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सुप्रीम कोर्ट में 2016: सरकार-कोर्ट की खींचतान और मोदी सरकार पर दबाव छाया रहा पूरे साल

सरकार को विमुद्रीकरण के मामले में ही न्यायालय की फटकार नहीं सुननी पड़ी बल्कि अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के मामले में भी शर्मसार होना पड़ा।
Author नई दिल्ली | December 26, 2016 20:57 pm
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

उच्चतम न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच बढ़ती खींचतान और कोलोजियम की कार्यशैली 2016 के दौरान उच्चतम न्यायालय में छायी रही जहां अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने के मामले में मोदी सरकार को जबर्दस्त शर्मिंदगी का सामना करना पडा। देश में पांच सौ और एक हजार रुपए के नोटों को अमान्य घोषित करने की प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा के बाद यह मुद्दा लगातार शीर्ष अदालत पहुंचता रहा जिसकी वजह से सरकार की सांसे अटकी रहीं। न्यायालय ने इस मामले की लगभग हर सुनवाई पर इस निर्णय से जनता को हो रही परेशानियों के लिये सरकार को आड़े हाथ लिया और उससे कुछ असहज करने वाले सवाल भी पूछे। न्यायालय ने हालांकि विमुद्रीकरण के फैसले में किसी प्रकार की छेड़छाड़ से इंकार कर दिया लेकिन इसे लेकर दायर कई याचिकाओं को बाद में उसने सारे मामले को सुविचारित निर्णय के लिये संविधान पीठ को सौंप दिया।

सरकार को विमुद्रीकरण के मामले में ही न्यायालय की फटकार नहीं सुननी पड़ी बल्कि अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के मामले में भी शर्मसार होना पड़ा। हालांकि इस दौरान उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच वाकयुद्ध चलता रहा और दोनों ही एक दूसरे पर ‘लक्ष्मणरेखा’ लांघने का आरोप लगाते रहे। न्यायपालिका और भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार के बीच तलवारें तो पिछले साल ही उस समय खिंच गयी थीं जब संविधान पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून निरस्त कर दिया था। यह खींचतन इस साल उस समय और बढ गयी जब शीर्ष अदालत ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला न्यायिक पक्ष की ओर से उठाने की धमकी दी परंतु बाद में उसने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुये न्यायपालिका का काम ठप करने के लिये केन्द्र को जिम्मेदार ठहराया।

बीसीसीआई को साल का अंत होते होते उस समय बडा झटका लगा जब उसके अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ही शीर्ष अदालत की फटकार के दायरे में आ गये। न्यायालय ने उन पर गलत हलफिया बयान देने के आरोप में अवमानना की कार्यवाही करने की चेतावनी देते हुये आगाह किया कि न्यायिक प्रशासन में दखल देने के कारण उन्हें जेल भी हो सकती है। जनहित याचिकाओं पर विचार करना न्यायालय के लिये पूरे साल एक चुनौती रही और यह उस समय अधिक गंभीर हो गयी जब गैर सरकारी संगठन कामन काज के वकील प्रशांत भूषण ने दो व्यावसायिक घरानों से रिश्वत लेने के आरोप में प्रधानमंत्री का नाम घसीटने का प्रयास किया। इन घरानों पर आयकर विभाग ने 2012-13 में छापे मारे थे। इस मामले में कोई राहत नहीं मिलते देख अंतत: भूषण ने मनोनीत प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर को इस याचिका की सुनवाई से अलग होने का अनुरोध किया। न्यायमूर्ति खेहर ने ‘बगैर किसी ठोस सामग्री’ के याचिका दायर करने पर उनसे सवाल किये थे।

मोदी सरकार को लोकपाल की नियुक्ति में विलंब और केन्द्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक की नियुक्ति जैसे मामलों में भी न्यायालय में असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। यही नहीं, सरकार ने भारत के सांविधानिक इतिहास में पहली बार मुस्लिम समाज में तीन तलाक देने, निकाह हलाला और बहुपत्नी प्रथा का विरोध किया और इन मुद्दों पर शीर्ष अदालत में लिंग समानता तथा पंथनिरपेक्षता के आधार पर गौर करने की हिमायत की। हालांकि मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया। इस साल के दौरान न्यायालय में स्व जे जयललिता, कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, भाजपा नेता सुब्रमणियन स्वामी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जैसी राजनीतिक हस्तियां के मामले भी चर्चा में रहे। अमित शाह उन लोगों में शामिल थे जिन्हें शीर्ष अदालत से उस समय राहत मिली जब न्यायालय ने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड मामले में उन्हें पाक साफ करार देने का बंबई उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। न्यायालय ने इस मामले में पहले अपील और फिर पुनर्विचार याचिका तथा सुधारात्मक याचिका भी खारिज कर दी।

न्यायालय ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड मामले में निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट देने के साथ ही उच्च न्यायालय की कुछ टिप्पणियों को रिकार्ड से निकाला परंतु उसने निचली अदालत की आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 2016 में शीर्ष अदालत में उस समय बडी सफलता मिली जब न्यायालय ने टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना के लिये पूर्ववर्ती वाममोर्चा सरकार द्वारा सिंगूर में 1053 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को गैरकानूनी और अवैध करार दे दिया। शीर्ष अदालत ने अनेक राजनीतिक हस्तियों को किसी न किसी तरह प्रभावित करने वाले मानहानि के मामले में 156 साल पुराने दंडात्मक प्रावधानों की संवैधानिकता बहाल रखने के साथ ही राहुल गांधी, सुब्रमणियन स्वामी और केजरीवाल की उन दलीलों को भी ठुकराया कि दूसरों के बोलने के अधिकार के आधार पर किसी की प्रतिष्ठा को धूलधूसरित नहीं किया जा सकता।

इसी दौरान संविधान पीठ ने जहां सतुलुज यमुना संपर्क नहर मामले में राष्ट्रपति द्वारा भेजे गये सवालों पर अपनी राय देते हुये पडोसी राज्यों के साथ जल समझौता रद्द करने संबंधी पंजाब समझौता निरस्तीकरण कानून 2004 को एकतरफा करार दिया तो दूसरी ओर कावेरी जल विवाद भी उसके समक्ष किसी न किसी रूप में मौजूद रहा। इसी तरह, शीर्ष अदालत का रुख देखते हुये बुंबई स्थित हाजी अली दरगाह के ट्रस्ट ने इस दरगाह के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने का निश्चय किया। इससे केरल में ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में भी हिन्दू महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिलने की उम्मीद जगी। इस मंदिर में राजस्वला महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

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