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चमकन लागे बिजुरी…

पिछले दिनों कमानी सभागार में शास्त्रीय संगीत समारोह ‘कंसर्ट फॉर हारमनी’ का आयोजन किया गया। यह नाद फाउंडेशन, संस्कृति मंत्रालय और इंडिया हैरिटेज डेस्क का संयुक्त आयोजन था।
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पिछले दिनों कमानी सभागार में शास्त्रीय संगीत समारोह ‘कंसर्ट फॉर हारमनी’ का आयोजन किया गया। यह नाद फाउंडेशन, संस्कृति मंत्रालय और इंडिया हैरिटेज डेस्क का संयुक्त आयोजन था। इस समारोह में बनारस घराने के वरिष्ठ गायक पंडित राजन और साजन मिश्र ने मल्हार की बानगी को पेश किया। वहीं सितार की जुगलबंदी को पंडित शुभेंद्र राव और शास्किया राव ने प्रस्तुत किया।

समारोह में शास्त्रीय संगीत के सुरों की रवानगी रही। समारोह में पंडित राजन और साजन मिश्र ने युगल गायन पेश किया। उन्होंने राग गौड़ मल्हार और सूरदासी मल्हार में अपने सुरों को सजाया। खमाज थाट का राग गौड़ मल्हार में दो रागों गौड़ और मल्हार का सुंदर समन्वय होता है। पंडित राजन ने आलाप में राग का स्वरूप पेश किया। मिश्र बंधुओं ने विलंबित लय की बंदिश ‘काहे हो प्रीतम हमसे आंखे फेर डाली’ को गाया। उन्होंने बोल तान, सरगम की तान और आकार की तान से बंदिश को सजाते हुए, मोहक अंदाज में दोनों निषाद और शेष शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया। यह एक ताल में निबद्ध था। उनकी पेशकश की दूसरी मध्य लय की बंदिश थी। इसके बोल थे-‘जानी-जानी तुम्हारे मन की’। वहीं उन्होंने तीन ताल में निबद्ध द्रुत लय की बंदिश-‘बलमा बहार आई रे’ को मधुर और सरस तरीके से गाया।

पंडित राजन और पंडित साजन मिश्र ने राग सूरदासी मल्हार को सुरों में ढाला। इसमें उन्होंने पंडित रामदास की रचना ‘चमकन लागे बिजुरी’ को गाया। ठेठ बनारसी घराने की शैली को निभाते हुए, उन्होंने ठहराव और परिपक्वता का परिचय अपने गायन में दिया। उन्हें भजन ‘जननी, मैं न जिउं राम बिन’ से एक खास पहचान मिली थी। श्रोताओं की फरमाइश पर इस भजन को राग भैरवी में पेश किया गया। उनके साथ तबले पर दुर्जय भौमिक ने सधी हुई संगत की। वहीं, रागों की प्रकृति के अनुरूप श्रुतियों को हारमोनियम पर सुमित ने अनुप्राणित किया। तानपुरे पर विपिन और अमित ने संगत किया।

इस कार्यक्रम में सितार और चेलों की जुगलबंदी भी सरस और सुरुचिपूर्ण थी। बारिश मौसम के राग मियां मल्हार को शुभेंद्र राव और शास्किया राव ने चुना। संपूर्ण षाड़व जाति के राग मियां मल्हार के वादन की शुरुआत आलाप से हुई। गंभीर प्रकृति के राग के आलाप में एक-एक स्वर के स्वरूप को उकेरा। शुरुआत के अनिबद्ध स्वर धीरे-धीरे स्वर समूहों में निबद्ध हो गए। कोमल गंधार और दोनों निषाद के स्वरों से सजा वादन मधुर और कोमल था। दोनों मैहर घराने और अपने गुरुओं पंडित रविशंकर व पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की परंपरा को निभाया। धु्रपद अंग का आलाप, जोड़ और झाला एक अच्छा आगाज रहा। दोनों कलाकारों ने बहुत सहजता और एक-दूसरे को सरलता से निभाया। उन्होंने खमाज थाट के राग देश में गतों को पेश किया। विलंबित, मध्य और द्रुत लय की गतों को उस्ताद राशिद मुस्तफा थिरकवा ने तीन ताल में निबद्ध किया। अंगुलियों के थिरकन और संचालन के जरिए तीनों कलाकारों ने समां बांध दिया।

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