December 09, 2016

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मतदाता का मौलिक अधिकार है उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता जानना : सुप्रीम कोर्ट

नामांकन पत्र अस्वीकार होने का आधार बन सकती है कोई भी गलत घोषणा।

Author नई दिल्ली | November 2, 2016 04:24 am
मतपेटी।

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि चुनाव में उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के बारे में जानकारी प्राप्त करना मतदाताओं का मौलिक अधिकार है और इस संबंध में कोई भी गलत घोषणा नामांकन पत्र अस्वीकार करने का आधार बन सकती है।  न्यायमूर्ति एआर दवे और और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव के एक पीठ ने एक फैसले में व्यवस्था दी कि उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता के बारे में जानना प्रत्एक मतदाता का मौलिक अधिकार है। जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों और फार्म 26 में भी यह स्पष्ट है कि यह उम्मीदवार का कर्तव्य है कि वह अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में सही जानकारी प्रदान करे।

शीर्ष अदालत ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि चुनाव में दो उम्मीदवार हैं और यह सिद्ध हो गया कि विजयी उम्मीदवार का नामांकन पत्र गलत तरीके से स्वीकार किया गया है तो चुनाव हारने वाले उम्मीदवार के लिए ऐसा साक्ष्य पेश करने की जरूरत नहीं है कि चुनाव वास्तव में प्रभावित हुआ है। अदालत ने मणिपुर हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ मैरेम्बम पृथ्वीराज उर्फ पृथ्वीराज सिंह और पुखरेम शरतचंद्र सिंह की एक दूसरे के खिलाफ दायर अपील पर यह व्यवस्था दी।
हाई कोर्ट ने मणिपुर में 2012 में मोयरंग विधान सभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार शरतचंद्र सिंह के खिलाफ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले पृथ्वीराज का निर्वाचन निरस्त घोषित कर दिया था। इस मामले में आरोप लगाया गया था कि पृथ्वीराज ने अपने नामांकन पत्र में कहा था कि वे एमबीए हैं। जो गलत पाया गया था।

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जजों ने हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि अपीलकर्ता ने मैसूर विश्वविद्यालय में एमबीए की पढ़ाई नहीं की थी और यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह मानवीय त्रुटि थी। पीठ ने कहा कि यह चूक एक बार नहीं हुई है। 2008 से ही अपीलकर्ता यह वक्तव्य दे रहा था कि उसके पास एमबीए की डिग्री है और फार्म 26 के साथ दाखिल हलफनामे में की गई घोषणा गलत मानी जाएगी। अदालत ने इस कानूनी पहलू पर भी विस्तार से गौर किया कि क्या यह दलील देना और साबित करना जरूरी है कि विजयी उम्मीदवार का नामांकन पत्र अनुचित तरीके से स्वीकार किए जाने की वजह से चुनाव का नतीजा वास्तव में प्रभावित हुआ और वह भी ऐसी स्थिति में जबकि मैदान में सिर्फ दो ही उम्मीदवार रहे हों।

अदालत ने हाई कोर्ट द्वारा इस्तेमाल किए गए विवेकाधिकार के किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए चुनाव हारने वाले उम्मीदवार का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया कि अब उसे चुनाव में विजयी घोषित किया जाए क्योंकि चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार का निर्वाचन निरस्त घोषित किया जा चुका है।

 

 

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First Published on November 2, 2016 4:24 am

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