June 27, 2017

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‘हिन्दुत्व’ फ़ैसले पर सुप्रीम कोर्ट में उठे कई सवाल, चुनाव में धर्म के इस्तेमाल पर भी बहस

संविधान पीठ ने कहा कि किसी को चुनावों में वोट हासिल करने के लिए ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ और ‘राष्ट्रीय चिन्ह’ के प्रयोग की अनुमति नहीं हो सकती।

Author नई दिल्ली | October 21, 2016 12:28 pm
उच्चतम न्यायालय (File Photo)

उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (20 अक्टूबर) को पूछा कि क्या कोई व्यक्ति सीमा पर मौतों का मुद्दा उठाकर एक विशेष दल के लिए वोट मांग सकता है। यह सवाल उन कई सवालों में शामिल था जो दो दशक पुराने ‘हिन्दुत्व’ संबंधी फैसले पर फिर से गौर करने के लिए सुनवाई के दौरान उठाया गया। जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123 (3) में ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ और ‘राष्ट्रीय चिन्ह’ शब्दों का जिक्र करते हुए प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि किसी को चुनावों में वोट हासिल करने के लिए उनके प्रयोग की अनुमति नहीं हो सकती।

पीठ ने सवाल किया, ‘कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय चिन्ह के आधार पर वोट मांग सकता है और कह सकता है कि लोग सीमा पर मर रहे हैं और इसलिए किसी खास पार्टी के लिए वोट कीजिए। क्या इसे अनुमति दी जा सकती है?’ वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा, ‘यह इस प्रावधान में विशेष रूप से वर्जित है।’ सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संसद ‘अलगाववादी और सांप्रदायिक’ प्रवृत्तियों पर काबू पाने के लिए चुनाव संबंधी कानून में ‘‘भ्रष्ट क्रियाकलाप’’ शब्द के दायरे को जानबूझकर ‘बढ़ाया’ है।

पीठ ने कहा, ‘(जन प्रतिनिधित्व कानून) के वर्तमान उपबंध में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि संसद ने चुनावों के दौरान अलगाववादी और सांप्रदायिक प्रवृत्तियों को काबू पाने के लिए ‘भ्रष्ट क्रियाकलाप’ शब्द के दायरे को बढाने के बारे में सोचा।’ इस पीठ में न्यायूमर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति एसए सोब्दे, न्यायमूर्ति एके गोयल, न्यायूमर्ति यूयू ललित, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव शामिल थे। इसके बाद पीठ ने एक काल्पनिक सवाल उठाया और पूछा कि क्या एक ‘सिख ग्रंथी’ किसी खास हिन्दू उम्मीदवार के लिए वोट मांग सकता है, क्या यह कहा जा सकता है कि यह अपील संबंधित प्रावधान से उलझती है।

दीवान ने जवाब दिया कि कानून के इस प्रावधान के तहत संभवत: यह ‘भ्रष्ट क्रियाकलाप’ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि प्रावधान में प्रयुक्त ‘उनका धर्म’ शब्द से मतलब उम्मीदवार के धर्म से है, वोट मांगने वाले धार्मिक नेता के धर्म से नहीं। अदालत इस कानून की धारा 123 (3) के ‘दायरे’ की जांच कर रही है जो ‘भ्रष्ट क्रियाकलापों’ वाली चुनावी गतिविधियों सहित अन्य से संबंधित है। इस बीच, तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं तीस्ता सीतलवाड़, शामसुल इस्लाम और दिलीप मंडल ने ‘‘राजनीति से धर्म को अलग करने’’ की मांग को लेकर वर्तमान सुनवाई में हस्तक्षेप के लिए आवेदन दायर किया।

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First Published on October 21, 2016 11:58 am

  1. B
    bajrang
    Oct 21, 2016 at 9:26 am
    केंडिडेट कुछ भी कहकर वोट मांगे क्या फरक पड़ता हे- भारतीय वोटर को होशियार बनाइये -जबतक वोटर होशियार नहीं बनेगा -समस्या का समाधान अशम्भव हे-
    Reply
    1. S
      Shrikant Sharma
      Oct 21, 2016 at 7:29 am
      बहुत ही चोट सवाल है भारत के संविधान मेंfree एंड fair इलेक्शन के द्वारा सर्कार बनाने की बात है कहीं भी सेक्युलर जातिवादी वोट बैंक राजनीती करके सर्कार बनाने की बात नहीं है.१९४७ में भी जो बंटवारा हुआ था उसमें freeअंदड़ फेयर इलेक्शन्स से हिनू मुस्लिम हिन्दुस्थान पाकिस्तान में सरकारें बनाने की बात है बताओसँविधान बनाने के लिए जितनी लंबी लंबी गर्भित तार्किक बहस और बैठकें चली उसमें कही भी जाती या धर्म या भहराष्ट जयलाइथ तमिल सरकारों के ज़िक्र नहीं हैं,फिर भी जाती या धर्म की बल परजीते संसद मर्डरकरते hain
      Reply
      सबरंग