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फिलहाल रिहाई का हक मिला ‘तंदूर कांड’ के दोषी सुशील शर्मा को

दो दशक पहले राजधानी के बगिया रेस्टोरेंट में अपनी ‘बेवफा’ जीवनसंगिनी नैना साहनी को गोली मार कर, उसके टुकड़े तंदूर में जलाने वाले सुशील शर्मा को लोग आज भी नहीं भूले होंगे।
Author नई दिल्ली | September 16, 2015 09:36 am
नैना साहनी और सुशील शर्मा (फाइल फोटो)

दो दशक पहले राजधानी के बगिया रेस्टोरेंट में अपनी ‘बेवफा’ जीवनसंगिनी नैना साहनी को गोली मार कर, उसके टुकड़े तंदूर में जलाने वाले सुशील शर्मा को लोग आज भी नहीं भूले होंगे। पूरे देश में यह पाशविक घटना तंदूर कांड के नाम से कुख्यात हुई थी। अदालत ने मुजरिम के जघन्य कृत्य को देखते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई थी, जो बाद में उम्रकैद में बदल गई और तब से शर्मा खुली हवा में सांस लेने के लिए हाथ-पैर मार रहा था। उसकी फरियाद पर गौर करने के बाद मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले 20 साल से जेल में बंद पूर्व युवा कांग्रेस नेता शर्मा को पैरोल पर रिहा कर दिया।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि जब तक शर्मा की सजा को कम करने और समय पूर्व रिहाई संबंधी अपील का निपटारा सक्षम प्राधिकार द्वारा नहीं कर लिया जाता, वह जेल से बाहर रहेगा। न्यायाधीश सिद्धार्थ मृदुल ने उसकी रिहाई का आदेश देते हुए कहा कि वह 20 साल से अधिक समय तक जेल में रह चुका है और यह उसके अधिकार का मामला है।

न्यायाधीश ने कहा, ‘दिल्ली सरकार कहती है कि सजा समीक्षा बोर्ड ने पहले ही फैसला कर लिया है और यह मामला विचार और आदेश के लिए सक्षम प्राधिकार के समक्ष है । इसके मद्देनजर, केवल यही काम बचता है कि सक्षम प्राधिकार से जल्द फैसला लेने और अंतत: इसे उचित समय के भीतर जारी करने को कहा जाए। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त सरकारी वकील ने अदालत को सूचित किया कि फैसला लिया जा चुका है और अब उप राज्यपाल को अंतिम आदेश पारित करना है ।

अदालत ने शर्मा को पैरोल पर रिहा करते हुए कहा कि उसके वकील ने इस तथ्य की ओर उसका ध्यान आकर्षित किया है कि दोषी 20 साल से अधिक की सजा भुगत चुका है। अदालत ने कहा, पूर्व के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला शर्मा के वकील के दिए गए बयान की पुष्टि करता है। उसके मद्देनजर, राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह उसकी अपील के लंबित रहने और उस पर सक्षम प्राधिकार का फैसला आने तक याचिकाकर्ता को पैरोल पर रिहा करे।

जज ने यह भी स्पष्ट किया कि शर्मा को पैरोल देते हुए उस पर ‘कोई शर्त’ नहीं थोपी गई है। शर्मा ने यह कहते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था कि वह पहले ही जेल में 20 साल से अधिक काट चुका है और सजा समीक्षा बोर्ड के दिशा-निर्देशों के अनुसार समय पूर्व रिहाई का हकदार है।

अपनी याचिका में शर्मा ने उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार को समय पूर्व रिहाई की उसकी याचिका पर तेजी के साथ विचार करने का निर्देश देने की अपील की थी। अपनी मां की बीमारी को लेकर पैरोल पर रहने के दौरान शर्मा ने यह याचिका दाखिल की थी। वह सात सितंबर को जेल में वापस आ गया था और मंगलवार को हाईकोर्ट के आदेश के बाद उसे जल्द ही जेल से रिहा कर दिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2003 में निचली अदालत द्वारा शर्मा को सुनाई गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था। शीर्ष अदालत से पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 2007 में मौत की सजा को बरकरार रखा था। शीर्ष अदालत ने सजा को आजीवन कारावास मेंं बदलते हुए कहा था कि हत्या ‘निजी संबंधों के तनावपूर्ण’ होने का नतीजा थी और दोषी ‘पुराना अपराधी’ नहीं है जो ‘दस साल मौत की कोठरी में’ गुजार चुका है।

दिल्ली युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शर्मा ने अपने लाइसेंसी रिवाल्वर से 2 जुलाई 1995 को नैना साहनी की गोली मार कर हत्या कर दी थी। दरअसल कत्ल का यह मामला नैना के पराए मर्द से कथित प्रेम संबंध को लेकर था। शर्मा को शक था कि वह युवा कांग्रेस कार्यकर्ता मतलूब करीम से आशिकी कर रही है। हकीकत यह भी थी कि शर्मा अपनी राजनैतिक आकांक्षाओं के कारण नैना से अपने नाते को गुप्त रखे था। संबंधों की तनातनी के बीच घटना वाले दिन सुशील मंदिर मार्ग स्थित उसके घर गया और करीम के साथ उसके प्रेम संबंध पर आगबबूला होने के बाद उसे गोलियों से उड़ा दिया।

अपने अपराध का सबूत मिटाने के लिए शर्मा नैना की लाश को कंबल में लपेट कर अशोक यात्री निवास के बगिया रेस्टोरेंट में गया और एक तंदूर में लाश के टुकड़ों को जलाने की कोशिश की। लेकिन उस रात सिपाही अब्दुल करीम कुंजू और होमगार्ड चंद्रपाल की चौकसी ने उसकी साजिश पर पानी फेर दिया। इस साजिश में शामिल मैनेजर केशव की गिरफ्तारी तो हो गई, लेकिन शर्मा अपने सियासी रसूखों से आस लगाए, छिपता घूमता रहा। पूरे देश में उसकी तलाश में छापे पडेÞ और घटना के एक हफ्ते बाद उसे बंगलुरू में गिरफ्तार किया गया।

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