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खुलासा: सरकारी वकील रोहिणी सालियन पर सत्ता का दबाव, हिंदू चरमपंथियों का रखें खयाल

मालेगांव में सात साल पहले हुए बम धमाकों से जुड़े मामलों में विशेष सरकारी अभियोजक रोहिणी सालियन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनका कहना है कि इस धमाके में शामिल अभियुक्तों के प्रति नरम रुख रखने के लिए उन पर लगातार दबाव डाला जा रहा है।
Author June 25, 2015 15:26 pm
वकील रोहिणी सालियन, 2008 में हुआ मालेगांव विस्फोट

मालेगांव में सात साल पहले हुए बम धमाकों से जुड़े मामलों में विशेष सरकारी अभियोजक रोहिणी सालियन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनका कहना है कि इस धमाके में शामिल अभियुक्तों के प्रति नरम रुख रखने के लिए उन पर लगातार दबाव डाला जा रहा है। यह दबाव राष्ट्रीय जांच एजंसी (एनआइए) की ओर से डाला जा रहा है।

2008 में रमजान के दौरान एक इबादतगाह के बाहर हुए विस्फोट में चार मुसलमान मारे गए थे। पहले शक था कि मुसलिम उग्रवादियों ने यह धमाका किया होगा। लेकिन बाद में खुलासा हुआ कि इस कांड में कुछ हिंदू चरमपंथी शामिल थे।

68 वर्षीय वकील रोहिणी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नई सरकार आने के बाद पिछले एक साल से उन पर एनआइए की ओर से लगातार दबाव है कि हिंदू मुलजिमों के खिलाफ नरमी रखी जाए। उन्होंने बताया कि पिछले साल राजग की सरकार केंद्र में आने के बाद एनआइए के एक अधिकारी ने उन्हें फोन किया और कहा कि वह उनसे बातचीत करना चाहता है। वह फोन पर बातचीत नहीं करना चाहता था। वह आया और उनसे कहा कि उनके लिए यह संदेश है कि वे (वकील) नरम रवैया अख्तियार कर लें।


दरअसल यह मामला इस महीने 12 जून को सामने आया जब सत्र न्यायालय में इस मामले की नियमित सुनवाई शुरू हुई। रोहिणी का कहना है कि उसी अफसर ने बताया कि ‘ऊपर बैठे लोग’ नहीं चाहते कि वे इस मामले में महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हों और इस मामले में कोई और वकील सरकार की ओर से पक्ष रखेगा।

रोहिणी सालियान प्रख्यात वकील हैं जिन्होंने कई चर्चित मामलों मे पैरवी की है। जेजे गोलीकांड, बोरीवली दोहरा हत्याकांड, भरत शाह और मुंबई धमाकों जैसे मामलों में भी वे वकील रह चुकी हैं। उन्होंने कहा कि एनआइए अधिकारी की ओर से संकेत यही था कि हमें अनुकूल या फायदेमंद आदेश की दरकार नहीं है। यानी वे अभियुक्तों को संदेह का लाभ देने वाली दलीलें चाहते थे। भले ही यह समाज के खिलाफ जाएं।

रोहिणी ने कहा कि वे चाहती हैं कि एनआइए आधिकारिक तौर पर उन्हें इस मामले से अलग कर दे। इस मामले में उन्हें 2008 को अभियोजक नियुक्त किया गया था। उन्होंने कहा कि इस केस से अलग होने क ी सूरत में वे अन्य मामले देखने के लिए स्वतंत्र हैं। जरूरत पड़ी तो एनआइए के खिलाफ भी मामला ले सकती हूं।

29 सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए विस्फोट में चार लोग मारे गए थे और 79 लोग जख्मी हुए थे। उस दौरान गुजरात के मोदासा में हुए एक धमाके में एक व्यक्ति मारा गया था। । शुरुआत में इस धमाके में मुसलमानों का हाथ बताया गया था। लेकिन महाराष्ट्र एटीएस के हेमंत करकरे की जांच के बाद पता चला कि यह कांड हिंदू चरम पंथियों ने किया था। 23 अक्तूबर, 2030 को इसकी खबर सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस ने छापी थी।

