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NJAC को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज, जजों की नियुक्ति में नहीं होगा सरकार का कोई रोल

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) को असंवैधानिक घोषित करते हुए इसे खारिज किया है।
Author नई दिल्ली | October 16, 2015 11:45 am
सिब्बल ईटानगर के एक सामुदायिक केन्द्र में 16 दिसंबर को संपन्न विधानसभा के सत्र में कांग्रेस के विद्रोहियों और भाजपा विधायकों द्वारा विधान सभा अध्यक्ष के पद से हटाये गये नबाम रेबिया का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) को असंवैधानिक घोषित करते हुए इसे खारिज किया है। सुप्रीम कोर्ट ने NJAC अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका को एक वृहद पीठ के पास भेजने की केंद्र की अपील खारिज कर दी। शीर्ष कोर्ट ने अपनी टिप्‍पणी में कहा कि हाईकोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रणाली 99वें संविधान संशोधन से पहले से ही संविधान में मौजूद है।

तो वहीं हाईकोर्ट ने NJAC को लाने के लिए 99वें संवैधानिक संशोधन को असंवैधानिक एवं निरस्त घोषित किया। एससी ने हायर जुडिशरी में जजों के अप्वाइंटमेंट के दो दशक से ज्यादा पुराने कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करके उसकी जगह संविधान में 99वां संशोधन करके NJAC को शामिल किया गया था। इसकी वैलिडिटी को चुनौती देती पिटीशन पर सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टीट्यूशनल बेंच ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया।

आपको बता दें कि NJAC अगर लागू होता तो इसमें जजों के अप्वाइंटमेंट में सरकार भी अपनी भूमिका निभाती नजर आती। NJAC में चीफ जस्टिस, सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर मोस्ट जज, केन्द्रीय कानून मंत्री के अलावा दो जानकार लोगों को भी शामिल करने का प्रावधान है। वहीं, पुराने कॉलेजियम सिस्टम में पांच जजों का पैनल यह अप्वाइंटमेंट करता था। कोर्ट के ताजा फैसले के बाद कॉलेजियम सिस्टम फिर से लागू कर दिया है।

हायर जुडिशरी में न्यायाधीशों की नियुक्ति में 20 साल से अधिक पुरानी व्यवस्था समाप्त करके उसके स्थान पर नई व्यवस्था के लिए बने NJAC की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया है।

एससी के इस फैसले से यह साफ हो गया कि जजों की नियुक्ति अब कॉलेजियम सिस्‍टम से ही होगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़े बेंच को भेजने की अर्जी को भी खारिज कर दिया। गौरतलब है कि सरकार ने पिछले साल जजों की नियुक्ति के लिए एनजेएसी का गठन किया था।

इस कानून का 20 राज्य सरकारों ने समर्थन किया है जिन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून और संविधान संशोधन की पुष्टि की है। इस नये कानून में एक प्रावधान 6 सदस्यीय राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग में दो प्रबुद्ध व्यक्तियों को शामिल करने से संबंधित है।

इस आयोग में प्रधान न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश और केन्द्रीय कानून मंत्री को शामिल किया गया है। कानून में प्रावधान है कि दो प्रबुद्ध व्यक्तियों का मनोनयन प्रधान न्यायाधीश, प्रधान मंत्री और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता या प्रतिपक्ष का नेता नहीं होने की स्थिति में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता वाली समिति करेगी।

इस नए कानून को चुनौती देते हुये हाईकोर्ट के एडवोकेट आन रिकार्ड एसोसिएशन और अन्य लोगों ने तर्क दिया था कि न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति के बारे में नया कानून असंवैधानिक है और इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

दूसरी ओर, केन्द्र ने इस नये कानून का बचाव करते हुये कहा था कि दो दशक से अधिक पुरानी न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था में कई खामियां थीं। इस मामले में उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन ने केन्द्र का समर्थन किया।

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  1. R
    R K
    Oct 28, 2015 at 9:29 pm
    सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से देस्वासीओ की स्वतंत्रता बचई रह गए वरना ये राजनीतिघ्त तो सुप्रीमकोर्ट को भी गुलाम बानाना की कोसिस करते है जैसा की इमरजेंसी में केर चुके है
    (1)(0)
    Reply
    1. R
      raj kumar
      Oct 28, 2015 at 10:41 am
      उचतम न्यायालय आज हस्तक्षेप नहीं करेगी तो हमारे देश का कल्याण संभव नहीं लगता है हमारे देश को आगे nahi बढ़ने में आरक्षण का बहुत बड़ा hath है --बुद्धि बिना राज hin wali कहावत यहाँ लागु होती hai
      (1)(0)
      Reply
      सबरंग