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छात्रों की आत्महत्या : कोचिंग संस्थाओं पर लगाम कसने के लिए कानून की मांग

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, कोचिंंग संस्थाओं का सालाना राजस्व 24 हजार करोड़ रुपए है। कोटा में 21 छात्रों की आत्महत्या की रिपोर्ट आई थी और इस वर्ष भी अब तक आधा दर्जन छात्र आत्महत्या कर चुके हैं।
Author नई दिल्ली | May 13, 2016 01:31 am
संसद में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। (फाइल फोटो)

देश में प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा से लेकर तकनीकी शिक्षा पद्धति के विरोधाभास एवं दुविधा की स्थिति के बीच बेहतर कल की आस में कोचिंग संस्थाओं के जंजाल में फंसे छात्रों द्वारा आत्महत्या का सिलसिला बदस्तूर जारी है। ऐसे में कोचिंग संस्थानों के नियमन के लिए केंद्रीय कानून बनाने की मांग तेज हो गई है। देश में कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण के लिए कोई बहुत स्पष्ट और बाध्यकारी कानून भी नहीं हैं। इस विषय के संपूर्ण आयाम पर विचार करते हुए पिछले वर्ष नवंबर में आइआइटी रूड़की के प्रो. अशोक मिश्रा के नेतृत्व वाली विशेषज्ञ समिति ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ऑल इंडिया काउंसिल फॉर कोचिंग फार इंट्रेंस एक्जाम गठित किए जाने का सुझाव दिया था जो फीस का नियमन करने के साथ कोचिंग के संबंध में श्रेष्ठ पहल और स्वस्थ माहौल सुनिश्चित करने का काम करे। कोटा में पिछले कुछ वर्षों में छात्रों की आत्महत्याओं के विषय को देखते हुए शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। संसद सत्र के दौरान लोकसभा में कई सदस्यों ने कोटा समेत देश की कोचिंग संस्थाओं में छात्रों की समस्याओं को उठाया है।

भाजपा सांसद सुमेधा नंद सरस्वती ने कहा कि शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी पाना या दिलाना नहीं है। शिक्षा का संबंध व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास से होता है। ऐसे में न तो माता-पिता को अपने बच्चों पर अपनी आकांक्षा थोपनी चाहिए और न ही दुनियावी प्रतिस्पर्धा का दबाव डालना चाहिए। बच्चों को कोचिंग संस्थाओं के जाल से भी बचाने की जरूरत है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, कोचिंंग संस्थाओं का सालाना राजस्व 24 हजार करोड़ रुपए है। कोटा में 21 छात्रों की आत्महत्या की रिपोर्ट आई थी और इस वर्ष भी अब तक आधा दर्जन छात्र आत्महत्या कर चुके हैं।

शिक्षाविद एन श्रीनिवासन का कहना है कि कोटा से पहले दक्षिण भारत प्रतियोगिता परीक्षाओं का एकमात्र गढ़ था। वहां से भी आत्महत्याओं की खबरें आती थीं। समय के साथ आज राजस्थान स्थित कोटा इंजीनियरिंग, मेडिकल प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी का गढ़ बन गया है। इन संस्थानों का हाल यह है कि इन्हें बेहतर परीक्षा परिणाम लाने पर ही ढेर सारे छात्र मिलते हैं और इसके लिए ये अच्छे से अच्छे अध्यापकों को मोटा वेतन देकर ले आते हैं। ऐसे में छात्रों पर अनावश्यक दबाव रहता है।
छात्रों का कहना है कि अध्यापक कक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले छात्रों को न सिर्फ आगे की बेंचों पर बैठा कर उन पर ज्यादा ध्यान देते हैं बल्कि औसत दर्जे के छात्रों को धिक्कारते और ज्यादा मेहनत करने का दबाव बनाते हैं या फिर उनका बैच ही बदल देते हैं। कोटा के कोचिंग संचालक इस स्थिति के लिए अभिभावकों को दोषी ठहराते हैं। लेकिन इन पाटों के बीच पिसता मासूम छात्र ही है।

अध्यापकों पर ज्यादा से ज्यादा छात्रों को सफल बनाने का दबाव रहता है और इसके लिए वे हर तरह के उपाय अपनाते हैं। कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण के लिए कोई बहुत स्पष्ट और बाध्यकारी कानून भी नहीं हैं। शिक्षाविदों समेत विभिन्न वर्गों ने कोचिंग संस्थाओं पर नियमन के लिए केंद्रीय कानून बनाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ईसी अग्रवाल ने कहा कि देश में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा पद्धति में विरोधाभास और दुविधा की स्थिति है। नतीजतन इससे उबरने के अब तक जितने भी उपाए सोचे गए, वे शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण पर सिमटते दिखे। उन्होंने कहा कि देश में शिक्षा में सुधार लाने के लिए समय-समय पर कई समितियां और आयोग बने, इनकी रिपोर्टें भी आई लेकिन इन पर अमल होता नहीं दिखा। इन्हीं दुष्चक्रों में फंसी हमारी शिक्षा पद्धति का रुख छात्रों की आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहा है।

आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को संज्ञान लेते हुए कोटा के जिला प्रशासन ने 12 सूत्री दिशा-निर्देश जारी कर कहा कि सभी संस्थान करियर काउंसलर, मनोचिकित्सक तथा फिजियोलॉजिस्ट नियुक्त करें, छात्र व उनके मां-बाप की भी काउंसलिंग की जाए, प्रवेश के लिए स्क्रीनिंग प्रक्रिया अपनाई जाए, कक्षा में छात्रों की संख्या कम की जाए तथा एक बैच से दूसरे बैच में किसी छात्र के स्थानांतरण की भी समीक्षा की जाए। साप्ताहिक छुट्टी, योगाभ्यास, कक्षा से अक्सर गायब रहने वाले छात्रों की चिकित्सा जांच, मनोरंजन तथा फीस को एकमुश्त करने के बजाय किस्तों में लेने की व्यवस्था की जाए।

कोटा में दुखद घटना से व्यथित होकर कोटा जिले के कलेक्टर रवि कुमार सुरपुर ने कोचिंग संस्थान में पढ़ने वाले डेढ़ लाख से अधिक छात्रों के अभिभावकों को संबोधित करते हुए हाल ही में भावुक होकर पांच पृष्ठों का एक पत्र लिखा था और उनसे अनुरोध किया है कि वे अपने बच्चों पर जबरन अपनी अपेक्षाएं नहीं थोपें। उन्होंने लिखा, ‘उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए डराने धमकाने की बजाय आपके सांत्वना के बोल और नतीजों को भूल कर बेहतर करने के लिए प्रेरित करना, उनकी कीमती जानें बच सकता है।’ रवि कुमार सुरपुर ने लिखा, ‘क्या माता-पिता को बच्चों की तरह अपरिपक्वता दिखानी चाहिए? ऐसा नहीं होना चाहिए। अपनी अपेक्षाओं और सपनों को जबरन अपने बच्चों पर नहीं थोपें, बल्कि वे जो करना चाहते हैं, जिसे करने के वे काबिल हैं उन्हें वही करने दें।’

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