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मुश्किल में भाजपा, किसको सौंपे दिल्ली की कमान

केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में खुद को मजबूत करने के लिए भले ही कितने हाथ-पैर मार रही हो, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती नए प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव है।
Author नई दिल्ली | July 25, 2016 04:03 am

केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में खुद को मजबूत करने के लिए भले ही कितने हाथ-पैर मार रही हो, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती नए प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव है। आम आदमी पार्टी (आप) और उसकी सरकार के हमलों से जूझ रही भाजपा नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए काफी सोच-विचार कर कदम उठा रही है। भाजपा के नए अध्यक्ष के लिए पार्टी में विचार-मंथन चल रहा है। हालिया दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर पार्टी को एक अहम फैसला यह भी करना है कि मौजूदा अध्यक्ष को एक और मौका दिया जाए, या फिर किसी अन्य चेहरे को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए।

आप सरकार के संसदीय सचिव विवाद के कारण 21 विधानसभा सीटों पर फिर से चुनाव की संभावना बन रही है। इसके बाद भाजपा के सामने नगर निगम चुनावों की चुनौती भी है। भाजपा अगर नया अध्यक्ष लाती है, तो उसे न केवल संगठन को नए सिरे से खड़ा करना पड़ेगा, बल्कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार और कांग्रेस का मुकाबला भी करना होगा। दो महीने पहले ही पार्टी ने नए सिरे से समिति और मंडलों का गठन किया है। अब पार्टी को नए प्रदेश अध्यक्ष का फैसला करना है।

दिल्ली भाजपा की करीब 10 हजार समितियां, 280 वार्ड और 14 जिले हैं। इन्ही पर पार्टी का पूरा संगठन टिका हुआ है। इन सबके ऊपर पार्टी की प्रदेश इकाई है, जिसके मुखिया प्रदेशाध्यक्ष होते हैं। दिल्ली भाजपा के संगठन को मजबूत बनाने के लिए बीते दो महीने में राष्ट्रीय स्तर पर कई बार चर्चा हो चुकी है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती आप के मुखिया व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। दिल्ली में महानगर परिषद और फिर विधानसभा बनने के बाद मौजूदा दौर में राजनीतिक माहौल जितना गरम है, उतना कभी नहीं रहा। केजरीवाल और उनकी पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर रोजाना आरोप लगा रही है।

बिहार चुनाव के नतीजों से उत्साहित केजरीवाल ने अब अपना फोकस पंजाब चुनाव पर कर लिया है। वह हर एक मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने में लगे हुए हैं, जिसे लेकर भाजपा काफी नाराज है। दिल्ली भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विधानसभा की 21 सीटों के लाभ का पद होने को लेकर चुनाव आयोग में चल रहे मामले के बाद की स्थिति है। अगर चुनाव आयोग 21 विधायकों की सदस्यता रद्द कर देता है, तो दिल्ली में उन 21 सीटों पर जल्द ही चुनाव की संभावना बन जाएगी। उसके बाद अगले साल की शुरुआत में ही नगर निगमों का चुनाव है। दिल्ली भाजपा के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा ये दोनों संभावित चुनाव ही हैं। दिल्ली में तीनों निगमों में भाजपा काबिज है। भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी है। वहीं कांग्रेस ने भी दिल्ली में अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करना शुरू कर दिया है। दिल्ली भाजपा लगातार केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को घेरने की कोशिशों में लगी है। दिल्ली में सातों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। पार्टी ने अपने सातों सांसदों को आप और केजरीवाल सरकार के खिलाफ मैदान में उतारा है।

उन सात में से दिल्ली के चार सांसद महेश गिरी, मनोज तिवारी, रमेश बिधूड़ी और प्रवेश वर्मा केजरीवाल और उनकी पार्टी के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए हैं। दिल्ली भाजपा की कमान संभालने के लिए इन दिनों कई नामों पर विचार चल रहा है। पार्टी अगर मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष सतीश उपाध्याय को एक मौका और देती है, तो उन्हें नए संगठन बनाने की कवायद में उलझना नहीं पड़ेगा। वहीं अगर किसी नए नेता को दिल्ली की कमान सौंपी जाती है, तो पार्टी के सामने सबसे पहले दिल्ली के इन चारों सांसदों के नाम हैं। कुछ वक्त पहले तक पवन शर्मा को इस पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था।

पवन शर्मा दिल्ली भाजपा के संगठन महामंत्री रह चुके हैं, और वे आरएसएस की पृष्ठभूमि से हैं, लेकिन अब तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम के बाद किसी और सांसद पर गहराई से विचार हो रहा है। दिल्ली के चारों सांसदों की भी अलग-अलग पृष्ठभूमि है। इनमें रमेश बिधूड़ी और प्रवेश वर्मा दिल्ली से सांसद हैं। हाल ही में केजरीवाल से सीधे टकराव लेकर महेश गिरी भी काफी चर्चा में रहे हैं। इसी तरह से राजधानी में बढ़ रहे पूर्वांचल वोट बैंक को देखते हुए सांसद मनोज तिवारी का भी नाम चर्चा में हैं। भाजपा को केजरीवाल और उनकी पार्टी का मुकाबला करने के लिए ऐसा प्रदेशाध्यक्ष चाहिए, जो एक समय पार्टी के बड़े नेता रहे मदन लाल खुराना की तरह संगठन को चला सके और केजरीवाल के सामने कड़ी चुनौती पेश कर सके। भाजपा मौजूदा दौर में नया प्रयोग करने के लिए भी तैयार नहीं है।

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