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राष्ट्रपति चुनाव: राकेश सिन्हा का लेख- आपत्ति में झलकती सियासी संकीर्णता

वे निश्चित रूप से दलित समाज के एक प्रतिनिधि हैं। लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी पहचान को आगे रखकर राजनीति में छलांग लगाने की कोशिश नहीं की।
Author June 20, 2017 05:08 am
NDA के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने सोमवार (19 जून) को दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की। (Photo-PTI)

राष्ट्रपति का पद संविधान में जिस रूप में परिभाषित हो, लोग उसे राजनीति से परे और प्रेरणा के स्रोत के रूप में देखते हैं। इसलिए भले ही जनता प्रत्यक्ष रूप से इसमें मतदान नहीं करती है , लेकिन उसके मन में अपेक्षा होती है कि राष्ट्रपति भवन एक बालक से लेकर बुद्धिजीवी तक को प्रभावित करने की क्षमता रखे। और यह तभी संभव हो पाता है जब इस पद पर आसीन व्यक्ति सामान्य भारतीयों के मन और विचार से जुड़ा होता है और साथ ही जब वह जमीनी संघर्ष से निकलकर और भारतीय दर्शन मीमांसा को अपना कर आगे बढ़ा हो।

बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को जब राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया, तब सामान्य तौर पर उनकी पहचान से जुड़े पक्ष को लेकर विमर्श शुरू हुआ। ऐसा विमर्श राष्ट्रपति पद की गरिमा का अवमूल्यन करने वाला साबित होता है। कोविंद ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में जिस बात को सबसे अधिक प्राथमिकता दी है, उसमें सर्वसमावेशी समाज के प्रति उनकी चिंता रही है। वे निश्चित रूप से दलित समाज के एक प्रतिनिधि हैं। लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी पहचान को आगे रखकर राजनीति में छलांग लगाने की कोशिश नहीं की। तभी तो अनेक लोग उनकी जातीय पहचान को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद जान पाए। पहचान के विमर्श को रायसीना हिल तक ले जाना भारत के बौद्धिक विमर्श में आई गिरावट का संकेत है। संघ परिवार में उनकी छवि सामाजिक सरोकार से जुड़े एक सहज व्यक्तित्व की रही है। यही कारण है कि उन्होंने भारत में जातिवाद और सामंती अवशेषों को मिटाने के लिए एक अलग प्रकार के जीवन मूल्यों का सहारा लिया, जो उन्हें विशिष्ट सम्मान का भागीदार बनाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े रहने के कारण वे सामाजिक, सांस्कृतिक प्रश्नों का निदान संघर्ष में नहीं समन्वय और संवाद में देखते रहे हैं।

जिन लोगों ने उन्हें बिहार के राज्यपाल के रूप में देखा है, उन्हें उनकी उस सहजता का अनुभव हुआ और समन्वयकारी स्वरूप देखने को मिला जिसकी हमेशा सार्वजनिक जीवन में अपेक्षा बनी रहती है। जब वे बिहार के राज्यपाल बने, तब नीतीश और भाजपा के बीच संबंधों की कड़वाहट चरम पर थी। लेकिन उन्होंने इसका साया भी संवैधानिक पद पर पड़ने नहीं दिया। उन्होंने अपने उदार स्वभाव से भाजपा के विरोधियों की आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। उनकी मूल चिंता बिहार की शिक्षा में बदलाव की रही जिसका स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है।

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के नेता थे। वे पेशे से अधिवक्ता थे। परंतु राष्ट्रपति के रूप में वे दो बातों के कारण जाने जाते हैं। पहला- जीवन की शुचिता और अति सामान्य जीवन शैली, जिसके कारण वे राष्ट्रपति के रूप में करोड़ों भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते रहे और दूसरा-उनकी भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति दृढ़ता जिसने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रश्न पर उन्हें नेहरू के आमने-सामने खड़ा कर दिया था। वे भारत के विचार को सांस्कृतिक हकीकत में ढूंढ़ते थे। यह महज संयोग है कि कोविंद अपनी सरलता, सहजता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के कारण राष्ट्रपति बनने के बाद रायसीना हिल की जीवंतता को पुनर्जीवित करने में एक कामयाब राष्ट्रपति साबित होंगे। समाज के पुनर्निर्माण को वे भारतीय संस्कृति के आईने में देखते हैं जो उन्हें संकीर्णतावादी दृष्टि से राजनीति करने वालों से अलग पहचान दिलाता है।
उनके नाम पर विपक्ष की आपत्ति सिर्फ गैर-मोदीवाद और गैर-संघवाद की संकीर्ण राजनीति का द्योतक मात्र है। बाबा साहब आंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर निर्धन और दलित परिवार से निकले कोविंद का राष्ट्रपति बनना बाबा साहब को दी गई अद्वितीय श्रद्धांजलि होगी। विपक्ष के लिए इस बात का अवसर है कि इस यज्ञ में भागीदार बने, अन्यथा इतिहास उसे समानतावादी लोकतंत्र की प्रगति को बाधित करने का भागीदार मानेगा।
-राकेश सिन्हा
(लेखक संघ विचारक हैं)

 

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