May 22, 2017

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नए गणवेश में संघ : हाशिये से सत्ता की हनक तक

1962 के युद्ध में सरकार और समाज के काम में अपने सक्रिय योगदान के कारण नेहरु को भी इसकी सराहना करनी पड़ी। संघ को 1963 में 26 जनवरी की परेड के लिए आमंत्रित किया गया।

Author नई दिल्ली | October 12, 2016 02:20 am
राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ(आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत। (Photo:ANI)

विजयदशमी के दिन संघ का स्थापना दिवस है। लेकिन 91 साल का संघ और उसके स्वयंसेवक इस बार ज्यादा जवां नजर आ रहे थे। 2014 में भाजपा की अगुआई में राजग सरकार बनने के साथ ही इस सांस्कृतिक संस्था का राजनीतिक कद भी बढ़ गया और इसी के साथ शुरू हुई थी इसे नए रूप में ढालने की कवायद। मंगलवार को स्थापना दिवस से जुड़े समारोहों में संघ के कार्यकर्ताओं ने खाकी निक्करों को अलविदा कह गहरे भूरे रंग की चुस्त पतलून के साथ कदमताल किया।

संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। अंग्रेजों के जमाने में बने इस हिंदूवादी संगठन की वर्दी पर ब्रितानी पुलिस की वर्दी का प्रभाव रहा, और ढीली निक्कर आज तक चली आ रही थी। आधुनिक समय में निक्कर को लेकर स्वयंसेवक असुविधा का सामना करने के साथ हास-परिहास का भी पात्र बनते थे। खासकर युवा इससे हिचकते थे। संघ से नए युवाओं को जोड़ने के लिए गणवेश में बदलाव पर पहली बार 2009 में विचार किया गया था। वहीं 2015 में इस पर नए सिरे से विचार हुआ और मंगलवार को स्वयंसेवक नए रूप में दिखे।
संघ के संचार विभाग के प्रमुख मनमोहन वैद्य ने संघ के नए गणवेश पर कहा, ‘विभिन्न मुद्दों पर संघ के साथ मिलकर काम करने के लिए समाज पहले से ज्यादा तैयार हुआ है। ऐसे में काम के दौरान कार्यकर्ताओं की सुविधा और आराम को देखते हुए गणवेश में बदलाव किया गया है। यह बदलाव बदलते वक्त के साथ कदमताल करने के लिए किया गया है’। उन्होंने बताया कि ऐसी आठ लाख पतलूनें देश के विभिन्न हिस्सों के संघ कार्यालयों में भेजी गई हैं। इनमेंं दो लाख सिली हुई तैयार पतलूनें हैं जबकि दो लाख पतलूनों के कपड़े हैं।

इस विजयदशमी को पतलून के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 91 साल का हो गया। देश में साठ दशकों तक कांग्रेस प्रभाव वाले शासनकाल में यह संगठन कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक खामोशी से काम करता रहा है। अपनी स्थापना के समय से ही उग्र हिंदुत्ववाद के ठप्पे के कारण नेहरुवादी विचाराधारा के शासनकाल में यह उपेक्षित रहा। हालांकि 1962 के युद्ध में सरकार और समाज के काम में अपने सक्रिय योगदान के कारण नेहरु को भी इसकी सराहना करनी पड़ी। सरकारी कार्यों में मदद के कारण पहली बार ‘स्वयंसेवकों’ को 1963 में 26 जनवरी की परेड के लिए आमंत्रित किया गया। संघ अपनी विभिन्न शाखाओं के जरिए जमीनी स्तर पर दशकों से काम कर रहा है। 1955 में इसने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम और मुसलिम राष्ट्रीय मंच के जरिए यह समाज निर्माण में राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाता रहा है।  2014 में भाजपा की अगुआई में राजग की सरकार बनने के बाद आरोप है कि ‘सरकार का संघचालक’ आरएसएस ही है, जिसपर दोनों पक्षों की कभी हां कभी ना वाली स्थिति होती है। लेकिन शिक्षा से लेकर संस्कृति तक में इसकी नीतियों को सरकार उदारता से जगह दे रही है। तो 91 की उम्र में जवां संघ का यह स्वर्णिमकाल है।

 

’खाकी निक्कर की जगह भूरे रंग की चुस्त पतलून
’सफेद रंग की कमीज और काली टोपी
’लट्ठ भी गणवेश का हिस्सा होगा
सर्दी के दिनों में भूरे रंग का स्वेटर

स्वयंसेवक और वर्दी
’1925 में विजयदशमी को हुई थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
’इसके दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संस्थान होने का दावा किया जाता रहा है
’1930 में खाकी टोपी को काली टोपी में बदला था
’1940 में खाकी कमीज सफेद हुई थी
’1973 में जूतों का डिजाइन बदला था
’2011 में चमड़े की बेल्ट को कहा ना

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First Published on October 12, 2016 2:20 am

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