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आतंकवाद से उबरते कश्मीर पर कुछ नए खतरे

उर्मिलेश कश्मीर घाटी में सब कुछ सहज और शांत नहीं है पर घाटी का मन और मिजाज जरूर बदला है। आतंकवाद के प्रति लोगों का आकर्षण लगभग खत्म सा है। गोला-बारूद के जरिए ‘आजादी’ चाहने वालों का हिंसा और अलगाव की सियासत से मोहभंग हुआ है। इसमें हर पीढ़ी के लोग शामिल हैं। वे आम […]
Author December 15, 2014 08:46 am
कश्मीर घाटी में सब कुछ सहज और शांत नहीं है पर घाटी का मन और मिजाज जरूर बदला है। (फोटो: भाषा)

उर्मिलेश

कश्मीर घाटी में सब कुछ सहज और शांत नहीं है पर घाटी का मन और मिजाज जरूर बदला है। आतंकवाद के प्रति लोगों का आकर्षण लगभग खत्म सा है। गोला-बारूद के जरिए ‘आजादी’ चाहने वालों का हिंसा और अलगाव की सियासत से मोहभंग हुआ है। इसमें हर पीढ़ी के लोग शामिल हैं। वे आम लोग भी जो कुछ साल पहले तक श्रीनगर के रेजीडेंसी रोड या मौलाना आजाद रोड पर कश्मीर के बाहर से आए पत्रकारों से खुलेआम कहा करते थे कि उन्हें सिर्फ आजादी चाहिए, इससे कम कुछ भी नहीं। लेकिन अब घाटी के सोच में बड़ा बदलाव दिख रहा है। बीते पांच-छह साल में यह प्रक्रिया परवान चढ़ी है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है-शासन और समाज में ऊपर से नीचे तक फैला भयानक भ्रष्टाचार। यहां किसी भी सूबाई सरकार के लिए खासतौर पर हाल के दो दशकों के दौरान चुनौती के दो सबसे बड़े मोर्चे रहे-भ्रष्टाचार और रोजगार। लेकिन इन दोनों मोर्चों पर आई-गई सबकी सरकारें बुरी तरह नाकाम और नाकारा साबित हुईं।

हर अच्छे-बुरे मामले में दिल्ली और हिंदी पट्टी के सूबों को ज्यादा ग्रेड देने वाला हमारा मीडिया किसी ठोस शोध-सर्वेक्षण के बगैर ही बिहार को देश के भ्रष्ट राज्यों में सबसे ऊपर रखता है। अगर वस्तुगत होकर देखें तो कश्मीरी शासन-समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के आगे बिहार काफी पीछे दिखेगा। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और पंजाब-हरियाणा जैसे राज्य शायद कुछ आसपास पहुंचें। अन्य राज्यों के जिक्र का मकसद यहां सिर्फ कश्मीर में व्याप्त भ्रष्टाचार की भयावहता को सामने लाना है।

पत्रकार के तौर पर 1997 से ही मैं कश्मीर आता-जाता रहा हूं। लेकिन बीते हफ्ते अपने कश्मीर दौरे में मैने शिद्दत से महसूस किया कि पिछले तीन दशक से आतंकवाद और चरमपंथ की गिरफ्त में रहा यह सूबा आज सचमुच एक नया रास्ता खोज रहा है। यह रास्ता बेहतर शासन और स्वायत्तता का हो सकता है। लोग अब आतंकवाद और चरमपंथ से भी कई वजहों से निराश है। इसी का नतीजा है कि पिछले कुछ सालों के दौरान यहां जितनी मुठभेड़ें हुईं, उससे ज्यादा सड़कों-गलियों में लोगों ने प्रदर्शन किए।

