद्ध होगी।
पतंगबाजी में कभी-कभी विपरीत हवा होने से स्वयं के स्थान से पतंग को उड़ाना कठिन होता है। जिस प्रकार पतंग उड़ाई की संवेदनशील क्रिया के दौरान अगर सामने तार या पेड़ या दूसरा अवरोध हो तो पतंग नहीं उड़ाई जा सकती, उसी प्रकार राजनीति में स्वयं की पार्टी में दिक्कतें होने पर कुशल नेता दूसरे दल की छत पर जा कर अपनी राजनीतिक पतंग हवा में उड़ाने का काज बखूबी करते हैं। पतंगबाज की तरह जो नेता हवा का रूख भांपने में दक्ष होते हैं वे भविष्य में कुशल और कद्दावर नेता के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं।

यह संभव है कि ‘डिप्लोमा इन बयान’ या ‘बयानबाजी क्रेश कोर्स’ विश्वविद्यालयों की आय बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण जरिया बन कर उभरे। पैंतालीस दिन में फर्राटेदार बयान देना सीखें अन्यथा पैसे वापस जैसे लुभावने विज्ञापनों का आम होना तयशुदा बात प्रतीत होने लगी है। शिक्षित बेरोजगारों के लिए रोजगार की अपार संभावनाओं का द्वार बयान के रूप में समक्ष खड़ा है। वह दिन दूर नहीं जब आज के नेताओं द्वारा जाने-अनजाने में उच्चारित बयानों का उपयोग पठन-पाठन क्रिया में स्रोत सामग्री के रूप में हो।
नेताओं को अगर इस बात की जरा भी भनक लगी कि उनके अनायास या सयास दिए गए बयान कभी कमाई का जरिया भी बन सकते हैं तो वे संसद में बिल पास करा कर अपने बयानों का पेटेंट करा लेंगे। दुर्भाग्य तो यह है कि आज पतंगबाजी जैसा सस्ता और सुलभ मनोरंजन सिर्फ संक्रांति के दिन तक सिमट कर रह गया है जबकि बयानबाजी जैसा अवांछित मनोरंजन बारामासी होता जा रहा है।

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  1. Parmatma Rai
    Jan 3, 2016 at 2:43 am
    ी बात है.अगर नेताओं का पैनल समाचार चैनलों पर आना बंद कर दे तो इनकी खटिया खड़ी हो जाए.और एंकर लोग तो अपने को स्कूल का हेडमास्टर समझने लगते हैं और डांट खाने के बावजूद नेता लोग खी-खी करते जाते हैं.
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