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सुप्रीम कोर्ट ने मानहानि पर दंडात्मक कानून को बताया वैध, कहा-अभिव्यक्ति की आजादी मुकम्मल अधिकार नहीं

जस्टिस दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत की खंडपीठ ने कहा, 'हमने माना है कि दंडात्मक प्रावधान संवैधानिक रूप से वैध हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार कोई असीम अधिकार नहीं है।'
Author नई दिल्ली | May 14, 2016 01:43 am
सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया है कि वे मानहानि की निजी शिकायतों पर सम्मन जारी करने पर अत्यंत सतर्कता बरतें।

उच्चतम न्यायालय ने मानहानि से जुड़े 156 साल पुराने दंडात्मक कानून की संवैधानिक वैधता कोशुक्रवार (13 मई) को बरकरार रखा और कहा कि किसी के आजादी से बोलने के अधिकार की कीमत पर किसी दूसरे की साख को सूली पर नहीं चढ़ने दिया जा सकता। न्यायालय ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी एवं अन्य की तरफ से दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया जिसमें उपनिवेश कालखंड वाले दंडनीय प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने की मांग की गयी है। इन सभी को अब अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि के मामलों का सामना करना होगा।

आईपीसी की धाराओं 499 और 500 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए अदालत ने कहा कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार पूरी तरह अटल है लेकिन संपूर्ण नहीं है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत की पीठ ने कहा कि बोलने की आजादी और प्रतिष्ठा के अधिकार, इन दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा और ‘किसी के स्वतंत्रता से बोलने के अधिकार की कीमत पर दूसरे की साख को सूली पर नहीं चढ़ने दिया जा सकता।’ अदालत ने 27 याचिकाओं पर यह फैसला दिया जिनमें राहुल, केजरीवाल और स्वामी की अर्जिंया भी हैं। फैसले में कहा गया है कि वे मजिस्ट्रेटी अदलतों द्वारा जारी सम्मनों को चुनौती देने के लिए आठ सप्ताह के अंदर विभिन्न उच्च न्यायालयों के दरवाजे खटखटा सकते हैं जिस दौरान उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक और अंतरिम संरक्षण प्रभावी रहेगा।

मानहानि से संबंधित दो दंडनीय प्रावधानों और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 199 का विश्लेषण करने वाली शीर्ष अदालत ने इन दलीलों पर सहमति नहीं जताई कि मानहानि को अपराध की श्रेणी में रखने से संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला होता है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि मानहानि के अपराध की अपनी गंभीरता है, इसलिए मजिस्ट्रेटों को सम्मन जारी करने में अत्यधिक सावधानी बरतनी होगी। पीठ ने कहा, ‘जैसा कि हम प्रावधानों को संवैधानिक घोषित कर रहे हैं तो हम यह भी कह रहे हैं कि याचिकाकर्ता सम्मन जारी किये जाने को उच्च न्यायालय में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 या सीआरपीसी की धारा 482 के तहत चुनौती दे सकते हैं, जैसी कि सलाह दी गयी है और वे उचित राहत मांग सकते हैं। उपरोक्त उद्देश्य के लिए हम याचिकाकर्ताओं को आठ सप्ताह का समय देते हैं।’

पीठ ने यह भी साफ किया कि अगर इनमें से किसी ने पहले ही उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और इस अदालत में भी असफल रहे हैं तो उन्हें मुकदमे का सामना करना होगा और कानून के अनुसार अपना बचाव पेश करना होगा। स्वामी पर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ कथित तौर पर कुछ टिप्पणियों को लेकर राज्य सरकार ने तीन मानहानि के मामले दर्ज कराए हैं, वहीं राहुल पर महाराष्ट्र के भिवंडी में कथित तौर पर संघ को महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराने वाला बयान देने पर मामला दर्ज कराया गया।

केजरीवाल पर मानहानि के कई मामले चल रहे हैं जिनमें से चार में आपराधिक कार्यवाही स्थगित है। उनके खिलाफ ये मामले केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं अरच्च्ण जेटली, नितिन गडकरी, कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के बेटे अमित सिब्बल और अन्य लोगों ने दर्ज कराए हैं। खचाखच भरी अदालत में 268 पृष्ठ के फैसले की घोषणा के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने आपराधिक कार्यवाही पर रोक पर 19 जुलाई तक आठ सप्ताह के विस्तार की मांग की। तब मामला निचली अदालत में सुनवाई के लिए आएगा।

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