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6 महीने बाद कोलेजियम की पुरानी व्यवस्था बहाल

छह महीने बाद उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति की पुरानी कोलेजियम व्यवस्था बहाल हो गई है। लेकिन इसे एक महत्त्वपूर्ण काम जल्दी करना होगा। वह है उच्च न्यायालयों में जजों के 400 से ज्यादा रिक्त पदों को भरना और आठ राज्यों में पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीशों को नियुक्त करना।
Author नई दिल्ली | October 19, 2015 09:48 am
अब भरने होंगे जजों के चार सौ से ज्यादा खाली पद

छह महीने बाद उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति की पुरानी कोलेजियम व्यवस्था बहाल हो गई है। लेकिन इसे एक महत्त्वपूर्ण काम जल्दी करना होगा। वह है उच्च न्यायालयों में जजों के 400 से ज्यादा रिक्त पदों को भरना और आठ राज्यों में पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीशों को नियुक्त करना। उधर, सरकार को भी कोलेजियम द्वारा पेश की गई लगभग 120 सिफारिशों पर फैसला करना होगा। ये सिफारिशें कोलेजियम व्यवस्था हटाए जाने से पहले की हैं। इस व्यवस्था को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून के जरिए हटाया गया था, जो 13 अप्रैल को लागू हुआ था।

शुक्रवार को सुनाए गए एक ऐतिहासिक फैसले में शीर्ष अदालत ने एनजेएसी कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। यह कानून उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति से जुड़ी दो दशक से भी ज्यादा पुरानी कोलेजियम व्यवस्था का स्थान लेने के लिए लाया गया था। इस फैसले के जरिए कोलेजियम व्यवस्था वापस लागू हो जाएगी। फैसले में यह भी घोषणा की गई कि एनजेएसी कानून लाने के लिए संविधान में किया गया 99वां संशोधन गैरकानूनी है।

कानून मंत्रालय में न्याय विभाग की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार एक अक्तूबर को उच्च न्यायालयों में 406 रिक्तियां थीं। 24 हाई कोर्ट के लिए मंजूर इन पदों की संख्या 1,017 की है और इस समय 611 जज ही काम कर रहे हैं। ये आंकड़े कहते हैं कि बंबई, आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना, पंजाब एवं हरियाणा, कर्नाटक, पटना, राजस्थान, गुजरात और गुवाहाटी हाई कोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश हैं।

नए कानून द्वारा कोलेजियम व्यवस्था को निरस्त कर दिए जाने के बाद भारत के प्रधान न्यायाधीश ने एनजेएसी कानून के तहत पैनल की चयन समिति की प्रधानमंत्री के साथ होने वाली बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया था। जिसके कारण नई व्यवस्था खटाई में पड़ गई थी।

अब चूंकि कोई संबंधित व्यवस्था मौजूद नहीं थी, इसलिए किसी भी जज को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति नहीं दी जा सकी थी। किसी अन्य हाईकोर्ट में स्थानांतरित नहीं किया जा सका था या सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नति नहीं दी जा सकी थी। उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जजों को पदोन्नत करने की कोई व्यवस्था न होने के कारण गुवाहाटी, गुजरात, कर्नाटक, पटना, पंजाब एवं हरियाणा, राजस्थान और आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना हाईकोर्ट की मौजूदा अध्यक्षता कार्यवाहक मुख्य जजों द्वारा की जा रही है।

संविधान का अनुच्छेद 223 कहता है कि जब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद खाली होता है या ऐसा कोई मुख्य न्यायाधीश किसी कारण कारण के चलते अनुपस्थित होता है या अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ होता है तो उसके कामकाज को किसी अन्य न्यायाधीश द्वारा किया जाता है।

इस काम के लिए इन जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति कर सकते हैं। सरकार ने कुछ उच्च न्यायालयों में कार्यवाहक मुख्य जजों की नियुक्ति के लिए हाल ही में इस प्रावधान का इस्तेमाल किया था।

न्यायाधीशों की कमी से उबरने के लिए सरकार ने हाल ही में शीर्ष अदालत से यह अनुमति मांगी थी कि विभिन्न हाई कोर्ट के जिन अतिरिक्त जजों का दो साल का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, उनकी सेवा को विस्तार दे दिया जाए। मेघालय, सिक्किम एवं त्रिपुरा हाईकोर्ट के अलावा 21 उच्च न्यायालयों में जजों की कमी है। एक अक्तूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में 85 जजों की कमी थी।

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