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दो बाघों को बचाने का लाभ मंगल ग्रह पर जाने से कहीं ज्यादा

विज्ञानियों ने छह टाइगर रिजर्व का अध्ययन किया और अनुमान लगाया कि उनका संरक्षण करना 230 अरब डॉलर की राशि को सुरक्षित रखने के समान है।
Author नई दिल्ली | July 17, 2017 01:14 am
दुनियाभर के आधे से अधिक बाघ भारत में हैं।

बाघों और मंगलयान की तुलना करना भले ही अजीब लगता हो लेकिन एक नया जैव आर्थिक विश्लेषण बेहद दिलचस्प आंकड़े पेश करता है जिसके अनुसार, दो बाघों को बचाने से होने वाला लाभ मंगल ग्रह पर जाने की भारत की बहुचर्चित पहली कोशिश पर आने वाली लागत की तुलना में कहीं ज्यादा है। भारतीय आस्ट्रेलियाई विज्ञानियों के एक दल ने अनूठे विश्लेषण में एक दस्तावेज प्रकाशित किया है । इसका शीर्षक ‘मेकिंग द हिडन विजिबल : इकोनॉमिक वैल्यूएशन आॅफ टाइगर रिजर्व इन इंडिया’ है और यह ‘इकोसिस्टम सर्विसेज’ जर्नल में छपा है। विज्ञानियों ने छह टाइगर रिजर्व का अध्ययन किया और अनुमान लगाया कि उनका संरक्षण करना 230 अरब डॉलर की राशि को सुरक्षित रखने के समान है। इस राशि को वैज्ञानिकों ने इन टाइगर रिजर्व के लिए ‘स्टॉक बेनिफिट्स’ कहा है। भारतीय आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों के 11 सदस्यीय दल बाकी पेज 8 पर का कहना है कि जैव विविधता से जुड़ी पारिस्थितिकी संबंधी सेवाओं का आर्थिक महत्व संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है और जैव विविधता से होने वाले लाभ नीति निर्माताओं का भी ध्यान आकृष्ट करेंगे।

भोपाल स्थित भारतीय वन प्रबंधन संस्थान की प्रोफेसर मधु वर्मा ने कहा ‘इस महत्व को नजरअंदाज करने से निवेश एवं कोष आवंटन संबंधी फैसलों सहित जन नीतियों पर असर पड़ता है जिससे उनकी सुरक्षा पर असर पड़ सकता है और मानव कल्याण की राह में भी बाधा आ सकती है। भारत में छह टाइगर रिजर्व की पारिस्थितिकी संबंधी सेवाओं के आर्थिक मूल्यांकन के माध्यम से हम बताते हैं कि इन टाइगर रिजर्व्स में निवेश में वृद्धि आर्थिक रूप से तर्कसंगत हैं।’ वैज्ञानिक दल ने छह टाइगर रिजर्व्स से देश को होने वाले आर्थिक लाभों का विश्लेषण किया। इसे प्रत्येक बाघ के संरक्षण से सालाना हुए लाभ के ब्याज के तौर पर देखा जा सकता है। इन छह टाइगर रिजर्व्स के रखरखाव पर सालाना खर्च केवल 23 करोड़ रुपये हुआ।

आर्थिक विश्लेषण बताता है कि प्रत्येक बाघ को बचाने के लिए किए गए निवेश पर लाभ इसका 356 गुना अधिक है। कोई भी उद्योग या सेवा इस तरह का उच्च प्रतिफल नहीं दे सकता। प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व प्रमुख और नई दिल्ली स्थित ग्लोबल टाइगर फोरम के वर्तमान महासचिव राजेश गोपाल कहते हैं ‘परंपरागत अर्थशास्त्री हरित गणना के इस नए तरीके पर कभी कभार ही सोचते हैं।’ गोपाल कहते हैं ‘प्राकृतिक पारिस्थितिकी के मानव केंद्रित लाभों का अनुमान लगाना लगभग असंभव है क्योंकि इनमें से कई तो नजर नहीं आते।’ इसे विस्तार देते हुए वर्मा कहती हैं ‘हमारे पास अब भी पारिस्थितिकी के बारे में, सभी प्रजातियों के बारे में और उन विभिन्न तरीकों के बारे में न तो पर्याप्त जानकारी है और न ही समझबूझ है जिनसे मानव कल्याण में वृद्धि होती है ताकि हम इनमें से प्रत्येक के महत्व का अनुमान लगा सकें।’ गोपाल आर्थिक लाभ की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि संरक्षित वनों से करीब 300 छोटी बड़ी नदियां निकलती हैं जिनके प्रवाह के लाभ अमूल्य हैं।बाघ संरक्षण में लगे विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछली सदी में देश को भुखमरी से बचाने वाली चावल की किस्म आईआर…8 थी। अत्यधिक उत्पादन वाली यह किस्म बाघ की उन रिहायशों से एकत्र धान की जंगली किस्म है जो अब छत्तीसगढ़ का हिस्सा हैं। गोपाल कहते हैं ‘बाघ एक मुख्य प्रजाति है और इसके साथ ही कई लाखों जीव जंतुओं को बचाया जा रहा है।’ उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट टाइगर की स्थापना करने का एक उद्देश्य ‘प्राकृतिक विकासवाद संबंधी प्रक्रिया की निरंतरता सुनिश्चित करना है।’ अब हरित गणना बाघों के संरक्षण के लिए एक पूरी नयी दिशा प्रदान कर रही है। गोपाल कहते हैं ‘हरित नियोजन समय की मांग है।’

 

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