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‘चांद छूने’ की हसरत में जामिया के ‘तारे’ जमीं पर

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का एक बड़ा फैसला छात्रों की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।
Author नई दिल्ली | August 10, 2016 04:42 am

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का एक बड़ा फैसला छात्रों की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका। चोटी के विश्वविद्यालयों में शुमार होने की दौड़ में अपनी सौ साल की परंपरा को पलटते हुए विश्वविद्यालय ने इस साल अपने सभी बी टेक और बी आर्क पाठ्यक्रमों में दाखिला ‘जेईई-मेन्स’ के जरिए देने का फैसला किया था, लेकिन ‘चांद छूने’ की इस हसरत ने जामिया के ‘तारों’ को जमीं पर ला पटका। बता दें कि ‘जेईई-मेन्स’ वह परीक्षा है, जो सीबीएसई लेता है। इसके जरिए आइआइटी व एनआइटी जैसे तकनीकी विश्वविद्यालयों के बी टेक पाठ्यक्रम में दाखिला होता है। यह अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा है और जिसकी मेरिट दो चरणों में तय होती है। इसके बाद रेटिंग और सीट के हिसाब से छात्रों के दाखिले होते हैं।

दरअसल जामिया ने इस साल खुद को ‘जेईई-मेन्स’ में शामिल करा दिया। जो जामिया अपने इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम का फॉर्म खुद निकालता था, परीक्षा लेता था और रेटिंग से दाखिला देता था। ‘चांद छूने’ के हठ में उसी ने अपनी पारखी टीम की जगह सीबीएसई की ‘जेईई-मेन्स’ को तवज्जो दे डाली, लेकिन नतीजा सिफर रहा। इस फैसले को छात्रों ने पहली नजर में ही नकार दिया।

सूत्रों के मुताबिक, तथ्य यह है कि बी टेक और बी आर्क पाठ्यक्रमों में दाखिला के लिए ‘जेईई-मेन्स’ की तरह उत्तीर्ण उम्मीदवारों में से दो तिहाई ने जामिया के बजाय दूसरे संस्थानों को तरजीह दी। बी-टेक के पांच और बी-आर्क के दो संकायों में क्रम से 350 और 80 सीटों के एवज में केवल एक सौ बीस छात्र ही दाखिला लेने पहुंचे। इधर सत्र शुरू हो चुका है। जमीनी हकीकत यह है कि बी टेक के तमाम पाठ्यक्रमों (सिविल, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिकल, ईलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन, मेकेनिकल इंजीनियरिंग) के छात्रों की कई कक्षाएं एक साल ली गईं। दरअसल सभी संकायों में 70 सीटें हैं। लेकिन सूत्रों ने बताया कि पहले दिन तो कुल छात्रों की संख्या 70 तक नहीं पहुंची थी। प्रशासन का दावा है कि सीटें न भरी हों लेकिन सौ से ज्यादा छात्रों ने दाखिला ले लिया है।

जामिया इस शैक्षणिक सत्र से खुद ‘जेईई-मेन्स’ के दायरे में आया है। अब तक जामिया बी-टेक के पांच और बी-आर्क के दो संकायों की प्रवेश परीक्षा खुद लेता था। उसमें 430 सीटों के लिए करीब 10 हजार से ज्यादा आवेदन आते थे। जामिया की साख के चलते पहली लिस्ट में ही सीटें भर जाती थीं। इतना ही नहीं जामिया सभी पाठ्यक्रमों में करीब 8 से 10 छात्र को वेटिग में रखा करता था। कई बार उनका नंबर भी नहीं आता था क्योंकि उसका शत फीसद कैम्पस प्लेसमेट का रेकॉर्ड है। यहां से निकले इंजीनियरों का नौकरी के बाजार में क्रेज है। ऐसे में खुद को ‘जेईई-मेन्स’ के दायरे में लाने का फैैसला भले ही बेहतर सोच के साथ किया गया हो लेकिन यह परवान नहीं चढ़ सका।
‘जनसत्ता’ के सवाल पर कुलपति प्रो तलत अहमद ने कहा, ‘जिन्हें बेहतर विकल्प मिले वे चले गए। शायद इसी से सीटें खाली रह गईं। इसे साख पर बट्टे के तौर पर ना देखा जाए। ‘जेईई-मेन्स’ में शामिल होने का फैसला इसलिए भी लिया गया था कि ‘और उम्दा’ छात्र कैंपस में आएं। 120 छात्रों ने दाखिला लिया है। दूसरी सूची जारी की गई है। 15 अगस्त तक हर हालत में दाखिले पूरा होंगे।

सूत्रों के मुताबिक दो अगस्त को जामिया की दूसरी सूची जारी होने के नौ दिनों बाद भी सीटें नहीं भरीं। 11 अगस्त को ‘रजिस्ट्रेशन आॅन द स्पाट’ योजना शुरू होनी है। मतलब जो आएगा उसका तत्काल दाखिला होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि की और कहा कि कहा,‘15 अगस्त तक हर हालत में दाखिले पूरे होने हैं। लेकिन ‘काउंसलिंग आॅन द स्पाट’ में जामिया आने वाले छात्रों की रैंकिंग का पूरा ध्यान रखेगा।’

बहरहाल, जनसत्ता की पड़ताल में इसका एक दूसरा पहलू भी सामने आया। दबी जुबान से ही सही ‘जेईई-मेन्स’ के फैसले को शिक्षाविद कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इतना ही नहीं विश्वविद्यालय प्रमुख की भूमिका का निर्वहन कर रहे एक अधिकारी ने तो जामिया को ‘जेईई-मेन्स’ के अधीन लाने के फैसले को दोबारा सोचने को भी प्रगतिशील कदम की संज्ञा दी। जामिया के शिक्षाविदों ने कहना है कि ‘जेईई-मेन्स’ के दायरे में लाने का फैैसला सवाल खड़ा करता है कि अगर सभी संस्थानों का एक ही स्तर कर दिया जाए तो फिर आइआइटी-एनआइटी क्या होगा। दूसरा, राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों का क्या होगा? खासकर ऐसे समय में जब एक समान शिक्षा दे पाना एक चुनौती है। उनका क्या होगा जो अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा से इतर अब तक राज्य या केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बी-टेक और बी-आर्क की परीक्षाओं को उतृीण करते थे। अगर सभी राज्य और सभी विश्वविद्यालय जामिया की तरह खुद को ‘जेईई-मेन्स’ के दायरे में लाने का फैैसला कर लें तो पिछड़े माने जाने वाले राज्यों का क्या होगा?

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