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नए मंत्री के आगमन पर केजरीवाल ने छेड़ा पुराना राग

नए मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के पद संभालते ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पुराने मुद्दे पर नया राग अलाप दिया।
Author नई दिल्ली | July 8, 2016 03:56 am
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (FILE PHOTO)

नए मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के पद संभालते ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पुराने मुद्दे पर नया राग अलाप दिया। गुरुवार को केजरीवाल ने डीयू की दाखिला प्रक्रिया पर न केवल सवाल खड़े किए बल्कि उसे बेतुका करार दे दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रणाली को अति विचित्र करार देते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गुरुवार को कहा कि इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में शहर के छात्रों के लिए कोटा नहीं है। इस ट्वीट के आते ही विश्वविद्यालय परिसर में विरोध शुरू हो गया है। शिक्षकों ने दबी जुबान से डीयू की संवैधानिक संरचना के छेडछाड़ करने और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के राजीतिक हथकंडे अपनाने पर आप और भाजपा दोनों को आड़े हाथ लिया।
जिस मुद्दे का दो हफ्ते पहले मानव संसाधन के पूर्व मंत्री ने पटाक्षेप कर दिया था उसे नए मंत्री के सामने केजरीवाल ने उठाकर हवा दे दी। बता दें कि मुख्यमंत्री के इस बयान से कुछ दिनों पहले उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि दिल्ली के छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले में दूसरे राज्यों के छात्रों के मुकाबले तरजीह दी जानी चाहिए। केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश की प्रणाली अति विचित्र है। यहां न ही स्थानीय लोगों के लिए कोई कोटा है और न ही अंकों को सामान्य करने की कोई व्यवस्था। इससे पहले ईरानी को लिखे पत्र में सिसोदिया ने कहा था कि डीयू की प्रवेश प्रक्रिया में विसंगतियों के कारण दिल्ली के लाखों विद्यार्थी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं क्योंकि अन्य राज्यों के शिक्षा बोर्ड से आने वाले आवेदकों के अंक दिल्ली के छात्रों की तुलना में अधिक होते हैं।

डीयू में दाखिले की मारामारी पर राजनीति होती रही है। पिछले चार सालों से केंद्रीय मंत्री विजय गोयल इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। यह जानते हुए भी कि केंद्रीय विश्वविद्यालय राज्य के नहीं पूरे देश के होते हैं, गोयल लगातार दिल्ली की राजनीति में बने रहने की नीयत से इस मुद्दे को हवा देते रहे हैं। पिछले दिनों अलग-अलग राजनीतिक दलों के दो-दो प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन मंत्री स्मृति ईरानी से मुलाकात कर अपनी बात रखी थी और वापस लौटने पर मजबूर हुए थे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आप के प्रतिनिधिमंडल को कानून का पाठ पढ़ाया था और तत्कालीन मंत्री स्मृति ईरानी ने साफ कर दिया था कि केंद्र इस बाबत कोई फैसला लेगा।

हां, अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और डीयू के कुलपति प्रो योगेश त्यागी चाहें तो दिल्ली सरकार के कॉलेजों में इस बाबत कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है। इसके बाद से यह मुद्दा बंद हो गया था। आप ने भी चुप्पी साध ली थी। उधर विजय गोयल मंत्री बन गए और दिल्ली से उनके इस बाबत लगे बैनर धीरे-धीर हटने लगे। दिल्ली के छात्रों के लिए कटआॅफ में कोई 5 फीसद तो कोई 10 फीसद की रियायत का सुझाव दे रहा था तो कोई डीयू का 85 फीसद आरक्षण दिल्ली के छात्रों के लिए मांग रहा था। दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि दिल्ली सरकार और कॉलेज क्यों नहीं खोल रही। डीयू के अलावा दिल्ली में छह विश्वविद्यालय राज्य सरकार के हैं। जिनमें से दो गुरुगोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय और आंबेडकर विश्वविद्यालय तो पूरी तरह स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रम को लिए ही कांग्रेस का सरकार ने बनाए हैं। दिल्ली सरकार इसके अधीन कालेज क्यों नहीं खोल पा रही है। इसके अलावा दूसरा पेच सीबीएससी के ‘दिल्ली जोन’ के दायरे को लेकर है। क्योंकि दिल्ली जोन में केवल दिल्ली नहीं आती बल्कि पूरा एनसीआर समेत तीन राज्यों के कई जिले के स्कूल आते हैं। केजरीवाल की सरकार इस जोनवार छात्रों का हिसाब कैसे लगाएगी।

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गोयल के मंत्री बनने से पहले तक दिल्ली में जो पोस्टर लगे थे उसमें बिहार के टॉपर घोटाला का जिक्र किया गया था। जबकि उन्होंने गुजरात के टॉपर घोटाले पर चुप्पी साध रखी थी। कहना न होगा कि गुजरात में भाजपा की सरकार है। हालांकि गुजरात का जिक्र आप के मनीष सिसोदिया ने मंत्रालय के लिखे पत्र में किया था। दो जून को लिखे पत्र में सिसोदिया ने डीयू में दिल्ली वालों के तरजीह की मांग करचे हुए लिखा था -हाल ही में हमने बिहार और गुजरात का टॉपर घोटाला देखा। ऐसे घोटाले का खामियाजा दिल्ली के छात्रों को भुगतना पड़ता है। लिहाजा दिल्ली के छात्रों को कटआफ में आरक्षण की रियायत मिलनी चाहिए।
जो लोग डीयू में दिल्ली के छात्रों के लिए 85 फीसद आरक्षण देने का सुझाव दे रहे हैं, उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि सभी मद मिला लिए जाएं तो दिल्ली विश्वविद्यालय में 65 फीसद से ज्यादा आरक्षण दाखिले में पहले से लागू है। ऐसे में 85 फीसद की आरक्षण की एक मांग कितनी जायज है। सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण पर साफ दिशा-निर्देश हैं। 51 फीसद से ज्यादा का कोटा किसी एक मद में दिया जाना गैरकानूनी है। गोयल, सिसोदिया और अब केजरीवाल तक को यह मालूम तो होगा ही।

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