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क्या बढ़ा-चढ़ा कर बताई गई भारत में बाघों की संख्या?

भारत में कितने बाघ हैं? सरकार के सबसे हालिया आकलन के अनुसार यह संख्या 2,226 है। वैज्ञानिक आधार पर की गई गणनाओं का आकलन है कि यह संख्या लगभग 1500 से 3000 के बीच रह सकती है।
Author नई दिल्ली | July 25, 2016 00:54 am
(Express Photo: Amrut Naik)

भारत में कितने बाघ हैं? सरकार के सबसे हालिया आकलन के अनुसार यह संख्या 2,226 है। वैज्ञानिक आधार पर की गई गणनाओं का आकलन है कि यह संख्या लगभग 1500 से 3000 के बीच रह सकती है। इतना अधिक अंतर नामी परियोजना ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ को सफल या विफल बनाने में एक बड़ी वजह बन सकता है। इसलिए ये आकलन नीति-निर्धारण के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण हैं।

सभी लोग 2,226 के आंकड़े पर सहमत नहीं हैं। वन्य जीव विशेषज्ञ बाघों की संख्या के आकलन के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। सरकार के भारतीय वन्यजीवन संस्थान (डब्लूआइआइ), देहरादून के विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य भारत में बाघों के आवास के लिहाज से सबसे मशहूर स्थान कान्हा नेशनल पार्क में कुछ आकलन 30 फीसद तक अधिक हो सकते हैं।

डब्ल्यूआइआइ के जाने-माने बाघ शोधकर्ता यादवेंद्र देव झाला ने एक शोधपत्र में लिखा है कि डीएनए फिंगरप्रिंटिंग की तकनीक का इस्तेमाल करने वाले विशेषज्ञों ने यह आकलन किया है कि कान्हा में बाघों की संख्या 89 है। वहीं कैमरा ट्रैप पर निर्भर एक अन्य वैज्ञानिक तकनीक इससे कहीं कम 60 का आकलन देती है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बाघ एकांत पसंद करने वाले जानवर हैं। उनकी गणना आसान नहीं है। लेकिन गणना में इतना अधिक अंतर दोनों ही तकनीकों के प्रति संदेह पैदा करता है। अप्रैल में बाघ सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘बाघों के संरक्षण के मामले में भारत का एक लंबा और सफल रेकार्ड रहा है। हमने 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू किया था। इसका दायरा शुरुआती नौ बाघ रिजर्वों से बढ़ कर अब 49 तक पहुंच गया है। बाघ संरक्षण भारत सरकार और राज्यों की एक साझा जिम्मेदारी है।

संवेदना और सह-अस्तित्व के लिए प्रोत्साहित करने वाली हमारी सांस्कृतिक विरासत ने प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता में एक अहम भूमिका निभाई है। इन साझा प्रयासों के कारण बाघों की संख्या में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह संख्या वर्ष 2010 की 1,706 से बढ़ कर 2014 में 2,226 तक पहुंच गई है।’

दिल्ली में हुई वैश्विक बाघ विशेषज्ञों की इसी बैठक में एक दशक से भी कम समय में बाघों की वैश्विक संख्या को दोगुना करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया। ‘ग्लोबल टाइगर फोरम’ की अप्रैल में हुई बैठक में इस संख्या को दोगुना करने की घोषणा की गई। इसमें कहा गया, ‘सौ साल पहले वैश्विक तौर पर एक लाख जंगली बाघ थे। साल 2010 में यह संख्या सिर्फ 3200 थी। 2010 में, टाइगर रेंज की सरकारों में वर्ष 2022 तक जंगली बाघों की संख्या को दोगुना करने पर सहमति बनी है। इस लक्ष्य को ‘टी गुणा टू’ कहा जाता है।’

पिछली सदी में जब बाघों की संख्या वाकई गिर गई, तब मध्यप्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क में पैरों के निशान के आधार पर बाघ गणना की प्रणाली को शुरुआती मान्यता दी गई। ऐसा माना जाता था कि हर बाघ के पंजे का निशान अलग होता है और इन निशानों को एकत्र कर बाघों की संख्या का आकलन किया जा सकता है। तब लंबे समय से कान्हा नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर रहे मशहूर बाघ संरक्षणविद एचएस पवार ने इसे एक वैज्ञानिक तरीका बनाया गया।

