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जब अटल बिहारी वाजपेयी को लगा कि नरेंद्र मोदी करने वाले हैं उनका तख्‍तापलट

स्थितियां बदलते देख, वाजपेयी चुप रहे गए। शायद वह इसलिए चिंतित थे कि युवा नेता उनके अधिकारों पर सवाल उठा रहे थे।
मार्च, 2002 के एक कार्यक्रम में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी। (Express Archive)

“2002 में गुजरात दंगों के तुरंत बाद तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर भी दोषारोपण किया गया था। राज्‍य में बीजेपी की सरकार थी, जिसके मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी पर हिंसा को न रोक पाने के आरोप थे। मोदी उस समय एक विलेन जैसे थे जो केंद्र सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब बने। मोदी ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के दौरान वाजपेयी का मुंह बंद कराने की कोशिश भी की थी। रिपोर्टर दंगों के बाद मुख्‍यमंत्री के लिए वाजयेपी का संदेश जानना चाहता था। वाजपेयी ने संयत स्‍वभाव से कहा कि मोदी को ‘अपने राजधर्म का पालन’ करना चाहिए। उन्‍होंने राजधर्म का मतलब भी समझाया, मगर वाजपेयी को अपने बारे में कुछ तीखा बोलने से रोकने के लिए, मोदी उनकी तरफ मुड़े, नजरें मिलाने की कोशिश की और लगभग धमकाने वाले अंदाज में कहा, ”हम भी वही कर रहे हैं, साहिब।” वाजपेयी ने मौके की नजाकत को समझा और कहा, ‘मुझे पूरा विश्‍वास है कि नरेंद्रभाई भी वही कर रहे हैं।’

अप्रैल में अपने सिंगापुर दौरे पर फ्लाइट के दौरान वाजपेयी चिंतित थे कि देश के बाहर उन्‍हें और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा। हालांकि तत्‍कालीन केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने वाजपेयी को आडवाणी से बात करने की सलाह दी। सिंगापुर दौरे के आखिरी दिन प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में एक पत्रकार ने सिंगापुर में धार्मिक हिंसा का जिक्र करते हुए सवाल पूछा, ”भारत में ऐसी हिंसा एक बार नहीं, कई बार हुई है, भारत के अनुभव से सिंगापुर क्‍या सीख सकता है?” वाजपेयी ने माथा रगड़ने के बाद धीमी आवाज में जवाब दिया, ”भारत में जो भी हुआ, बेहद दुर्भाग्‍यपूर्ण था। दंगे नियंत्रिण किए जा चुके हैं। अगर गोधरा स्‍टेशन पर, साबरमती एक्‍सप्रेस के यात्रियों को जिंदा जलाया नहीं गया होता, तो शायद गुजरात वीभिषा रोकी जा सकती थी। यह साफ है कि घटना के पीछे कोई साजिश थी।”

11 अप्रैल को वहां से लौटने के बाद गोवा में पार्टी की वरिष्‍ठ कार्यकारिणी की बैठक थी। शौरी को पीएम और डिप्‍टी पीएम आडवाणी के साथ विमान में जाने को कहा गया। शौरी विमान में पहुंचे तो वहां वाजपेयी और आडवाणी दोनों आमने-सामने बैठे थे। उड़ान भरने के कुछ देर बाद, वाजपेयी ने अखबार उठाया और इतना फैला दिया कि आडवाणी का चेहरा नहीं दिखे। फिर आडवाणी भी अखबार उठाकर पढ़ने लगे।

अप्रैल 2002 में, राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी ने मंच संभाला और कहा कि वह दंगों की वजह से मुख्‍यमंत्री पद छोड़ना चाहते हैं। कई नेता उठकर खड़े हो गए और कहने लगे कि इसकी जरूरत नहीं है। शौरी निश्चित नहीं थे कि यह सोची-समझी रणनीति थी या नहीं, लेकिन उनके मुताबिक, वाजपेयी को लगा कि यह तख्‍तापलट की साजिश थी। शौरी उठे और बताया कि विमान में आडवाणी और वाजेपी के बीच क्‍या बात हुई है, लेकिन पदाधिकारी नारे लगाते रहे, ”ऐसा नहीं किया जा सकता। मोदी को जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।”

वाजपेयी हालात समझ गए और कहा, ”इस पर बाद में फैसला लेंगे।’ किसी ने आवाज उठाई, ”बाद में इसका फैसला नहीं हो सकता, अभी करना होगा।” फिर यह नारा बन गया। शौरी ने पाया कि आडवाणी ने कुछ नहीं कहा, जबकि वह जानते थे कि वाजपेयी, मोदी को बाहर करना चाहते थे। स्थितियां बदलते देख, वाजपेयी चुप रहे गए। शायद वह इसलिए चिंतित थे कि युवा नेता उनके अधिकारों पर सवाल उठा रहे थे।”

प्रस्‍तुत अंश उल्‍लेख एनपी द्वारा लिखी किताब The Untold Vajpayee से लिया गया है। जिसे रेडिफ डॉट कॉम ने प्रकाशित किया है।

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