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सुषमा स्वराज को सौंपी जा सकती है हरियाणा की बागडोर

विवेक सक्सेना नई दिल्ली। हरियाणा में भले ही भाजपा नेतृत्व किसी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश न करे, पर सुषमा स्वराज को वहां सत्ता की बागडोर सौंपी जा सकती है। ऐसा कर संघ और शीर्ष नेतृत्व कई लक्ष्य साधना चाहता है। वैसे भी टिकट वितरण के बाद जिस तरह से पार्टी […]
Author September 23, 2014 09:08 am

विवेक सक्सेना

नई दिल्ली। हरियाणा में भले ही भाजपा नेतृत्व किसी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश न करे, पर सुषमा स्वराज को वहां सत्ता की बागडोर सौंपी जा सकती है। ऐसा कर संघ और शीर्ष नेतृत्व कई लक्ष्य साधना चाहता है। वैसे भी टिकट वितरण के बाद जिस तरह से पार्टी में अनुशासनहीनता देखने को मिली है और बड़ी संख्या में नेताओं के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने के कारण नेतृत्व काफी परेशान है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को लालकृष्ण आडवाणी के खेमे का माना जाता है, जिन्होंने पार्टी पर हावी रहते हुए उन्हें अपने बाद दूसरे नंबर पर घोषित कर दिया था। उन्हें यूपीए सरकार में लोकसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया था। नरेंद्र मोदी के सत्ता और पार्टी पर काबिज हो जाने के बाद आडवाणी गुट का बुरा समय शुरू हो गया है। वे मोदी के घोषित विरोधी रहे हैं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को आधिकारिक रूप से कैबिनेट में नंबर दो घोषित किया जा चुका है। खुद आडवाणी को कैबिनेट में नहीं लिया गया और न ही उन्हें सर्व शक्ति संपन्न संसदीय बोर्ड में रखा गया।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक सुषमा स्वराज को विदेश मंत्री जरूर बना दिया गया है, पर हाल के अपने विदेश दौरों पर प्रधानमंत्री उन्हें अपने साथ नहीं ले गए। अब उन्हें वरिष्ठ नेताओं की सूची से हटाने के लिए हरियाणा सरीखे छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री बनाए जाने पर गंभीरता पूर्वक विचार चल रहा है। यही वजह है कि उनकी बहन वंदना शर्मा को सफीदों से विधानसभा का टिकट दिया गया है ताकि जरूरत पड़ने पर उनसे इस्तीफा दिलवा कर सुषमा को चुनाव लड़वाया जा सके। इससे एक पंथ दो काज वाली कहावत लागू की जा सकेगी।

भाजपा इसलिए भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहती है ताकि वह यह कह सके कि उसने हरियाणा को पहली महिला मुख्यमंत्री दी। जिस तरह से बसपा नेता मायावती ने अरविंद शर्मा को हरियाणा प्रभारी बना कर वहां ब्राह्मण वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है उसके सामने सुषमा को तुरूप के पत्ते के रूप में पेश किया जा सकता है। मालूम हो कि राज्य में जाटों के बाद सबसे ज्यादा दलित हैं। अगर 22 फीसद दलित औरा दस फीसद ब्राह्मण वोट बसपा के साथ आ जाते हैं, तो पूरा राजनीतिक परिदृष्य ही बदल जाएगा।

सुषमा स्वराज की समस्या यह है कि वे मूल रूप से संघ की नहीं हैं। न तो वे जमीन से जुड़ी नेता हैं और न ही हरियाणा में उनका कोई जनाधार है। वे दिल्ली की मुख्यमंत्री बनाई गईं पर विधायक नहीं थीं। उनके मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी का ऐसा सफाया हुआ कि उसके बाद शीला दीक्षित ने लगातार तीन बार सरकार बनाई। कांग्रेस के हारने के बाद भी भाजपा बहुमत हासिल नहीं कर सकी। वे बेल्लारी में सोनिया गांधी से हारीं।
संघ भी उन्हें नापसंद करता है। उन्हें दिल्ली फोर के नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने अपनी राजनीति कांग्रेस (ओ) से शुरू की थी। हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भगवतदयाल शर्मा ने उन्हें पहली बार अंबाला से विधानसभा चुनाव लड़वाया था। उसके बाद वे जनता पार्टी में चली गईं और चंद्रशेखर व जार्ज फर्नांडीज के करीब मानी जाने लगीं। बाद में जब जनता पार्टी टूटी, तो वे भाजपा में आ गईं। वे मूलत: पलवल की निवासी हैं पर उनके जीवन का अधिकांश भाग अंबाला में बीता।

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