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अनब्याही मां हो सकती है बच्चे की संरक्षक

एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पिता की मंजूरी के बिना एक अविवाहित मां अपने बच्चे की एकमात्र कानूनी अभिभावक हो सकती है। न्यायाधीश विक्रमजीत सेन, और अभय...
Author July 7, 2015 09:21 am
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘एक सरोकार नहीं रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है नाबालिग बच्चे का कल्याण।’

एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पिता की मंजूरी के बिना एक अविवाहित मां अपने बच्चे की एकमात्र कानूनी अभिभावक हो सकती है। न्यायाधीश विक्रमजीत सेन, और अभय एम सपे्र के एक पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि जब भी एक एकल अभिभावक या अविवाहित मां अपने बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करे, यह अवश्य जारी किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने एक अविवाहित मां की मदद करते हुए निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह अपना पहले का आदेश वापस ले और इस महिला को बच्चे का अभिभावक घोषित करने के लिए दायर याचिका पर पिता को नोटिस जारी किए बगैर ही नए सिरे से उस पर फैसला करे। यह ईसाई महिला अपने बच्चे के अभिभावक के तौर पर बच्चे के जैविक पिता का नाम नहीं चाहती है। मां का कहना है कि उसने इस व्यक्ति से कभी शादी नहीं की और उसे यह तक नहीं मालूम कि उसका कोई बच्चा है।

न्यायमूर्ति सेन और न्यायमूर्ति सप्रे ने दुनिया भर के अनेक दीवानी और दूसरे न्यायाधिकार क्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा कि ‘एक सरोकार नहीं रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण नाबालिग बच्चे का कल्याण है। न्यायालय ने मां की याचिका स्वीकार करते हुए प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि एकल अभिभावक व अविवाहित मां को सिर्फ एक हलफनामा पेश किए जाने पर बच्चे का जन्मप्रमाण पत्र जारी किया जाए।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘हम निर्देश देते हैं कि अगर एकल अभिभावक या अविवाहित मां अपनी कोख से जन्मे बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन करती है तो संबंधित अधिकारी उससे इस संबंध में सिर्फ एक हलफनामा ले सकते हैं और इसके बाद जन्म प्रमाणपत्र जारी कर सकते हैं, बशर्ते अदालत का अन्यथा कोई निर्देश नहीं हो।’

न्यायालय ने कहा कि हालांकि यह घिसा-पिटा है, लेकिन इसके बावजूद हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सरकार की यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि किसी भी नागरिक को सिर्फ इसलिए किसी प्रकार की असुविधा नहीं हो कि माता-पिता जन्म के बारे में पंजीकरण कराने में विफल रहे या उन्होंने लापरवाही बरती। यह सरकार का कर्तव्य है कि प्रत्येक नागरिक के जन्म का पंजीकरण करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।

न्यायालय ने अविवाहित मां की याचिका पर यह फैसला सुनाया। अविवाहित मां अपने सारे निवेशों सहित सभी मामलों में अपने बच्चे को नामित करना चाहती थी। निचली अदालत और हाई कोर्ट ने उसे अभिभावक बनाने का अनुरोध अस्वीकार करते हुए कहा था कि एकल मां संबंधी उसके दावे पर बच्चे के पिता को नोटिस जारी करने के बाद ही फैसला किया जा सकता है क्योंकि विवाह नहीं होने के बाद भी हो सकता है कि बच्चे के संरक्षण और उसके कल्याण में उसकी भी दिलचस्पी हो।

न्यायाधीशों ने दुनिया के विभिन्न देशों में प्रचलित कानूनी दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा कि मां ही अपने बच्चे की देखभाल के लिए सबसे उपयुक्त है और हिंदी में प्रचलित शब्द ‘ममता’ इसके भाव को व्यापक रूप से व्यक्त करता है। न्यायालय ने कहा कि मौजूदा मामले की तरह के प्रकरण, जहां पिता ने अपनी संतान के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है, उसे कानूनी मान्यता देना एक निरर्थक कवायद होगी।

न्यायालय ने कहा कि आज के समाज में, जहां महिलाएं अपने बच्चे का अकेले ही लालन-पालन करने का निर्णय करती हैं, हमें अनिच्छुक या लापरवाह पिता को थोपने की कोई वजह नजर नहीं आती है। हमें ऐसा लगता है कि एक व्यक्ति जो अपने कर्तव्यों ओर जिम्मेदारियों का त्याग करने का निर्णय करता है, वह बच्चे की भलाई का आवश्यक हिस्सा नहीं है।

फैसले में कहा गया है कि मां का इस बात पर जोर देना कि पिता को सार्वजनिक रूप से अधिसूचित नहीं किया जाए, हमें अनुचित नहीं लगता है। न्यायालय ने कहा कि यह नहीं समझना चाहिए कि हमने बच्चे के संरक्षण की मांग कर रही जीवन संगिनी के एकतरफा अनुरोध को स्वीकार करने का प्रयास किया है। हमने बच्चे द्वारा अपने माता-पिता की पहचान जानने के अधिकार को ध्यान में रखा है। इस अधिकार की रक्षा के लिए हमने अपीलकर्ता से पूछताछ की है और उसे अपने बेटे को पिता के नाम से अवगत कराने की आवश्यकता के बारे में भी बताया। उसने कुछ विवरण के साथ उसका नाम हमें बताया और कहा कि उसे उनके बारे में इससे अधिक जानकारी नहीं है। ये तथ्य एक लिफाफे में सीलबंद कर दिए गए हैं जिन्हें इस न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद ही पढ़ा जा सकता है।

(एजंसियां)

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