December 09, 2016

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कागज है न स्याही, कैसे छपेंगे नए नोट!

जरूरत भर नए नोट छापने के लिए रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया (आरबीआइ) अभी तक टेंडर प्रक्रिया ही नहीं शुरू कर पाया है। मैसूर में भारत सरकार की पेपर मिल में प्रयोग के तौर पर थोड़े करंसी कागज बनाए गए थे, उन्हीं से काम चलाया जा रहा है।

Author नई दिल्ली | November 18, 2016 00:21 am
सांकेतिक तस्वीर।

दीपक रस्तोगी

जरूरत भर नए नोट छापने के लिए रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया (आरबीआइ) अभी तक टेंडर प्रक्रिया ही नहीं शुरू कर पाया है। मैसूर में भारत सरकार की पेपर मिल में प्रयोग के तौर पर थोड़े करंसी कागज बनाए गए थे, उन्हीं से काम चलाया जा रहा है। वहां जरूरत का पांच फीसद कागज तैयार करने भर की क्षमता है। बाकी 95 फीसद कागज के लिए अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी की कंपनियों पर निर्भरता है। करंसी संकट की स्थिति के मद्देनजर इन कंपनियों को टेंडर प्रक्रिया में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा जा रहा है। आरबीआइ द्वारा वित्त मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार, नए नोट छापने के लिए 22 हजार मीट्रिक टन करंसी कागज की जरूरत होगी। इसकी खरीद के लिए जल्द से जल्द प्रक्रिया शुरू करनी होगी। भारत के पास जरूरत का महज 10 फीसद कागज उपलब्ध है, जिसे देश में तैयार किया गया है। आपातकालीन अंदाज में मैसूर की नई चालू की गई प्रेस में प्रयोग के तौर पर सीमित मात्रा में छापे गए नोट ही जारी कर पा रहा ही आरबीआइ। बंगाल के शालबनी में रिजर्व बैंक मुद्रणालय में सोमवार से दो हजार रुपए के नोट छापने की शुरुआत की गई है। दोनों जगह मैसूर स्थित सरकारी क्षेत्र के संयुक्त उपक्रम बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय की सिक्यूरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन का संयुक्त उपक्रम) में तैयार किए गए कागज भेजे गए हैं। यहां पिछले एक साल में 12 हजार टन करंसी कागज तैयार किए गए थे। इनमें से बचे हुए तीन हजार टन कागजों को मैसूर, देवास, नाशिक और शालबनी की प्रेस को भेजा गया है। नौ हजार टन का इस्तेमाल पहले ही पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट छापने के लिए किया जा चुका है।
वित्त मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ने कहा है कि अभी देवास और नाशिक के प्रिंटिंग प्रेस में पुराने नोटों का स्क्रैप हटाने की चुनौती है। दो महीने पहले तक दोनों जगह पांच सौ और एक हजार रुपए के पुराने नोट छप रहे थे, जिनके लिए इस साल जुलाई में आर्डर भेजा जा चुका था। प्रधानमंत्री की नोटबंदी की आकस्मिक घोषणा के बाद मैसूर में प्रयोग के तौर पर छापे जा रहे नोटों को चलन के लिए जारी करने की जद्दोजहद रही। अब जबकि नोटों की मांग बढ़ने लगी है, दोनों जगह नए नोट छापने की मांग प्रेषित की गई है। दोनों मुद्रणालयों में छपकर पड़े नोटों की शीट्स के साथ ही छपाई मशीनों में पड़े नोटों को भी हटाने और स्क्रैप करने की चुनौती है। इन नोटों को कटिंग, नंबरिंग, बंडल के लिए भेजने की तैयारी चल रही थी, जब नोटों को अमान्य करने की घोषणा की गई। इन जगहों पर रोजाना पांच- पांच लाख करंसी छापी जा रही थी। मौजूदा हालात में इन मुद्रणालयों में एक-एक सौ के नोट छापने का आदेश जारी किया गया है। लेकिन दोनों जगह कागजों की नई खेप का इंतजार हो रहा है।
स्विस कंपनी करती है छपाई की स्याही की आपूर्ति स्विट्जरलैंड की कंपनी एसआइसीपीए दुनिया के तमाम देशों को नोटों की छपाई के लिए स्याही की आपूर्ति करती है। स्याही के लिए आरबीआइ इसी कंपनी से स्याही खरीदती है।
इस साल छपे 212 करोड़ नोटों में 80 फीसद बड़े नोट थे। भारत सरकार हर साल नए नोट छापने के लिए 22 हजार मीट्रिक टन करंसी कागजों का इस्तेमाल करती है। इनकी खरीद में नोटों की छपाई की लागत का 40 फीसद खर्च हो जाता है। कुल नोटों का 80 फीसद हिस्सा 1000 व 500 के नोटों का था।

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First Published on November 18, 2016 12:20 am

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