जांच के बाद खुलासा हुआ था कि कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने धमाकों की साजिश रची थी। इस मामले में 12 लोग गिरफ्तार हुए थे जिनमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित भी थे। इन बारह लोगों में चार जमानत पर हैं। यह जांच बाद में एनआइए को सौंपी गई (इसका गठन 26 /11 के मुंबई हमलों के बाद किया गया था और हेमंत करकरे भी इसमें शहीद हुए थे)। एनआइए की जांच के बाद और धमाकों के खुलासे हुए जिनमें हिंदू चरमपंथियों का हाथ था। मालेगांव धमाके (2006), अजमेर बम कांड और हैदराबाद के मक्का मस्जिद बम कांड में इन लोगों का हाथ बताया गया।

रोहिणी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब कहा है कि मामला विशेष अदालत में चलना चाहिए और इसे देखने के लिए विशेष न्यायाधीश हो। 15 अप्रैल को आला अदालत ने अपने एक फैसले में कहा थाकि मालेगांव के अभियुक्तों पर मकोका के तहत मुकदमा नहीं चल सकता, क्योंकि उस तिथि तक उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं थे। इस फैसले ने अभियुक्तों की जमानत की राह आसान की। अदालत ने आगे कहा कि वाद अदालत जमानत की याचिका पर फैसला उसकी पात्रता के आधार पर करें। मामले में मकोका की प्रासंगिकता को देखे बिना यह निर्णय एक माह के भीतर किया जाए।

रोहिणी का कहना है कि बदले हुए हालात के बीच अब यह अभियुक्तों पर निर्भर है कि वे जमानत के लिए एक बार फिर अपील करें।

सरकारी अभियोजक ने बताया कि 12 जून को जब इस मामले की फिर नियमित सुनवाई शुरू हुई, एक दिन पहले उसी एनआइए अधिकारी ने (जो पहले वकील रोहिणी के पास आया था) उनसे मिलकर कहा कि ऊपर से आदेश हैं…अब आपकी जगह कोई और वकील अदालत में सुनवाई के दौरान पेश होगा। रोहिणी के अनुसार, उन्होंने अधिकारी से कहा कि उन्हें यही उम्मीद थी, अच्छा है यह आपने बता दिया, इसलिए मेरा हिसाब कर दीजिए…मैंने उनसे यह भी कहा कि वे मुझे आधिकारिक रूप से कार्यमुक्त करें, ताकि मैं अन्य मामलों में एनआइए के खिलाफ अदालत में पेश हो सकूं…।

उन्होंने यह संदेश ऊपर तक जरूर दे दिया होगा। मुझे उनकी कार्रवाईका इंतजार है। लेकिन तब से उनकी ओर से मुझे कोई संदेश नहीं दिया गया है।

रोहिणी का कहना है कि सरकार की ओर से जो संदेश दिया गया, उसका एकही मतलब था कि हमें अनूकूल फैसला नहीं चाहिए। प्रतिकूल फैसले की दरकार है, जो कि इस समाज के लिएखिलाफ जाता है।

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  1. B.l. Shrivastava
    Jun 25, 2015 at 8:26 pm
    भगवा आतंक वाद भगवा सरकार तो न्याय पलिका को भगवा बनाना ़उचित नही आतंक वाद इंसानियत का दुश्मन होता है जिसे सिर्फ आम मध्यम वर्गीय और गरीब को भोगना होगा सरकार संविधान का मान रखेगी तो न्याय अन्यथा
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    Reply
    1. उर्मिला.अशोक.शहा
      Jun 25, 2015 at 5:35 pm
      वन्दे मातरम- क्या यह संभव नहीं है की मोदी सरकार ने वकील महोदया का हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के लिए चयन नहीं किया इसिलए यह पैतरा अपनाया गया हो? वकील महोदया के पास कोई लिखित सबूत नहीं है इनकी बातोंका विश्वास कैसे किया जय? जा ग ते र हो
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      1. G
        girish
        Jun 25, 2015 at 10:06 am
        ये हिन्दू muslim विवाद मैं हिन्दुओ का paksh लेंगे ब्राह्मण दलित मैं ब्राह्मण का आमिर garib मैं आमिर का यही है inka rastravad
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