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श्यामा प्रसाद मुखर्जी जयंती: पाकिस्तान के संग समझौते के विरोध में दिया था मंत्री पद से इस्तीफा

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के बारे में कहा था कि "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेगा।"
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 1901 में बंगाल के प्रतिष्ठित परिवार मे हुआ था। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी विद्वान थे। (तस्वीर- बीजेपी डॉट आर्ग)

आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती (छह जुलाई) पर भारतीय जनता पार्टी के कई शीर्ष नेताओं ने उन्हें नमन किया है।  मुखर्जी का जन्म छह जुलाई 1901 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी हाई कोर्ट के जज और शिक्षाविद् थे। आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय  के वाइस-चांसल भी रहे थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी बाद में इसी विश्वविद्यालय के वाइस-चांसल बने। भारतीय जनता पार्टी खुद को भारतीय जनसंघ का उत्तराधिकारी मानी जाती है। 1951 में जनसंघ की स्थापना डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। 1977  में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया। 1980 में जनसंघ के धड़े ने जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। जनसंघ की स्थापना से पहले मुखर्जी हिंदू महासभा के सदस्य थे लेकिन बाद में वो उससे अलग हो गये।

आजादी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया। मुखर्जी को उद्योग और आपूर्ति मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया। अप्रैल 1950 में मुखर्जी ने नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दोनों देशों के अल्पसंख्यकों को लेकर हुए नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इस समझौते के तहत शरणार्थियों की लूटी हुई संपत्ति वापस करने और जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने पर दोनों देश सहमत हुए थे। इस समझौते के बाद करीब 10 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से पश्चिम बंगाल आए। माना जाता है कि मुखर्जी वैचारिक मतभेद पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले शुरुआती नेताओं में एक हैं।

मुखर्जी ने इस्तीफा देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से कहा था कि पाकिस्तान के संग ये समझौता सफल नहीं हो सकेगा। मुखर्जी कश्मीर को लेकर भी काफी मुखर थे। उस समय कश्मीर के राज्य प्रमुख को मुख्यमंत्री न कहकर प्रधानमंत्री कहा जाता था। उन्होंने कश्मीर के बारे में कहा था, “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेगा।” मुखर्जी कश्मीर में जाने के लिए तब भारतीय नागरिकों को पहचान पत्र दिखाने की व्यवस्था के मुखर विरोधी थे। उन्होंने पांच मई को “कश्मीर दिवस” मनाने की घोषणा की।

मुखर्जी आठ मई 1953 को दिल्ली से कश्मीर के लिए निकले। 11 मई को वो कश्मीर पहुंचे। मुखर्जी को उनके साथियों के संग हिरासत में लेकर और श्रीनगर में रखा गया। हिरासत में ही उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। उनकी सेहत को लेकर रहस्यमयी परिस्थितियां बनी रहीं। 23 जून 1953 को उनकी मौत हो गयी। मुखर्जी की मौत के बाद भारतीयों नागरिकों के कश्मीर में प्रवेश के लिए पहचान पत्र दिखाने का कानून खत्म हो गया लेकिन जम्मू-कश्मीर का मुद्दा अभी भी कमोबेश उसी स्थिति में बना हुआ है।

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