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पार्टियों को आरटीआइ के दायरे में लाने के लिए नोटिस, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब

उच्चतम न्यायालय ने सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत लाने के लिए ‘सार्वजनिक प्राधिकार’ घोषित करने की मांग संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार...
उच्चतम न्यायालय ने सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत लाने के लिए ‘सार्वजनिक प्राधिकार’ घोषित करने की मांग संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और भाजपा एवं कांग्रेस सहित छह पार्टियों से जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत लाने के लिए ‘सार्वजनिक प्राधिकार’ घोषित करने की मांग संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और भाजपा एवं कांग्रेस सहित छह पार्टियों से जवाब मांगा है। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एचएल दत्तू, न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अमिताव रॉय के खंडपीठ ने मंगलवार को कहा-नोटिस जारी किया जाता है।

गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म’ (एडीआर) ने सर्वोच्च अदालत से मांग की है कि राजनीतिक दलों से कहा जाए कि वे सभी चंदों के बारे में सूचना दें जिसमें 20 हजार रुपए से कम राशि का चंदा भी शामिल हो। एडीआर की ओर से उपस्थित वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी है कि राजनीतिक दल सार्वजनिक प्राधिकार हैं और ऐसे में वे आरटीआई कानून के प्रति उत्तरदायी हैं।

केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने विस्तृत आदेश में कहा था कि राजनीतिक दल सार्वजनिक प्राधिकार हैं और ऐसे में उन्हें सूचना के अधिकार के कानून तहत सूचना देनी चाहिए। वकील ने कहा कि राजनीतिक दलों को चंदे पर आयकर नहीं देना पड़ता और इसके अलावा 20 हजार रुपए से कम के चंदे का कानून के तहत खुलासा भी नहीं करना पड़ता। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल विधायिका और विधि निर्माण प्रक्रिया पर भी नियंत्रण करते हैं। इससे पहले गैर सरकारी संगठन एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की थी।

उसने दावा किया था कि राजनीतिक दलों को चंदों के रूप में व कारपोरेट, ट्रस्ट और व्यक्तियों से भारी-भरकम रकम मिलती है। हालांकि वे ऐसे चंदों के स्रोत के बारे में पूरी सूचना का खुलासा नहीं करते हैं। अपनी याचिका में एडीआर ने देश की सबसे बड़ी अदालत से आग्रह किया था कि वह सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के लिए अपनी आय के बारे में विस्तृत जानकारी का खुलासा करने को अनिवार्य बनाए। उसने चंदे और धन प्राप्ति का संपूर्ण विवरण घोषित करने की भी मांग की है।

शीर्ष अदालत ने गैर सरकारी संगठन और आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल की याचिका पर कांग्रेस और भाजपा के साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), माकर्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (एम) और बहुजन समाज पार्टी को भी नोटिस जारी किए हैं। केंद्रीय सूचना आयोग ने जून 2013 में व्यवस्था दी थी कि सूचना के अधिकार कानून की धारा 2 (एच) के तहत राजनीतिक दल सार्वजनिक प्राधिकार हैं और इसलिए उन्हें इस कानून के तहत सूचना उपलब्ध करानी चाहिए।

इस संगठन और अग्रवाल ने इस आदेश पर अमल नहीं होने का आरोप लगाते हुए फिर केंद्रीय सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया था। याचिका के अनुसार केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा कि उसका पहले का आदेश ही अंतिम और बाध्यकारी है। आयोग ने इस मामले में अपनी विवशता जाहिर की थी क्योंकि राजनीतिक दलों ने उसके समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया था।

* केंद्रीय सूचना आयोग ने जून 2013 में व्यवस्था दी थी कि सूचना के अधिकार कानून की धारा 2 (एच) के तहत राजनीतिक दल सार्वजनिक प्राधिकार हैं और इसलिए उन्हें इस कानून के तहत सूचना उपलब्ध करानी चाहिए।

* गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म’ (एडीआर) ने सर्वोच्च अदालत से मांग की है कि राजनीतिक दलों से कहा जाए कि वे सभी चंदों के बारे में सूचना दें जिसमें 20 हजार रुपए से कम राशि का चंदा भी शामिल हो।

* शीर्ष अदालत ने गैर सरकारी संगठन और आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल की याचिका पर कांग्रेस और भाजपा के साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), माकर्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (एम) और बहुजन समाज पार्टी को भी नोटिस जारी किए हैं।

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