ताज़ा खबर
 

आस्था की मुसीबत

बीरेंद्र सिंह रावत दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। घर चुनने के बारे में मैंने इस कहावत को अपने भीतर उतार लिया है। 1997 से पहले मैं दिल्ली से सटे एक कस्बे लोनी में रहता था। मेरे घर से लगभग सौ मीटर की दूरी पर एक मंदिर था। घर से करीब चार […]
Author November 7, 2014 15:35 pm

बीरेंद्र सिंह रावत

दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। घर चुनने के बारे में मैंने इस कहावत को अपने भीतर उतार लिया है। 1997 से पहले मैं दिल्ली से सटे एक कस्बे लोनी में रहता था। मेरे घर से लगभग सौ मीटर की दूरी पर एक मंदिर था। घर से करीब चार सौ मीटर दूरी पर एक मस्जिद थी। मंदिर के संचालकों ने एक व्यक्ति को सुबह-शाम लाउडस्पीकर पर ‘रामचरितमानस’ का पाठ करने की जिम्मेदारी दे रखी थी। यह वही व्यक्ति था जिसे अनैतिक काम करने के कारण एक आश्रम से भगाया गया था। दोपहर के बाद औरतों का एक झुंड उसी लाउडस्पीकर पर डेढ़-दो घंटे शोर करता। जब उनके ‘दुनियावी मालिक’ के घर लौटने का समय करीब आता तो वे दुनिया के मालिक से विदा लेतीं! मस्जिद चूंकि दूर था, इसलिए उसकी आवाज से होने वाली परेशानी थोड़ी कम थी।

वहां मेरे जैसे अनेक थे जो मंदिर की हमारे जीवन में ‘आतंकी’ घुसपैठ से त्रस्त थे। एक बार हममें से कुछ ने मंदिर में जाकर संचालकों को लाउडस्पीकर से होने वाली अपनी-अपनी परेशानी बताई। उस समय तो उन लोगों ने हमारी बात सुन ली। लेकिन दोपहर बाद जब औरतों का झुंड ‘शोर’ करने के लिए मंदिर में एकत्रित हुआ तो उन्होंने लाउडस्पीकर पर दबंग आवाज में हम लोगों को धमकाया और मकान बेच कर चले जाने की सलाह दी। फिर भी हमने हिम्मत बटोर कर बातचीत का सिलसिला जारी रखा।

एक दिन एक खास संगठन से जुड़े कुछ लोग मेरे घर आए। वे हमारी आपत्ति से नाराज थे। उन पर धर्म की अतार्किकता का असर इतना ज्यादा था कि वे हमारे संवैधानिक और मानवीय अधिकारों के प्रति पाषाण हो चुके थे। उनमें से एक बार-बार यह कह रहा था कि क्या राम का नाम लेना गुनाह है! तंग आकर मैंने उससे कहा कि वह अपना कान मेरे मुंह के पास लाए और मैं उसके कान में एक हजार बार राम का नाम चिल्लाऊंगा और उसके बाद पूछूंगा कि क्या वह इस तरह से राम का नाम और सुनना चाहता है। लेकिन वे ढीठ थे। शायद इसी तरह के लोग हमें मस्जिद के संचालकों में भी मिलते।

फिलहाल मैं जिस क्वार्टर में रहता हूं, वहां से करीब ढाई सौ मीटर की दूरी पर एक दूसरे से लगे हुए तीन मंदिर और एक गुरद्वारा है। शोर मचाने के मामले में चारों एक दूसरे को मात देने की होड़ में लगे प्रतीत होते हैं। क्या ऐसा संभव है कि दुनिया में अशांति और अस्वास्थ्य फैला कर पूजास्थल खुद को शांति-स्थल के रूप में स्थापित कर सकें? लोकतंत्र में दूसरों की छाती पर चढ़ कर अपनी बात सुनाने के कृत्य को गैरकानूनी माना जाता है। लेकिन ऐसे काम हर गली, कूचे और चौराहे पर हो रहे हैं।

काफी साल पहले कलकत्ता उच्च न्यायलय ने पूजास्थलों में और उनके द्वारा लाउडस्पीकरों के उपयोग की फैलती प्रवृत्ति को नासूर की संज्ञा दी थी। 1999 के एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने पूजास्थलों में लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल को असभ्यता बताया इसके खिलाफ फैसला सुनाया था। संविधान का अनुच्छेद- 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन तीन शर्तों के साथ। उनमें से एक शर्त यह भी है कि कोई भी नागरिक अपनी धार्मिक आस्था का प्रचार किसी नागरिक के स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं कर सकता। लेकिन कानून की फिक्र किसे है? हर साल उत्तर भारत के एक बड़े भाग में कांवड़ लेकर आने वाले अनेक लोग कई गैरकानूनी व्यवहारों का प्रदर्शन सरेआम करते हैं। अपने जायज हकों के लिए कानूनी तरीके से सड़कों पर उतरे नागरिकों को तो पुलिस बलपूर्वक रोक देती है, लेकिन वही पुलिस पूजास्थलों के गैरकानूनी कामों की सुरक्षा करती है। कानून के रखवालों का यह दोहरा चरित्र कैसी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को मजबूत कर रहा है?

(samtamoolakhastakshep.blogspot.in)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग