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योगेंद्र यादव का खुलासा: लालू से यूं ही गले नहीं मिले केजरीवाल, बन रहा है नया मोर्चा

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर राजनीति करने वाले अरविंद केजरीवाल शुक्रवार को नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में जब लालू यादव से गले मिले..
Author नई दिल्ली | November 23, 2015 09:44 am
20 नवंबर को नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में एक साथ लालू प्रसाद और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। केजरीवाल का कहना है क‍ि लालू ने उन्‍हें खींचकर गले लगा ल‍िया। (पीटीआई फोटो)

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर राजनीति करने वाले अरविंद केजरीवाल शुक्रवार को नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में जब लालू यादव से गले मिले तो टि्वटर पर उनकी खूब चुटकी ली गई है। चारा घोटाले में दोषी करार लालू से गले मिलना केजरीवाल के प्रशंसकों को भी खटक गया, मगर वे चुप हैं, लेकिन आम आदमी पार्टी से निकाले गए योगेंद्र यादव ने चुप्‍पी तोड़ दी है। उन्‍होंने केजरीवाल पर निशाना साधा है और इसके लिए फेसबुक पर अपने विचार पोस्‍ट किए हैं। इस पोस्‍ट में वह बता रहे हैं कि आखिर लालू से गले मिलने पर क्‍यों केजरीवाल की आलोचना की जानी चाहिए और आखिर इसके राजनीतिक मायने क्‍या हैं?

योगेंद्र यादव की फेसबुक पोस्‍ट। योगेंद्र यादव की फेसबुक पोस्‍ट।

आप खुद ही पढ़ लीजिए योंगेद्र यादव ने क्‍या लिखा है अपनी फेसबुक वॉल पर?

शीर्षक- फोटो के पीछे एक अलिखित समीकरण:

कल जब मैंने बिहार के शपथ ग्रहण समारोह में लालू प्रसाद यादव और अरविन्द केजरीवाल की तस्वीर देखी, तो मुझे बहुत दुःख हुआ, शर्मिंदगी भी महसूस हुई। मैंने ट्विटर पर लिखा “अब यही दिन भी देखना था!” यह भी लिखा “Sad day for Indians against corruption. Political capital of the movement sold to symbols of political corruption. Ashamed!” इसके बहुत जवाब आये। जब भी
नरेंद्र मोदी या अरविन्द केजरीवाल की कोई भी आलोचना की जाय तो बहुत गाली-गलौज भी सुननी पड़ती है, वो भी हुआ। फिर भी कई सवाल पूछे गए हैं जिनका जवाब देना चाहिए:

— ये सामान्य शिष्टाचार था, इसको इतना तूल क्यों दे रहे हैं?
— लालू जी ने जबरदस्ती पकड़ कर फोटो खिचवा ली, अरविन्द का क्या दोष?
— कई लोगों ने मेरी अखिलेश यादव के साथ फोटो लगाकर पूछा की तो मुलाक़ात गलत नहीं थी?

मेरी समझ में राजनीती में सामान्य शिष्टाचार बहुत जरूरी है। विरोधियों के साथ भी शालीनता, संवाद और दुआ-सलाम होना चाहिए। अगर अरविन्द अब यह शिष्टाचार सीख रहे हैं तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन पटना के समारोह में लालू जी से मुलाकात कोई संयोग नहीं था। यह दो महीने से चल रहे एक अनौपचारिक गठबंधन की परिणीति थी, एक नए राष्ट्रीय मोर्चे का इशारा था। अरविन्द का खेमा पिछले दो महीने से प्रचार कर रहा था कि उनका समर्थन सिर्फ नीतिश कुमार के लिए है, वे लालू जी के साथ कभी स्टेज पर नहीं जायेंगे। ऐसे मे लालू प्रसाद यादव (तथा शरद पवार, देवेगौड़ा, फारूख अब्दुल्ला और राहुल गांधी) के साथ स्टेज पर बैठना सिर्फ सामान्य शिष्टाचार नहीं था। सवाल ये नहीं है कि गले लगाने की शुरुआत किसने की। टीवी फुटेज से स्पष्ट है कि पहल लालूजी ने ही की थी और अरविन्द इस सार्वजनिक प्रदर्शन से संकोच में थे।

असली बात यह है कि लालूजी ने (शायद जबरदस्ती से ही) उस समीकरण को सार्वजनिक कर दिया जो उस समारोह की अलिखित बुनियाद थी। और वह समीकरण सीधा है — सिद्धांत, नैतिकता और भ्रष्टाचार जाएँ भाड़ में, बीजेपी के विरोध में सब क्षेत्रीय दल सब कुछ भूल कर एक साथ हैं। ये वही तर्क है जो कांग्रेस समर्थक लोकपाल आंदोलन के विरोध में इस्तेमाल करते थे। कहते थे कांग्रेस भष्टाचारी तो है लेकिन उसका विरोध नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे बीजेपी को फायदा मिलेगा। इस समीकरण को स्वीकार कर अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का माथा नीचा किया है, उन लाखों आंदोलनकारियों का अपमान किया है जिन्होंने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना देखा था।

रही बात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ मेरी फोटो की, वह मुख्यमंत्री, उनके कैबिनेट सहयोगियों और मुख्यसचिव (वो भी फोटो में हैं) के साथ औपचारिक मुलाकात थी — जैसी मुलाकात अरविन्द अक्सर देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री से करते हैं। सूखाग्रस्त इलाकों की हमारी संवेदना यात्रा के बाद हमने सभी मुख्यमंत्रियों को सूखे की स्थिति और उसके समाधान के बारे में चिठ्ठियाँ लिखी थीं और उन्हें सार्वजनिक भी किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जवाब में हमें बातचीत के लिए बुलाया। बाकी राज्यों (कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और हरियाणा) से जवाब का इन्तजार है, न्योता मिलेगा वहां भी तो जरूर जाऊँगा और फोटो भी खिंचवाऊंगा!

उम्मीद है आपको अपने सवालों के जवाब मिल गए होंगे।

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