December 08, 2016

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सरकार सबसे बड़ी ‘वादी’, न्यायपालिका पर बोझ कम करने की जरूरत: मोदी

अगर मामलों पर ठीक ढंग से विचार करने के बाद केस दायर किए जाएं तो न्यायपालिका पर बोझ कम किया जा सकता है।

Author नई दिल्ली | November 1, 2016 02:50 am
दिल्ली हाई कोर्ट की 50वीं सालगिरह के दौरान पीएम मोदी। (ANI Photo)

सरकार को सबसे बड़ा ‘वादी’ बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार (31 अक्टूबर) को कहा कि न्यायपालिका का बोझ कम करने की जरूरत है क्योंकि उसका अधिकांश समय ऐसे मामलों की सुनवाई करने में लग जाता है जिनमें सरकार एक पक्ष होती है। प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा स्थापित करने की वकालत की। दिल्ली उच्च न्यायालय के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार सबसे बड़ी ‘वादी’ है। उन्होंने कहा, ‘न्यायपालिका सबसे अधिक समय हमारे उपर खर्च करती है। हमारे उपर खर्च का मतलब मोदी से नहीं बल्कि सरकार से है।’

मोदी ने कहा कि अगर मामलों पर ठीक ढंग से विचार करने के बाद केस दायर किए जाएं तो न्यायपालिका पर बोझ कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अगर एक शिक्षक सेवा से जुड़े किसी मामले में अदालत के समक्ष जाता है और उसे जीत हासिल होती है तो ऐसे न्यायिक आदेश को आधार बनाया जाना चाहिए ताकि इसका फायदा मिल सके और बाद के स्तर पर हजारों की संख्या में मुकदमों को कम किया जा सके। इस मामले में हालांकि कोई ठोस आंकड़े नहीं है, लेकिन सेवा मामलों से लेकर अप्रत्यक्ष करों तक विभिन्न अदालती मामलों में कम से कम 46 प्रतिशत में सरकार एक पक्ष है।

केंद्र सरकार अभी तक वाद नीति को अंतिम रूप नहीं दे पायी है, कई राज्यों ने हालांकि विधि मंत्रालय के 2010 के मसौदे के आधार पर अपनी अपनी नीतियां बनाई है। तात्कालिक चलन को ध्यान में रखते हुए चुस्त दुरुस्त किए जा रहे वाद नीति के मसौदे में यह स्पष्ट किया गया है कि उस चलन को त्यागने की जरूरत है कि मामलों को अंतिम निर्णय के लिए अदालतों पर छोड़ देना चाहिए। सरदार पटेल की जयंती पर अलिख भारतीय लोक सेवा के गठन के संबंध में उनकी भूमिका याद करते हुए मोदी ने कहा कि नीतियों को लागू करने के लिए अधिकारी केंद्र और राज्यों के बीच सेतु का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के कारण जिलों में तैनात आईएएस अधिकारी राष्ट्रीय स्तर के अनुरूप सोचते हैं।

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प्रधानमंत्री ने कहा कि हालांकि यह विवादास्पद है, पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए। इस विचार का कुछ राज्यों और उच्च न्यायालयों द्वारा विरोध किए जाने की पृष्ठभूमि में मोदी ने कहा कि चर्चा लोकतंत्र का सार तत्व है। साल 1961, 1963 और 1965 के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का पक्ष लिया गया था लेकिन इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया जा सका क्योंकि कुछ राज्यों एवं उच्च न्यायालयों ने इसका विरोध किया था। इसके बाद 1977 में संविधान में संशोधन किया गया ताकि अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का प्रावधान किया जा सके। यह प्रस्ताव 2012 में तत्कालीन संप्रग सरकार के दौरान फिर से लाया गया जब इसे सचिवों की समिति की मंजूरी मिली और एक कैबिनेट नोट तैयार किया गया। लेकिन मसौदा विधेयक को उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के विरोध के बाद आगे नहीं बढ़ाया जा सका।

इस बारे में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का मानना था कि यह उनके अधिकारों का उल्लंघन है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि युवा न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में प्रोन्नति मिल सके। प्रधानमंत्री ने कानून का मसौदा बनाने के संदर्भ में विधि विश्वविद्यालयों में युवा लोगों को प्रशिक्षण देने की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि इससे भेदभाव और व्याख्या के दायरे को कम किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने कहा कि इस दायरे को हालांकि शून्य नहीं किया जा सकता है। मोदी ने विवादों के निपटारे के विकल्प प्रदान करने में बार और पीठ की भूमिका की सराहना की । उन्होंने कहा कि इससे अदालतों में लंबित मामलों को कम करने में मदद मिल सकती है। प्रधानमंत्री के अलावा इस समारोह में भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर, दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी रोहिणी, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मौजूद थे ।

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First Published on November 1, 2016 2:50 am

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