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गर्दिश में एक मनोहारी कारीगरी

आज सरकारी उपेक्षा के कारण गुलाबी नगर जयपुर में ब्लू पॉटरी कला पर खतरे की काली छायाएं मंडरा रही हैं। सरकार द्वारा इस पर भारी बिक्री कर लगाने से इसकी स्थिति और ज्यादा खराब हो रही है।
Author December 12, 2015 03:03 am

आज सरकारी उपेक्षा के कारण गुलाबी नगर जयपुर में ब्लू पॉटरी कला पर खतरे की काली छायाएं मंडरा रही हैं। सरकार द्वारा इस पर भारी बिक्री कर लगाने से इसकी स्थिति और ज्यादा खराब हो रही है। ब्लू पॉटरी वैसे राजस्थान की अपनी मूल कला नहीं है। भारत में इस कला का प्रचलन मुगलकाल में अफगानिस्तान के जरिए हुआ। चार हजार साल पहले मिस्र में खोदाई के समय कुछ ऐसे पात्र मिले थे, जो एक विशेष प्रकार की मिट्टी से कलात्मक ढंग से बनाए हुए थे। इस खोदाई में मिली कला न ही ब्लू पॉटरी को दुनिया में स्थापित कर दिया।
जयपुर में ब्लू पॉटरी की कला का श्रेय महाराजा रामसिंह को जाता है, जिन्होंने इसे सीखने के लिए अपने दो कारीगरों को दिल्ली के मोला कुम्हार के पास भेजा था। रामसिंह हस्तकलाओं को प्रोत्साहित करने के हामी थे। दोनों कारीगरों के परिवारों से ही आज यह कला विकसित हुई। 1963 में रामसिंह शिल्पशाला की स्थापना की गई और महाराजा मानसिंह ने पचहत्तर हजार रुपए का अनुदान दिया। लेकिन चंद दिनों बाद ही यह शाला बंद हो गई। हालांकि तब तक यह कला जीविकोपार्जन के रूप में स्थान पा चुकी थी। बाद में कुछ दूसरे लोगों ने इसे अपनाया।
आज करीब एक हजार से अधिक शिल्पी इस कला से रोजी-रोटी कमा रहे हैं। बड़े-बड़े एंपोरियमों में यह कला पर्यटकों का ध्यान खींचती है। हर साल करीब पंद्रह लाख रुपए के मनमोहक फूलदान-एस्ट्रे और पेन स्टैंड, जार और प्लेटें बिक जाती हैं। यह कला सिर्फ शहर में ही चल सकती है, गांवों में इसके संचालन के पूर्ण साधन प्राप्त करना कठिन है।
इस कला पर चंद पूंजीपतियों ने एकाधिकार कर लिया है। बाकी लोग मजदूरी करने को विवश हैं। सरकारी ऋण और संरक्षण के अभाव में शिल्पी अपना खुद का व्यवसाय संचालित करने में सक्षम नहीं है। इसे आधुनिकतम नए पैटर्न और शिल्प के साथ विकसित करने की फिक्र भी नहीं है। पराई कला मानकर सरकार इसे उचित दर्जा और देखभाल का स्तर नहीं दे पाई है। इस कला को चित्ताकर्षक बनाने के लिए सरकार की ओर से उचित प्रशिक्षण की भी व्यवस्था नहीं है और ऊपर से बिक्री कर की मार।

चंद वर्षों पहले राजस्थान लघु उद्योग निगम ने डिजाइन सेंटर ब्लू पॉटरी के विकास और विस्तार के लिए स्थापित किया था, लेकिन यह चल न सका। और इसके सभी कार्यक्रम मटियामेट हो गए। वैसे भी फूलदान, कलमदान, जार, कप सभी चीजें रोजमर्रा के उपयोग की नहीं रही हैं। राजा-रईस-नवाब और धनाढ्य वर्ग इसे अपने कमरों को सजाने के लिए काम में लेते रहे हैं। यह जनसामान्य में लोकप्रिय नहीं हो पाई और अब इसे कोई संरक्षण भी नहीं है।
इस कला को कलात्मक बनाने में यहां के चित्रकार कृपालसिंह शेखावत का विशेष योगदान रहा। उन्होंने इसके लिए नए- नए डिजायन उत्कीर्ण किए, जिससे इस कला को और अधिक व्यापकता मिली। इसके लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री की उपाधि से भी अंलकृत किया था। जिस तरह ब्लू पॉटरी में डिजायन के रंगों को पक्का किया जाता है, वह अद्भुत है। इन पात्रों को पकाने के बाद डिजायन अमिट हो जाता है और यह अपना आकर्षण नहीं खोता। रंग मुख्यतौर पर नीला ही होता है, इसलिए ब्लू पॉटरी नाम दिया गया। चीनी मिट्टी से बने ये वस्तुएं पत्थर जैसी कठोरता और दृढ़ता ले लेती हैं। इनमें छोटे से लेकर बड़े बर्तन भी बनाए जाते हैं। इन्हें से पता चलता है कि कलाकारों नें इन्हें कैसे और कितनी सुघड़ता के साथ आकार दिया है।
इसके ज्यादातर शोरूम जयपुर में चंद्रमहल के बाहर और आमेर रोड पर बहुतायत से हैं, लेकिन दूसरे स्थानों और हस्तशिल्प केंद्रों में भी यह कला देखी और खरीदी जा सकती है। कीमत ज्यादा होने की वजह से विदेशी सैलानी या अपने देश की अमीर लोग ही इसे खरीद पाते हैं। हालांकि, मुनाफे का ज्यादा हिस्सा दुकानदारों के पास चला जाता है, असली कारीगर तो बस नाममात्र ही पाते हैं।
बड़े-बड़े पूंजीपति भी इन्हें अपने ड्राइंगरूम में सजाने के लिए खरीदते हैं। सरकारी नियंत्रण और संरक्षण में अगर इनकी कीमतों पर लगाम लगे तो इसे और अधिक लोकप्रियता मिल सकती है और यह विदेशी मुद्रा कमाने का बड़ा जरिया बन सकती है। देश-विदेशों में इसका फैलाव तो हुआ है, लेकिन जिस लोकप्रियता को इसे पाना चाहिए, वह अभी विकसित करने के लिए और जरूरी है। वह जरूरत इसके मंहगे भावों को नियंत्रित करने की है। इसमें पिसता है इसकी मजदूरी करने वाला कलाकार। इसे खरीददार शोरूम वाले ज्यादा मुनाफा नहीं दे पाते हैं, इससे यह चंद लोगों की पहुंच तक सिमट कर रह गई है। निसंदेह ब्लू पॉटरी कला चित्ताकर्षक और मनोहारी है, लेकिन इसे सरकारी संरक्षण मिले तो यह और अधिक बाजार पा सकती है। इसके कारीगरों को प्रोत्साहित करने और मुनाफाखोरी से बचाना पहली जरूरत है।

 

 

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