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केंद्र ने कहा: ‘संभव नहीं पोर्न पर प्रतिबंध’

केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में यह साफ कह दिया है कि वह हर तरह के पोर्न पर बैन के खिलाफ है। सरकार की मानें तो वह चाइल्ड पोर्नोग्राफी को छोड़कर, पोर्न पर बैन के खिलाफ है।
‘पोर्न पर बैन लगाना संभव नहीं है’ (फोटो: जनसत्ता)

केंद्र सरकार ने पोर्न वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने में अपनी लाचारी जताई है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह किसी के बेडरूम में तांकझांक नहीं कर सकती है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह चाइल्ड पोर्नोग्राफी के अलावा आम पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। इस बीच दूरसंचार विभाग के अस्पष्ट आदेशों के चलते सर्विस प्रोवाइडर्स पहले ही 857 व्यस्क पोर्न साइटों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं।

सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह हर तरह के पोर्न पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ है, क्योंकि ऐसा कर पाना संभव नहीं है। सरकार ने कहा कि जब प्रधानमंत्री देश में डिजिटलाइजेशन की बात कर रहे हों तो ऐसे में पोर्न पर प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है। सरकार ने माना कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी को छोड़ कर देश में बाकी पोर्न पर पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। अटार्नी जनरल ने कहा कि दुनिया के अधिकतर देशों में चाइल्ड पोर्नोग्राफी प्रतिबंधित है। हमने भी इस पर पाबंदी लगाई है।

उन्होंने कहा कि सरकार नैतिक पुलिस नहीं बन सकती। बंद कमरे में दो व्यस्क अगर कुछ देखते हैं तो इसे देखने से उन्हें रोकना, नए विवाद को जन्म देगा। लेकिन अगर अदालत पोर्न वेबसाइटों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का आदेश देगी तो हम उस पर अमल करेंगे। इससे पहले इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर 857 पोर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगा चुके हैं।

उनका कहना हैं कि इस संबंध में उसका आदेश भ्रम पैदा करने वाला है व उससे दोषी का पता नहीं लगाया जा सकता है। मालूम हो कि दूरसंचार विभाग ने 31 जुलाई को इन लोगों को आदेश दिया था कि वे सूचना प्रौद्योगिकी कानून और संविधान के प्रावधानों के तहत इन पर दिखाई जाने वाली चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर रोक लगाएं।

सिविल लिबरटीज और तमाम संगठनों ने यह कहते हुए इस कदम का विरोध करना शुरू कर दिया था कि किसी व्यस्क को एकांत में पोर्नोग्राफी देखने से कैसे रोका जा सकता है। इस पर विभाग ने फिर यह आदेश जारी किया कि अगर किसी साइट में चाइल्ड पोर्नोग्राफी नहीं है तो उस पर रोक न लगाने के लिए वे स्वतंत्र हैं। हांलाकि यह तय करने की जिम्मेदारी उन पर ही होगी। जबकि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर एसोसिएशन ने अपनी असमर्थतता जताते हुए सभी पर रोक लगा दी।

मालूम हो कि यह सारा विवाद तब खड़ा हुआ जब कि इंदौर के वकील कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर पोर्न वेबसाइटों पर रोक लगाने की मांग की। उनका कहना था कि इससे अश्लीलता व अपराधों को बढ़ावा मिलता है। इनके कारण ही महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं। उनका कहना था कि इस समय देश में 20 करोड़ से ज्यादा अश्लील वीडियो, साहित्य और तस्वीरें उपलब्ध हैं। जिन्हें इंटरनेट के जरिए देखा जा सकता है। उन्होंने इन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।

देश में कानूनन अश्लील फिल्मों, पत्रिकाओं और सामग्री का उत्पादन व वितरण प्रतिबंधित है। इसे अकेले देखने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

केंद्र सरकार ने 2009 में सूचना प्रौद्योगिकी कानून में चाइल्ड पोर्नोग्राफी के उत्पादन व प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया था। इंटरनेट पर या किसी और रूप में इसे देखते हुए या डाउनलोड करते हुए पकड़े जाने पर पांच साल की सजा व एक लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। सर्विस प्रोवाइडर्स की दलील है कि किस साइट को प्रतिबंधित करना है यह सरकार ही तय करे। वे इस बारे में कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते हैं।

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