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जहां आपनो गांव

रामधारी सिंह दिवाकर गांव को लेकर महानगरीय अवधारणा में या तो रोमांटिक अतीत राग (नॉस्टेल्जिया) होता है या एक तरह की उदासीन उपेक्षा का भाव कि गांव अशिक्षा, अंधविश्वास, गरीबी, गलाजत आदि के प्रतिरूप होते हैं- विकास में पिछड़े हुए, आधुनिकता से दूर। यानी एक अंधा कुआं! गांव को केंद्र बना कर कविता, कहानी, उपन्यास […]
Author November 7, 2014 15:31 pm

रामधारी सिंह दिवाकर

गांव को लेकर महानगरीय अवधारणा में या तो रोमांटिक अतीत राग (नॉस्टेल्जिया) होता है या एक तरह की उदासीन उपेक्षा का भाव कि गांव अशिक्षा, अंधविश्वास, गरीबी, गलाजत आदि के प्रतिरूप होते हैं- विकास में पिछड़े हुए, आधुनिकता से दूर। यानी एक अंधा कुआं! गांव को केंद्र बना कर कविता, कहानी, उपन्यास या कुछ और लिखने वाले गांव से विस्थापित (?) और महानगरों के नए नागरिक बने लेखक जो आमतौर पर अपनी स्मृतियों को लेकर ही लिखते हैं, उनमें वर्षों पहले का देखा-भोगा गांव होता है। यही वजह है कि गतिमान गांव की समकालीन विसंगत स्थितियों को वे पकड़ नहीं पाते। बेशक बदलते हुए गांव की जमीन पर चुपचाप होने वाले बदलाव या फिर पहले की बनी जड़ताओं को पकड़ पाना संभव नहीं है, फिर भी यह असंभव जैसी स्थिति उन नवाचारी लेखकों के लिए कुछ ज्यादा ही चुनौतियों से भरी होती है जो महानगरों की अपाधापी, शोर और तात्कालिकता में जीते हैं। गांवों को देखने की उनकी दृष्टि एक खास जगह जाकर ठहर जाती है और स्वाभाविक रूप से कुछ सच उनसे छूट जाते हैं!

ऐसे बहुत सारे गांव हैं अवश्य जो आज भी ढिबरी या लालटेन-युग में जीने के लिए अभिशप्त हैं। लेकिन ऐसे गांवों की संख्या पहले के मुकाबले आज काफी हद तक कम हुई है। जो हैं, वहां भी बदलाव के हालात बन रहे हैं या बदलाव की मांग शुरू हो चुकी है। मैं कोसी-प्रक्षेत्र का रहने वाला हूं। कोसी की बाढ़ ने उस इलाके को किस रूप में मशहूर किया है, यह अब शायद सभी जानते हैं। वहां की एक बड़ी आबादी कोसी की बाढ़ में उज़ड़ती है, बसती है, फिर उजड़ती है। सन 2008 के अगस्त में कोसी की प्रलयंकारी बाढ़ ने ऐसा तांडव मचाया कि कुछ महीनों बाद जब बाढ़ उतर गई, तब लोगों के लिए यह पता करना मुश्किल था कि उनके खेत-खलिहानों की सीमा-रेखाएं कहां हैं। कई-कई कोस तक बालू के ढूह और गहरी खाइयां दिख रही थीं! कितने टोलों-मुहल्लों की पहचान तक लुप्त हो गई थी। दूर-दूर तक ऊबड़-खाबड़ बालू से पटी बंजर जमीन जब मैं देखता था तो करुणार्द्र होकर सोचने लगता था, क्या यह जमीन अब कभी खेती के लायक बन सकेगी? फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने ‘मैला आंचल’ में जिस बालुका-राशि के विषय में लिखा था- ‘धरती नहीं, धरती की लाश जिस पर कफन-सी फैली बालूचरों की पंक्तियां…! लेकिन बलिहारी आदमी का साहस! तीन-चार साल बाद फिर लहलहाने लगीं फसलें… फिर लौट आया जीवन!’ मुझे याद आई कुंवर नारायण की कविता- ‘आदमी के साहस से कुछ भी बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं!’

उजड़ कर बसे कोसी अंचल के एक ऐसे ही गांव में मुझे अपने भतीजे की शादी में जाने का अवसर मिला। एक बात पर खासतौर पर ध्यान गया कि कोसी अंचल के ‘निछच्छ’ गांव में अब बारात बैलगाड़ियों पर सवार होकर नहीं जाती। लेकिन गांव में अब बैलगाड़ियां हैं कहां! और खेती भी अब हल-बैलों से आमतौर पर नहीं होती हैं!’ ट्रैक्टरों से होती है खेतों की जुताई। गांव के निर्धन आदमी की बारात भी अब चरपहियों या ट्रैक्टर के ट्रेलरों पर जाती है। मेरी शादी में बारात बैलगाड़ियों से गई थी, दो-दो नदियों के पार! कारी कोसी में बड़ी-सी नाव पर बैलगाड़ी चढ़ा दी गई थी। मैं दूल्हा था, नाव पर चढ़ी बैलगाड़ी में बैठा। बैलों को नाव के पीछे बांध दिया गया था। बैल पानी में तैरते हुए पार हुए थे। भतीजे की शादी में नौ-दस बड़ी-बड़ी गाड़ियां थीं। बाद में जब मैं बरातियों के साथ सफारी में बैठा, तो मुझे अपनी शादी की वह बैलगाड़ी याद आई जो दो-तीन बार उलार होते-होते बची थी। कोसी-प्रक्षेत्र की आमतौर पर सारी सड़कें कच्ची, टूटी हुई, कहीं-कहीं बिल्कुल गायब हो चुकी थीं। नदियों पर बने पुल टूटे हुए थे। मगर मेरे लिए सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात थी कि गांव में घर-घर में एक या एक से ज्यादा मोबाइल फोन थे। मेरे गांव के बाजार में और मेरे घर में भी इंटरनेट की सुविधा है। मोबाइल कंपनियों के ऊंचे-ऊंचे टावर भी जहां-तहां दिख जाते हैं। गांव के लड़के-लड़कियां आॅनलाइन प्रतियोगिता परीक्षाओं के आवेदन भरते हैं और रिजल्ट भी देखते हैं।
बहुत पहले जो मजदूर महिला मेरे खेतों में काम करती थी, उसे मैंने देखा। उसके हाथ में मोबाइल फोन था। उसे वह ‘मोजैल’ कहती थी और ‘मिस्ड कॉल’ को ‘मुसकैल’ बताती थी! वह किसी को अपना नंबर लिखवा रही थी- ‘लिखऽ… नैन-नैन-फैब-सेभुन…!’

vedantchandan0001@gmail.com

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  1. D
    DR.CHANDRAKUMAR JAIN
    Nov 7, 2014 at 6:02 pm
    अत्यंत भावपूर्ण, सरस, ज और रोचक चित्रण। साधुवाद। डॉ.चन्द्रकुमार जैन
    (0)(0)
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