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कश्मीर का सच

कश्मीर का सच कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया की एक साइट पर पढ़ने को मिला कि सरदार वल्लभभाई पटेल कश्मीर को पाकिस्तान को दे देना चाहते थे, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीरी होने के नाते कश्मीर को भारत के साथ रखना चाहते थे। यह बात पत्रकार कुलदीप नायर की जीवनी से उद्धृत कर पोस्ट की […]
Author November 7, 2014 15:37 pm

कश्मीर का सच

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया की एक साइट पर पढ़ने को मिला कि सरदार वल्लभभाई पटेल कश्मीर को पाकिस्तान को दे देना चाहते थे, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीरी होने के नाते कश्मीर को भारत के साथ रखना चाहते थे। यह बात पत्रकार कुलदीप नायर की जीवनी से उद्धृत कर पोस्ट की गई थी। अब इस कथन में कितनी सच्चाई है और कितनी मिलावट, यह गहन शोध का विषय है। इन दिनों कश्मीर मीडिया के लिए दुधारू गाय की तरह है। गुमनाम व्यक्ति भी आज की तारीख में अगर कश्मीर पर कुछ सही-गलत लिखेगा-बोलेगा तो तुरंत फोकस में आ जाएगा। किसने कब क्या कहा? क्यों कहा? किन परिस्थितियों में कहा आदि? यह सब जांच-पड़ताल का विषय है। मगर निष्पक्ष जांच-पड़ताल करे कौन? साठ-सत्तर साल पहले की बातों को पूरी प्रामाणिकता के साथ खंगालना आसान काम नहीं है। यह पूछा जा सकता है कि क्या महाराजा हरीसिंह गलत थे, जो उन्होंने भारत के साथ विलय के दस्तावेजों पर सहर्ष हस्ताक्षर किए।

दरअसल, कश्मीर में चुनाव नजदीक आ रहे हैं। किसी न किसी बहाने से कश्मीर के भूत, भविष्य और वर्तमान पर चर्चा तो होगी ही! पुराने मुर्दे भी उखाड़े जाएंगे और नए मसलें भी खंगाले जाएंगे। अंत में होगा वही जो मंजूरे खुदा होगा।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आठ-नौ सौ साल पहले तक कश्मीर एक हिंदू बहुल भूभाग था। इस धरती के पूर्वज (शैव धर्म के अनुयायी) हिंदू थे। बाद में हुए धर्मांतरण ने घाटी में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बना दिया, जबकि असल में कश्मीर में हिंदू बहुसंख्यक थे। उनके कश्मीर प्रेम की बात की अगर अनदेखी भी करें, तो भी पंडित नेहरू के कश्मीर को अपने साथ रखने के निर्णय को गलत कतई नहीं ठहराया जा सकता।

वैसे अपने बाप-दादाओं से मैंने यह भी सुना था कि विभाजन के समय कश्मीर विवाद को निपटाने के लिए एक युक्ति यह सामने आई थी कि कश्मीरी पंडितों को देहरादून में बसाया जाए और कश्मीर पाकिस्तान को दे दिया जाए! यह भी सुना था कि देहरादून में इस काम के लिए भूमि का एक बहुत बड़ा टुकड़ा अवाप्त भी किया गया था! मगर नेहरूजी मन से पंडितों को कश्मीर से निकालने के पक्ष में नहीं थे।

नेहरूजी नहीं चाहते थे कि कश्मीरी पंडित अपनी जन्मभूमि से विलग होकर दूसरी जगह जाकर बसें। उनका यह भी मानना था कि पंडित कश्मीर के मूल बाशिंदे हैं और इनकी समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की वजह से ही भारत कश्मीर पर अपना अधिकार जता सकता है। जानकारों का मानना है कि नेहरूजी संभवत: यहीं पर गलती कर गए। अन्य मसलों में उन्होंने खूब दूरदर्शिता दिखाई। मगर कश्मीर मसले में उनकी ‘भावुकता’ उनकी दूरदर्शिता पर हावी हो गई। सच है, भविष्य के गर्भ में पड़े समय की थाह लेना सब के बस की बात नहीं है।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

संस्कृत भाषा पर चिंतन

आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने वेदों की ओर लौटने का नारा दिया था, ताकि भारत अपनी खोई प्रतिष्ठा पुन: अर्जित कर सके। पर दुर्भाग्य की बात है कि देश के नीति-नियंताओं ने कभी संस्कृत भाषा पर गंभीरता पूर्वक चिंतन नहीं किया। देश में कुल संस्कृत विश्वविद्यालयों की संख्या चौदह है। जिनमें से लालबहादुर शास्त्री केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ और राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल है। शेष राज्यों के अधीन किसी तरह अपने नाम को जिंदा रखने में सफल है। कुल मिला कर संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थिति बेहद चिंताजनक है, बेशक इसके लिए देश के नीति-नियंता विशेष रूप से जिम्मेदार हैं, लेकिन उन अधिकारियों, प्रोफेसरों और अध्यापकों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिनकी अकर्मण्यता की वजह से संस्कृत अपनों के बीच बेगानी हो गई है।

संस्कृत के कर्णधारों को आत्मचिंतन करना चाहिए कि वेदों, उपनिषदों और अन्य ग्रंथों को समस्त ज्ञान का आधार राग के अलापने से भला होने वाला नहीं है। उन्हें इस बात का भी इल्म होना चाहिए कि गणित और विज्ञान को संस्कृत भाषा में प्रतिष्ठित करने वाले मनीषियों ने सिर्फ वेदों की व्याख्या से ही अनमोल आविष्कारों को अंजाम नहीं दिया।

पंडित मदनमोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के माध्यम से आधुनिक विज्ञान को संस्कृत भाषा में पढ़ाने का प्रयास किया था। लेकिन तत्कालीन वाइसराय से अनुमति न मिल पाने के कारण इस प्रस्ताव को स्थगित करना पड़ा। पर क्या आज वही स्थिति है जैसा कि आजादी के पहले मालवीयजी के सामने थी। देश को अपने नीति-नियंताओं से यह सवाल अवश्य पूछना चाहिए कि राष्ट्र कब तक लॉर्ड मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के मोह-फांश में जकड़ा रहेगा।

अफसोस की बात है कि हमारे पूर्वजों ने जिस भाषा के माध्यम से विश्व मानव को सोचने के लिए विवश किया, वह अपने लोगों की अदूरदर्शिता की वजह से चंद लोगों के बीच सिमट गई है। बेशक, रास्ते बड़े कठिन हंै, लेकिन मंगलयान की ऐतिहासिक सफलता ने सिद्ध किया कि हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है।

धर्मेंद्र कुमार दूबे, वाराणसी

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