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नरेंद्र मोदी सरकार के स्वच्छ सर्वेक्षण पर ही उठे सवाल, शहरों को रैंकिंग देने वाले सिस्टम में मिली ये खामियां

इस पद्धति के साथ परेशानी यह है कि इसका ज्यादातर हिस्सा निकाय संस्थाओं के दावों पर आधारित है। उनके द्वारा गलत जानकारी देने और दावे की जांच करने के लिए कोई भरोसेमंद सिस्टम भी नहीं है।
प्रश्नावली के सवालों से यह पता नहीं चल पाया कि एक शहर कितना साफ हुआ।

हाल में भारत सरकार ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 के आंकड़े जारी किए थे, जिसमें शहरों को दी गई रैंकिंग से कई सवाल खड़े हो गए हैं। इंदौर भारत का सबसे साफ शहर कैसे हो सकता है? क्या वाकई वाराणसी भुवनेश्वर से ज्यादा साफ है? लेह गंगटोक से ज्यादा गंदा कैसे हो सकता है? मुंबई और नवी मुंबई के बीच 20 पायदानों का फर्क क्यों है? ये कुछ एेसे सवाल हैं जो इस वक्त नरेंद्र मोदी सरकार के आगे उठ रहे हैं। सरकार ने देश के 434 शहरों में स्वच्छता सर्वेक्षण कराया था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरित है। एचटी की रिपोर्ट के मुताबिक सर्वेक्षण के लिए चुने गए मापदंड सही लगते हैं, क्योंकि स्वच्छ भारत मिशन देश के शहरी हिस्से को स्वच्छ बना रहा है। लेकिन शहरों को रैंकिंग देने वाली पद्धति में खामियां नजर आती हैं।

सर्वे के मुताबिक शहरों को पांच पैरामीटर्स की तर्ज पर रैंक दी गई है, ये हैं-साफ-सफाई, ठोस कचरे के निपटान, शौचालयों का निर्माण और खुले में शौच को रोकना और लोगों का बर्ताव बदलने के लिए जागरूकता अभियान चलाना। शहरों की निकाय संस्थाओं ने इन पैरामीटर्स पर अपनी तैयारियों का डेटा सर्वेक्षण में दिया था। निकाय संस्थाओं के दावों की जांच करने के सर्वेयर्स को तैनात किया गया था, जो खुद अपना भी निजी सर्वे कर रहे थे। फोन कॉल्स, सोशल मीडिया और डिजिटल एेप्स के जरिए आम नागरिकों की राय ली गई। इस सर्वे का 45 प्रतिशत हिस्सा निकाय संस्थाओं को दावों पर, 25 प्रतिशत हिस्सा सर्वेयर्स के सर्वे और 30 प्रतिशत नागरिकों के फीडबैक पर आधारित था।

इस पद्धति के साथ परेशानी यह है कि इसका ज्यादातर हिस्सा निकाय संस्थाओं के दावों पर आधारित है। उनके द्वारा गलत जानकारी देने और दावे की जांच करने के लिए कोई भरोसेमंद सिस्टम भी नहीं है। वहीं लोगों से यह भी पूछा गया था कि पिछले साल के मुकाबले इस साल साफ-सफाई बेहतर हुई है। प्रश्नावली के सवालों से यह पता नहीं चल पाया कि एक शहर कितना साफ हुआ। हो सकता है एक शहर हर साल साफ हो रहा हो, लेकिन पर्याप्त रूप से नहीं। शायद इसलिए वाराणसी 32वें पायदान पर है, जो भुवनेश्वर (94) से ज्यादा है। या फिर चंडीगढ़ कैसे 11वें पायदान पर पहुंच गया, जबकि पिछली बार वह इस सर्वे में पहले पायदान पर था।

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