December 10, 2016

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नोटबंदी पर हाई कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र ने की थी अपील

केंद्र की याचिका में ऐसे सभी मामलों को शीर्ष अदालत या किसी एक हाई कोर्ट में स्थानांतरित किए जाने की अपील की गई थी।

Author नई दिल्ली | November 24, 2016 02:56 am
पुराने हजार के नोट।

सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न हाई कोर्टों में नोटबंदी के संबंध में लंबित कार्यवाही पर स्थगनादेश जारी करने की केंद्र की अपील को बुधवार को यह कहते हुए नामंजूर कर दिया कि हो सकता है कि जनता उनसे त्वरित राहत चाहती हो। इसके साथ ही अदालत ने नोटबंदी को चुनौती देते हुए देश के विभिन्न हाई कोर्टों में याचिकाएं दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं से इस संबंध में दर्ज केंद्र की याचिका पर जवाब मांगा। केंद्र की याचिका में ऐसे सभी मामलों को शीर्ष अदालत या किसी एक हाई कोर्ट में स्थानांतरित किए जाने की अपील की गई थी।  प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अगुआई वाले तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि हम इसे रोकना नहीं चाहते हैं। विभिन्न मुद्दे हैं। लोगों को हाई कोर्ट से तत्काल राहत मिल सकती है। पीठ के दूसरे जजों डीवाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव ने अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी से यह बात कही। सुनवाई के दौरान पीठ ने रोहतगी से कहा- हमें लगता है कि आपने जरूर कुछ उचित कदम उठाए होंगे। अब क्या स्थिति है? आपने अभी तक कितनी रकम एकत्र की है। इसके जवाब में रोहतगी ने कहा कि स्थिति काफी बेहतर है व नोटबंदी के बाद से छह लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि अभी तक बैंकों में जमा हुई है। धन के डिजीटल लेनदेन में काफी उछाल आया है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी का फैसला 70 सालों से जमा खराब के धन को हटाने के मकसद से लिया गया और सरकार हालात की हर रोज और हर घंटे निगरानी कर रही है। सरकार ने एक समिति गठित की है जो नोटबंदी के कदम पर देशभर में जमीनी हालात का जायजा लेगी।

रोहतगी ने पीठ को बताया कि सामान्य नियम यह है कि बाजार में नकदी का लेनदेन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के चार फीसद से अधिक नहीं होना चाहिए लेकिन भारत में यह 12 फीसद है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के फैसले को चुनौती देते हुए देशभर में विभिन्न हाई कोर्टों में विभिन्न याचिकाएं दाखिल की गई हैं और ये सभी मामले शीर्ष अदालत या किसी एक हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिए जाने चाहिए। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए दो दिसंबर की तारीख तय कर दी और याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे उस समय केंद्र की स्थानांतरण की अपील पर अपने जवाब दाखिल करें। शीर्ष अदालत ने 18 नवंबर को बैंकों और डाकघरों के बाहर लंबी कतारों को गंभीर मुद्दा बताते हुए केंद्र की उस याचिका पर अपनी आपत्ति जताई थी जिसमें यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि आठ नवंबर की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर देश में कोई अन्य अदालत विचार नहीं करे। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर और अनिल आर दवे के पीठ ने संबंधित पक्षों से सभी आंकड़ों और दूसरे बिंदुओं के बारे में लिखित में सामग्री तैयार करने का निर्देश देते हुए कहा था कि यह गंभीर विषय है जिस पर विचार की आवश्यकता है। पीठ ने कहा था कि कुछ उपाय करने की जरूरत है। देखिए जनता किस तरह की समस्याओं से रूबरू हो रही है। लोगों को हाई कोर्ट जाना ही पड़ेगा। यदि हम हाई कोर्ट जाने का उनका विकल्प बंद कर देंगे तो हमें समस्या की गंभीरता का कैसे पता चलेगा।

पीठ ने ये टिप्पणियां उस वक्त कीं जब अटार्नी जनरल ने कहा कि पांच सौ और एक हजार रुपए के नोटों के विमुद्रीकरण को चुनौती देने वाले किसी भी मामले पर सिर्फ देश की शीर्ष अदालत को ही विचार करना चाहिए। अदालत में चार जनहित याचिकाओं में से दो दिल्ली के वकीलों विवेक नारायण शर्मा और संगम लाल पाण्डे ने दायर की हैं जबकि दो अन्य याचिकाएं एस मुथुकुमार और आदिल अल्वी ने दायर की हैं। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि सरकार के अचानक लिए गए इस फैसले ने अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है और आम जनता को परेशानी हो रही है। याचिकाओं में वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की अधिसूचना को निरस्त करने या कुछ समय के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में 500 और 1000 रुपए के नोटों को नौ नवंबर से चलन से बाहर करने की घोषणा की थी।

 

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First Published on November 24, 2016 2:56 am

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