तरह-तरह के स्वत:स्फूर्त और कुछेक संगठित जन आंदोलन भी हुए। इन आंदोलनों की मांगों या इनकी वजह से कोई सहमत या असहमत हो सकता है पर इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि अमरनाथ भूमि विवाद या बाद में सैन्य-पुलिस उत्पीड़न और आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल एक्ट (अफस्पा) आदि के सवाल पर छिड़े आंदोलनों में आम लोगों की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी रही। इन आंदोलनों को खास कामयाबी नहीं मिली। हुकूमत ने कुछ और दरियादिली दिखाई होती तो शायद सूबे में अमनचैन वापसी की प्रक्रिया में कुछ और तेजी आई होती। लोगों से बातचीत करते हुए ऐसा लगा कि अब कश्मीर में लोगों के बड़े हिस्से ने मान लिया है कि भारत को हथियारों से झुकाना नामुमकिन है। वे अब ‘स्काई इज द लिमिट’ का ख्याली पुलाव पकाना बंद कर चुके हैं।

अब वे अपने सूबे की तरक्की और ‘बची-खुची स्वायत्तता’ को लेकर ही ज्यादा चिंतित हैं। भ्रष्टाचार और रोजगार के अलावा यही दो पहलू उन्हें फिलहाल सबसे अहम लगते हैं। ऐसे मुद्दों पर जो ज्यादा भरोसेमंद लगेगा, वे उसके साथ जा रहे हैं और आगे भी जाएंगे।

जम्मू और लद्दाख को छोड़ दें तो पहले के चुनावों में कश्मीर घाटी की आबादी का बहुत छोटा हिस्सा शामिल होता था। उनमें ‘मतदाता प्रबंधन’ की भी अहम भूमिका होती थी। प्रशासनिक मोर्चे पर बुरी तरह विफल रहने के बाद एक समय फारुक अब्दुल्ला ने इस तरह के प्रबंधन पर खूब जोर दिया। फिर उनकी सरकार ने कुछ राजनीतिक मुद्दे भी उछाले। सन 2000 में उन्होंने लोगों को स्वायत्तता के मुद्दे पर गोलबंद करने की कोशिश की। लेकिन अपने तत्कालीन राजनीतिक दोस्त भाजपा से उन्हें सहयोग नहीं मिला। जून, 2000 में फारूक सरकार ने राज्य विधानसभा में स्वायत्तता का प्रस्ताव पारित कर केंद्र की मंजूरी के लिए भेजा। नेशनल कांफ्रेंस तब केंद्र की तत्कालीन एनडीए सरकार का हिस्सा थी। लेकिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उसे नामंजूर कर दिया। नेशनल कांफ्रेंस खामोश हो गई। लगभग दो साल बाद जब अक्तूबर 2002 में विधानसभा चुनाव हुए तो फारुक की नेशनल कांफ्रेंस बुरी तरह हार गई। मुफ्ती मोहम्मद सईद की नई पार्टी पीडीपी को सत्ता मिली।

उसने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके तीन-तीन साल सरकार का नेतृत्व करने के फार्मूले के तहत सूबे पर राज किया। लोगों ने उस सरकार से बहुत आशाएं लगाईं थीं। मुफ्ती अपनी पसंद और राजनीतिक प्रभाव वाले दक्षिण कश्मीर में ज्यादा सक्रिय रहे। राज्यव्यापी स्तर, खासकर उत्तर कश्मीर में कोई बड़ा काम नहीं हो सका जिससे लोगों को राहत मिले। रोजगार की समस्या मुंह बाए खड़ी रही और स्वायत्तता के नए पीडीपी फार्मूले ‘सेल्फ-रूल’ हासिल करने में भी मुफ्ती को कामयाबी नहीं मिली। तीन साल बाद सत्ता-संचालन की जिम्मेदारी कांग्रेस को मिली और गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री बने। शुरू में उन्होंने कुछ नई परियोजनाओं को लाने की कोशिश की पर बात आगे नहीं बढ़ी। जितना काम, उससे ज्यादा स्कैंडल हुए। कई मंत्रियों-विधायकों के सेक्स रैकेट में संलिप्त होने के एक सनसनीखेज मामले का खुलासा हुआ। उसमें किसका-कितना सच था, उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण था, सरकार की छवि का बुरी तरह खराब होना।

पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद और कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद से मिली निराशा की जमीन से ही घाटी में नए ढंग का जनाक्रोश उभरा। 2008 और 2010 के बीच विभिन्न मुद्दों पर लोग गोलबंद होते रहे। ऐसे आंदोलनों में गोला-बारूद कहीं नहीं थे, कुछेक क्षेत्रों में पत्थरबाजी जरूर हुई। लोगों पर गोलियां चलीं और कई मारे गए। घाटी में इस तरह का माहौल आतंकवाद के दौर में पहली बार देखा गया। केंद्र ने इस दौर में कुछ सकारात्मक कदम उठाए गए। अलगाववादियों से विभिन्न स्तरों की बातचीत के अलावा कश्मीर के कुछ अहम मुद्दों पर केंद्रित कार्य समूह गठित हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीर मामलों के कई जानकारों और देश के कई लब्ध-प्रतिष्ठित लोगों को इन कार्य समूहों से जोड़ा।

इनकी रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई। कुछेक सिफारिशों पर अमल भी हुआ, लेकिन ज्यादातर आधी-अधूरी रह गईं। 2008 के विधानसभा चुनावों से पहले ही नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारुक अब्दुल्ला को मालूम था कि छह साल की मुफ्ती-आजाद सरकार का कामकाज बहुत अच्छा न होने के बावजूद सूबे में उनकी अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता बुरी तरह गिरी हुई है। तब बड़ी चतुराई से उन्होंने अपने युवा बेटे उमर अब्दुल्ला को नेता के तौर पर पेश किया। कश्मीर में लोगों ने उनमें नयापन देखा। उन्हें लगा, यह नौजवान भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकता है। चुनाव प्रचार के दौरान उमर अब्दुल्ला ने भ्रष्टाचार खत्म करने के अपने संकल्प का जोरशोर से प्रचार किया था। उनके वादों को कश्मीर की अवाम ने बहुत पसंद किया था। चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस ने इस बार पाला बदला और अपने पुराने गठबंधन सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस के साथ मिलकर सरकार बना ली। सरकार तो पूरे छह साल चली लेकिन उमर ने मुख्यमंत्री के तौर पर लोगों को बुरी तरह निराश किया। भ्रष्टाचार कम होने के बजाय और बढ़ा। पहले से चालू कई अहम परियोजनाएं भी समय से पूरी नहीं की जा सकीं। इसका सबसे बड़ा सबूत है श्रीनगर के बीचोबीच निर्माणाधीन फ्लाई ओवर, जो न जाने कब से बन रहा है, पर आज तक नहीं पूरा हो सका। उमर के बचे-खुचे असर को इस साल आई बाढ़ ने पोंछ दिया।

कश्मीर को अब बेहतर विकल्प का इंतजार है। उसके सामने अगर संभावनाएं हैं तो आशंकाएं भी। उम्मीदें हैं तो खतरे भी। सूबे में नए ढंग से सक्रिय हुईं कुछ शक्तियां जिस तरह के अपने भावी राजनीतिक एजंडे का संकेत दे रही हैं, वह सामाजिक-सामुदायिक सौहार्द के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी एक ऐतिहासिक और सामाजिक जरूरत है। लेकिन इसके लिए अनुकूल माहौल बनने और वापसी की प्रक्रिया की पहल समाज के अंदर से शुरू होने का इंतजार होना चाहिए। दोनों समुदायों की सामूहिक पहल की पृष्ठभूमि बनती नजर आ रही है। इस मामले में सरकारी स्तर पर कोई एकतरफा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए। दूसरा पहलू है, जम्मू संभाग में सांप्रदायिक-जातीय आधार पर ध्रुवीकरण का अचानक तेज होना।

जम्मू के राजौरी-पुंछ से लेकर चिनाब घाटी और पीरपंजाल क्षेत्र में तरह-तरह की दलबंदी की जा रही है। कहीं संप्रदाय के नाम पर, कहीं जाति के नाम पर। इसका गहरा असर इन चुनावों पर दिखता नजर आ रहा है। कश्मीर घाटी और जम्मू-लद्दाख के बीच सामाजिक स्तर पर एक तरह की गोलबंदी या ध्रुवीकरण की मंशा साफ दिख रही है। संभव है कि इससे किसी दल या नेता को तात्कालिक तौर पर कुछ कामयाबी हासिल हो जाए लेकिन यह प्रक्रिया आतंकवाद से उबरते सरहदी सूबे के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

 

 

 

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