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30 साल पुराने हथियार से कमांडो को करनी पड़ी सर्जिकल स्‍ट्राइक, 11 हजार पैराशूट और एम्‍युनिशन की भी कमी

नियंत्रण रेखा पारकर पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर में सात आतंकी लॉन्‍च पैड को तबाह करने वाले स्‍पेशल फोर्सेज के कमांडो ने यह कार्रवाई पुराने हथियारों के साथ की। उनके हथियार अब तक बदल जाने चाहिए थे।
Author नई दिल्ली | October 11, 2016 08:22 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

नियंत्रण रेखा पारकर पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर में सात आतंकी लॉन्‍च पैड को तबाह करने वाले स्‍पेशल फोर्सेज के कमांडो ने यह कार्रवाई पुराने हथियारों के साथ की। उनके हथियार अब तक बदल जाने चाहिए थे। इस संबंध में जून 2015 में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने निर्देश दे दिए थे। लेकिन खरीद प्रक्रिया में देरी के चलते पैरा कमांडो को पुराने हथियारों से ही 28-29 सितंबर की रात को आतंकी ठिकानों पर हमला बोलना पड़ा। नए हथियारों के लिए कुल खर्च लगभग 180 करोड़ रुपये के आसपास है। यह हाल तो तब है जब पर्रिकर ने हथियारों के आधुनिकीकरण को फास्‍ट ट्रेक करने का निर्देश दे रखा है। अधिकारियों के अनुसार, पिछले साल जून में म्‍यांमार में 21 स्‍पेशल फोर्सेज बटालियन के सीमारेखा पारकर ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद पर्रिकर के सामने आधुनिकीकरण का प्रस्‍ताव सेना ने रखा था। म्‍यांमार में सेना ने मणिपुर में 18 जवानों के शहीद होने के बाद संदिग्‍ध एनएससीएन-के के ठिकानों पर हमला किया था।

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एक सैन्‍य अफसर ने बताया कि यदि म्‍यांमार जैसा ऑपरेशन आगे भी करना है तो स्‍पेशल फोर्सेज के लिए कुछ हथियारों को फौरन खरीदने का विचार था। यदि इस प्‍लान पर काम किया गया होता तो सर्जिकल स्‍ट्राइक करने वाले 4 एसएफ और 9 एसएफ के जवान ज्‍यादा आधुनिक और लाइटवेट रॉकेट लॉन्‍चर इस्‍तेमाल करते। इसके बजाय उन्‍होंने इस ऑपरेशन में 30 साल पुराने कार्ल गुस्‍तोव 84 एमएम वर्जन से काम चलाना पड़ा। स्‍पेशल फोर्सेज के आधुनिकीकरण का प्रस्‍ताव मिलिट्री ऑपरेशंस निदेशालय ने तैयार किया था।

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इसके तहत छह तरह के हथियार शामिल थे। इनमें 1200 पर्सनल ऑटोमटिक राइफल, 36 स्‍नाइपर राइफल, 36 ऑटोमैटिक जनरल पर्पज मशीन गन(जीपीएमजी), 24 लाइटवेट रॉकेट लॉन्‍चर, 24 शॉटगन और 500 पिस्‍तौल शामिल थीं। ये सभी हथियार दिन और रात दोनों में देखने की सुविधा से लैस होने थे।

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एक अधिकारी ने बताया, ”हमारी किसी एसएफ बटालियन के पास जीपीएमजी नहीं है। या तो हम एमएमजी(मीडियम मशीन गन) या पीका गन इस्‍तेमाल कर रहे हैं। टेवर राइफल जो हमारे पास है वह 5.56 एमएम की है जबकि आतंक विरोधी ऑपरेशन में 7.62 एमएम वाला हथियार चाहिए। हमारे पास ट्रेनिंग के लिए एम्‍युनिशन भी सीमित होता है। साथ ही अंडर वाटर डाइविंग सामान और फ्री फाल पैराशूट की भी कमी है। उदाहरण के लिए हमें 12 हजार फ्री फाल पैराशूट चाहिए लेकिन हैं केवल 400 ही है और इनका भी समय पूरा होने वाला है। ऑर्डिनेंस फैक्‍ट्री इन्‍हें नहीं बना सकती इसलिए एक दर्जन पैराशूट सेना कमांडर के स्‍पेशल पावर्स फंड से खरीदे गए।” अधिकारियों के अनुसार नई रक्षा खरीद नीति के बाद रक्षा मंत्रालय ने प्रस्‍ताव पर काम करने का फैसला लिया लेकिन सेना की ओर से कार्रवाई अभी तक शुरू नहीं हुई है।

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First Published on October 11, 2016 8:21 am

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