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शरद पवार ने कहा- बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस के पास बाकी पार्टियों से गठबंधन के अलावा कोई विकल्‍प नहीं

पवार ने लिखा है, मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के रूप में उभरने का काम चुनौतीपूर्ण दिख रहा है।
एनसीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार ने कहा कि संप्रग सरकार के दिनों के मुकाबले कांग्रेस अब कमजोर हो गयी है। उसके पास भाजपा की विशाल चुनावी जीत को रोकने के लिए क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। वरिष्ठ नेता ने अपनी आत्मकथा ‘अपनी शर्तों पर: जमीनी हकीकत से सत्ता के गलियारों तक’ में यह बात कही जो ‘आॅन माई टर्म्स: फ्रोम द ग्रासरूट टू द कोरिडोर्स आॅफ पावर’ का हिंदी अनुवाद है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद समेत कई विपक्षी नेताओं की मौजूदगी में इसका विमोचन किया गया। पवार ने लिखा है, मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के रूप में उभरने का काम चुनौतीपूर्ण दिख रहा है। कांग्रेस के पास भाजपा की बढ़त को रोकने के लिए छोटी और क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है।

उन्होंने कहा कि ऐसा गठबंधन करने के लिए कांग्रेस को गठबंधन के सहयोगी दलों पर भरोसा जताना होगा जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती राजग सरकार ने दिखाया था। प्रभावशाली मराठा नेता ने कहा, मनमोहन सिंह ने एक दशक लंबे संप्रग सरकार के दौरान ऐसी क्षमता दिखायी थी लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि संप्रग के दिनों के मुकाबले कांग्रेस आज कमजोर है। पवार की टिप्पणियां कुछ विपक्षी नेताओं के विचारों से मिलती है। जदयू और वाम दलों समेत कुछ विपक्षी नेताओं ने भाजपा को रोकने के लिए विपक्षी एकता का आह्वान किया था। पवार ने कहा कि सिर्फ भाजपा और कांग्रेस ही ऐसे दो दल हैं जिनकी अखिल भारतीय स्तर पर मौजूदगी है लेकिन उन्होंने कहा कि इनकी राजनीति व्यक्तिवाद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के इर्द गिर्द घूमती है।

इस पुस्तक में उन्होंने गठबंधन की राजनीति, कांग्रेस के भीतर लोकतंत्र के क्षरण, कृषि और उद्योग की स्थिति और भावी भारत के लिए सामाजिक समरसता तथा उदार दृष्टिकोण की अहमियत पर अपने विचार प्रकट किए हैं। पुस्तक में वे देश पर आए संकट के कुछ क्षणों पर भी हमें दुर्लभ जानकारी देते चलते हैं, जिनमें आपातकाल और देश की क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय राजनीति पर उसके प्रभाव, 1991 में चंद्रशेखर सरकार का पतन, राजीव गांधी और एच.एस. लोंगोवाल के बीच हुआ पंजाब समझौता, बाबरी मस्जिद ध्वंस; 1993 के मुम्बई दंगे, लातूर का भूकम्प, एनरॉन विद्युत परियोजना विवाद और सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद न लेने का फैसला आदि निर्णायक महत्व के मुद्दे शामिल हैं।

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