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गीता से हुई थी शव की पहचान, कश्मीर में 24 की उम्र में शहीद हुए थे पहले परमवीर चक्र विजेता

मेजर सोमनाथ शर्मा जयंती: मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी में 50 जवान थे वहीं पाकिस्तानी मेजर के नेतृत्व वाले कबायली हमालवरों की संख्या करीब एक हजार थी।
देश के पहले परम वीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा।

भारत के पहले परम वीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को कांगड़ा जिले में हुआ था। मेजर शर्मा ने महज 24 साल की उम्र में तीन नवंबर 1947 को “बड़गाम की लड़ाई” में जिस बहादुरी से पाकिस्तानी सैनिकों और कबायली घुसपैठियों का मुकाबला किया उसका एहतराम करते हुए 26 जनवरी 1950 को उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र प्रदान किया गया। आजादी के बाद से अब तक केवल 22 सैनिकों को परम वीर चक्र मिला है। आइए आपको बताते हैं किस तरह हाथ में प्लास्टर लगे होने के बावजूद मेजर सोमनाथ शर्मा युद्ध में शामिल हुए अपनी बहादुरी से दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए।

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। देश की सैकड़ों रियासतों ने भारत में विलय स्वीकार कर लिया। जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी में विलय का प्रस्ताव नहीं स्वीकार किया। पाकिस्तान चाहता था कि वो स्थानीय लोगों के विद्रोह की आड़ में जम्मू-कश्मीर पर कब्जा कर ले। 22 अक्टूबर 1947 से पाकिस्तानी सेना ने अपने सैनिकों और पाकिस्तानी कबायली लड़ाकों को कश्मीर में भेजना शुरू कर दिया। इस घुसपैठ से निपटने में जब जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह विफल रहे तो उन्होंने भारत से मदद मांगी। भारतीय सेना की पहली टुकड़ी जम्मू-कश्मीर में 27 अक्टूबर 1947 को पहुंची।

कबायली हमले के समय 4 कुमाऊं बटालियन के मेजर सोमनाथ शर्मा का दाहिना हाथ एक हॉकी मैच में फ्रैक्चर था। हाथ में प्लास्टर लगे होने के बावजूद वो जिद करके मोर्चे पर गए। मेजर शर्मा और उनकी टीम को हवाई मार्ग से 31 अक्टूबर को श्रीनगर एयरफील्ड पर उतारा गया। मेजर शर्मा के नेतृत्व में 4 कुमाऊं की ए और डी कंपनी को इलाके की पैट्रोलिंग का काम सौंपा गया ताकि वो घुसपैठियों को टोह लेकर उन्हें श्रीनगर एयरफील्ड की तरफ बढ़ने से रोक सकें। घुसपैठिए श्रीनगर एयरफील्ड पर कब्जा करके भारतीय सेना की रसद और सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति बंद कर देना चाहते थे।

somnath sharma memorial, somnath sharma श्रीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित परम वीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा का स्मारक। (Express Photo)

तीन नवंबर को सेना की एक अन्य टुकडी इलाके का मुआयना करके श्रीनगर एयरफील्ड पर लौट चुकी थी। मेजर शर्मा की टुकड़ी को भी वापस आने का आदेश मिला लेकिन उन्होंने शाम तक वहीं रुकने का विचार किया। दूसरी तरफ सीमा पर एक पाकिस्तानी मेजर के नेतृत्व में कबायली समूह छोटे-छोटे गुटों में इकट्ठा हो रहे थे ताकि भारतीय गश्ती दलों को उनका सुराग न मिल सके। भारतीय टुकड़ी को वापस जाते देख कबायली हमलावरों ने हमला करने की ठानी। दोपहर दो बजे तक सीमा पर पाकिस्तानी मेजर के नेतृत्व में करीब 700 लड़ाके इकट्ठा हो चुके थे। दोपहर में ढाई बजे बड़गाम गांव से मेजर सोमनाथ के पोस्ट पर गोलियां चलायी गयी। मेजर शर्मा इस झांसे में नहीं आए। वो समझ गए कि गांव से चली गोलियां केवल उनका ध्यान भटकाने के लिए थीं, असल हमला दूसरी तरफ से होगा। वैसा ही हुआ।

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मेजर शर्मा और उनके साथियों ने पांच-छह घंटे तक हमलावरों को आगे नहीं बढ़ने दिया। जब तक भारतीय सेना की मदद वहां पहुंचती तब तक मेजर शर्मा, सुबेदार प्रेम सिंह मेहता के अलावा 20 अन्य जवान शहीद हो चुके थे। मेजर शर्मा के शहीद होने के बाद भी उनकी टुकड़ी के जवान हमलावरों को रोके रहे। भारतीय जवानों ने 200 से ज्यादा हमलावरों को मार गिराया था। मेजर शर्मा जब एक खंदक में एक जवान की बंदूक में गोली भरने में मदद कर रहे थे तभी उन पर एक मोर्टार का गोला आकर गिरा। विस्फोट में उनका शरीर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका था। मेजर शर्मा हमेशा अपनी जेब में गीता रखते थे। जेब में पड़ी गीता और उनके पिस्टल की खोल से उनके शव की पहचान की गयी। मेजर सोमनाथ शर्मा के पिता अमरनाथ शर्मा भारतीय सेना के मेडिकल कॉर्प में थे। उन्होंने मेजर सोमनाथ शर्मा की जगह परम वीर चक्र स्वीकार किया।

चेतन आनन्द के धारावाहिक परम वीर चक्र में मेजर सोमनाथ शर्मा की जीवनी-

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