यह तकनीक उस समय मुश्किलों में घिर गई, जब साइंस इन एशिया के मौजूदा निदेशक के.उल्लास कारंत ने बंगलुरु की वन्यजीवन संरक्षण सोसाइटी के लिए विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में बंधक बनाए गए बाघों के पंजों के निशान लिए और विशेषज्ञों से इनमें फर्क करने के लिए कहा। इसके बाद पंजों के निशान की तकनीक की कमजोरी उजागर हो गई और फिर इस तकनीक को त्याग दिया गया।

इसके बाद ‘कैमरा ट्रैपिंग’ का एक नया तरीका लाया गया, जिसे कारंत की टीम ने शुरुआत में दक्षिण भारत में लागू किया। इसमें जंगल में बाघों की तस्वीरें लेकर उनकी गणना की जाती थी। ऐसा माना गया कि हर जानवर के शरीर पर धारियों का प्रारूप ठीक उसी तरह अलग-अलग है, जैसे इंसान के अंगुलियों के निशान अलग होते हैं। तब कई तस्वीरों की तुलना कर बाघों की संख्या का पता लगाया जा सकता है।

यह एक महंगा तरीका था लेकिन निश्चित तौर पर यह बाघों के पैरों के निशान लेने से ज्यादा मजबूत था। कैप्चर और री-कैप्चर की तकनीकों वाले परिष्कृत सांख्यिकी उपकरणों और प्रारूप की पहचान करने वाले सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके बाघों की विश्वसनीय संख्या का पता लगाया गया।

इस तकनीक में दिखाया गया कि बाघों की संख्या नाटकीय ढंग से गिर गई है। ऐसे में इस बात को लेकर खतरे की घंटी बज गई कि इस सदी के अंत तक बाघ लुप्त हो सकते हैं। लेकिन शुक्र है, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रमुख राजेश गोपाल जैसे बाघ विशेषज्ञों की सक्रिय निगरानी का, जिसके कारण बाघ को विलुप्त होने के कगार से वापस लाने में मदद मिल गई।

तब कैमरा ट्रैप का यह तरीका डब्ल्यूआइआइ ने अपना लिया था और सभी बाघ आवासों में इसे लागू कर दिया गया। भारत में बाघों की हालिया संख्या 2,226 का आकलन कैमरा ट्रैप के इस्तेमाल से ही किया गया। फिर भी कुछ ऐसे इलाके हैं, जिनमें कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल असंभव है। इनमें वे इलाके हैं, जहां कैमरे तोड़ फोड़ दिए जाते हैं या जहां नक्सल हिंसा हावी है। 21वीं सदी में डीएनए तकनीक में महारथ हासिल कर ली गई है।
विशेषज्ञों ने डीएनए तकनीकों का इस्तेमाल कर बाघों की संख्या का आकलन शुरू कर दिया है। इसके लिए बाघों के बाल या उनके मल आदि एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद इनके जैव रासायनिक विश्लेषण होते हैं। यह काम हैदराबाद और बंगलुरु की प्रयोगशालाओं में होता है। हालांकि डब्लूआइआइ के एक समूह ने डीएनए आधारित आकलन की सच्चाई पर भी सवाल उठाए हैं।

विभिन्न बाघ विशेषज्ञों के बीच संख्याओं की यह लड़ाई यहां खत्म नहीं होती। कारंत के नेतृत्व में चार श्रेष्ठ बाघ संरक्षणविदों ने बाघों की संख्या दोगुनी करने की परियोजना की आलोचना करते हुए कहा है कि यह ‘वैज्ञानिक तौर पर विश्वसनीय नहीं है।’

कारंत और उनकी टीम का कहना है, ‘वास्तविकता से दूर ले जाने वाले, बाघों की संख्या के इस खेल में उलझने के बजाय संरक्षणविदों को अब बाघों की मूल संख्या को बढ़ाने और इसकी निगरानी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उनके बचे हुए आवासों का संरक्षण करना चाहिए। यह सब विज्ञान पर आधारित होना चाहिए।’

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