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भारत देश में ही पनपे आतंकवाद से ‘काफी हद तक मुक्त’ है: राष्ट्रपति

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने छात्रों को जनसंघ से भाजपा के निर्माण सहित राजनीतिक दलों के गठन और देश में गठबंधन राजनीति के पदार्पण के बारे में भी पढ़ाया।
Author नई दिल्ली | September 5, 2016 19:07 pm
दिल्ली सरकार द्वारा संचालित डॉ. राजेंद्र प्रसाद सर्वोदय विद्यालय में 11वीं कक्षा के छात्रों के साथ विशेष सत्र के दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। (5 Sep 2016/PTI Photo)

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार (5 सितंबर) को यहां कहा कि भारत विश्वभर में देखने को मिल रहे स्वदेश में ही पनपे आतंकवाद से ‘काफी हद तक मुक्त’ है क्योंकि यहां के लोग अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और बहुलवाद में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रपति ने ‘प्रणब सर की क्लास’ के दूसरे संस्करण के तहत राष्ट्रपति संपदा स्थित स्कूल के छात्रों को पढ़ाते हुए भारत और इसके पड़ोस में ‘राजनीतिक हत्याओं’ के चिंताजनक घटनाक्रम के बारे में भी विचार व्यक्त किए, लेकिन कहा कि इन घटनाओं के बावजूद ‘हमारे यहां एक स्थिर राजनीतिक सरकार है।’ दिल्ली सरकार द्वारा संचालित डॉ. राजेंद्र प्रसाद सर्वोदय विद्यालय में 11वीं कक्षा के छात्रों के साथ शिक्षक दिवस मनाने के लिए विशेष सत्र का आयोजन किया गया। इस दौरान मुखर्जी ने कहा कि भारतीयों के लिए ‘धर्मनिरपेक्षता जीवन का हिस्सा है।’ उन्होंने कहा कि भारत ने आतंकवाद के दंश को झेला है जिसमें सीमा पार से संचालित आतंकवाद भी शामिल है।

राष्ट्रपति ने कहा कि यह भारत की नीति और प्रशासन की कुशलता का गौरव और सफलता है कि अंतरराष्ट्रीय शांति और समुदाय के लिए सबसे बडा खतरा बन चुके, अपने अपने देशों में ही पनपे आतंकवाद से, भारत ‘वस्तुत: मुक्त’ रहा है। उन्होंने कहा, ‘यह हम हैं जिन पर हमले होते हैं और हम सीमा पार से हमलों के पीड़ित हैं, लेकिन अपने देश में पनपे आतंकवाद से बहुत ज्यादा नहीं।’ प्रणब ने यह भी कहा कि यह ‘लोगों के जड़ों से जुड़े होने, बहुलवाद में विश्वास, भाषा, धर्म, आहार…लगभग हर चीज में व्यापक विविधता की वजह से है।’ राष्ट्रपति ने कहा कि हम सब एक जैसी व्यवस्था से ताल्लुक रखते हैं और यह एक ‘अद्वितीय’ विशिष्टता है।

छात्रों से ‘स्वतंत्रता के समय से भारत में राजनीति’ विषय पर लगभग 50 मिनट तक बात करते हुए उन्होंने भारत में स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास, चुनाव प्रक्रिया के निर्माण और संवैधानिक लोकतंत्र में भारतीयों की भागीदारी का वर्णन किया। राष्ट्रपति राजनीति में आने से पहले शिक्षक थे। उन्होंने छात्रों को जनसंघ से भाजपा के निर्माण सहित राजनीतिक दलों के गठन और देश में गठबंधन राजनीति के पदार्पण के बारे में भी पढ़ाया। उन्होंने भारत के इतिहास में एक ‘महत्वपूर्ण घटनाक्रम’ के रूप में राज्य पुनर्गठन आयोग के जरिए राज्यों के ‘गठन’ को भी याद किया।

मुखर्जी ने देश के बंटवारे को उन लोगों के लिए एक ‘मानसिक आघात’ करार दिया जिन्हें अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि विभाजन के चलते सांप्रदायिक तनाव भड़क गया, लेकिन हमारे राजनीतिक नेताओं और राजनेताओं ने इन चीजों को नियंत्रित कर दिया। राष्ट्रपति ने भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत की सराहना की और कहा कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में आठ साल तक गिरावट रहने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अटल रही। उन्होंने उम्मीद जताई कि देश की अर्थव्यवस्था में आने वाले दिनों में 7.5 प्रतिशत से कम की वृद्धि नहीं होगी।

छात्रों ने ‘प्रणब सर’ से कुछ सवाल भी पूछे। यह सवाल भी पूछा गया कि क्या देश में सभी चुनाव एकसाथ कराना अच्छा रहेगा। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत राजनीतिक लोकतंत्र को सफलतापूर्वक क्रियान्वित करने में अपनी ‘काबिलियत साबित कर चुका है’ और चुनाव आयोग आचार संहिता में परिवर्तन करने में ‘अपना विवेक का उपयोग कर सकता है’ ताकि इससे चुनावों पर असर न पड़े। उन्होंने कहा कि ‘राजनीतिक स्पेक्ट्रम के सभी भागीदार’ मंथन कर सकते हैं कि इस मुद्दे से कैसे निपटा जाए।

यह पूछे जाने पर कि अर्थव्यवस्था और ओलंपिक में पदक तालिका में सुधार के लिए देश को क्या करना चाहिए, राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की आवश्यकता ‘समान वृद्धि’ की है तथा बेहतर शारीरिक, शैक्षिक एवं स्वास्थ्य अवसंरचना स्थापित किए जाने की भी आवश्यकता है। बाद में, आयोजन संबंधी भाषण देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि समय की जरूरत ‘प्रेरणा से भरे’ शिक्षक रखने की है। उन्होंने कहा, ‘हमें वैज्ञानिक भावना का निर्माण करना होगा…हमें शिक्षकों के मस्तिष्कों में नवोन्मेष की भावना भरने की आवश्यकता है।’

राष्ट्रपति ने हाल में आई उस खबर पर भी चिंता जताई कि दिल्ली में बहुत से स्कूली छात्र अपनी पाठ्यपुस्तक तक पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता जताई। आयोजन के दौरान दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि उनकी सरकार राजकीय स्कूलों में लोगों के विश्वास को मजबूत करने के लिए काम कर रही है जिससे कि वे अपने बच्चों को इन संस्थानों में पढ़ाई करने के लिए भेज सकें।

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